Blog: लेफ्ट, राइट, सेंटर सबके देव महादेव शिव शम्भू

lord shiva mahadev

सावन की सोमवारी पर आह्लादित होते देख रहा हूँ कि भोलेनाथ की अपील कॉमरेडों और कथित सेक्यूलरों में भी बराबर है। बाबा सर्वव्यापी हैंलेफ्ट, राइट सेंटर हर जगह। मानो बाबा आदि कम्यूनिस्ट हैं, शायद महर्षि मार्क्स ने उन्हीं से अपने हेयर स्टाइल और दाढ़ी की प्रेरणा ली होगी!

राम और कृष्ण की अपील से ज़्यादा है महादेव की अपील, तभी तो नरेंद्र मोदी को महादेव की नगरी जाना पड़ा। लालकृष्ण आडवाणी रामराम करते रहे, लेकिन दिल्ली दूर ही रही। इधर सुना है कि राहुल गांधी भी ख़ुद को शिवभक्त बता रहे हैं। 

इतना ही नहीं, करीब साढ़े तीन सौ साल पूर्व मराठा सरदार शिवाजी को भी महादेव की नगरी बनारस के ब्राह्मण ने ही राजा की मान्यता दी, जब चित्तपावनों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। और हज़ारों साल पहले बुद्ध को भी अपने पांच शुरुआती शिष्य महादेव की नगरी में ही मिले। 

स्वाभाविक है जो अल्हड़पन, जो समभाव और जो उदारता महादेव की नगरी बनारस में है, वो कहीं नहीं। 

महादेव के गण

बाबा के गण भांग,धतूरा, गांजा सबकुछ पीते हैं। गांजे की लोकप्रियता वैसे भी किस वर्ग में नहीं है। सम्मानित पत्रकार-गण गांजा के भक्त हैं तो बौद्धिक तबके में भी गांजा को लेकर सहानुभूति है। ये महादेव का ही प्रताप है।

बाबा स्त्रियों में भी गजब लोकप्रिय हैं। स्त्रियां स्वाभाविक ही महादेव सा पति चाहती हैं जो फक्कड़ तो हो लेकिन उससे टूटकर प्यार करे और अपनी पत्नी के अपमान पर सृष्टि में तांडव मचा दे। ऐसा लगता है कि एक राजकुमारी और एक फक्कड़ जोगी की प्रेमकहानी संभवत: दुनिया की पहली अमीरगरीब की प्रेम कहानी है।

भोलेनाथ सभ्यतापूर्व देवता हैं, जब इंसान बैल या बैल जैसे जानवरों के सहारे खेती करना सीख रहा होगा लेकिन सांप, बिच्छू और शेर जैसे हिंसक जानवरों से भरे जंगल और पहाड़ से पूरी तरह हटा नहीं होगा। ये उस दौर की कहानी रही होगी जब जाति और वर्ण नहीं बने होंगे और संभवत: इसीलिए भोलेनाथ पूरे समाज में इतने स्वीकार्य हैं!

समदर्शी महादेव

महादेव के लिए सब समान हैं, क्या देवता क्या दानव और क्या राक्षस। वे राम के भी हैं और रावण के भी। वे गांव के ऐसे शतायु बुजुर्ग पितामह हैं जो सबको आर्शीवाद देता है और जगत कल्याण के लिए विष पी लेता है!

उसकल्टकी व्यापकता तिब्बत से लेकर श्रीलंका तक और पश्चिम में अरब (जी हां, राहुल सांकृत्यायन ऐसा मानते हैं) सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर पूरब में वियतनाम तक ऐसे नहीं रही होगी।

डॉ लोहिया ने जब चीनभारत सीमा समाधान पर अपना मत रखा तो उनका संकेत था कि नदियों के बहाव और सांस्कृतिक चिह्नोंप्रतीकों वाली जगह तक दोनों देश एक-दूसरे की सीमा को स्वीकार कर लें।

जाहिर है, दोनों देशों की प्राणवायु सरीखी नदियां गंगा और ह्वांगहो जिस तिब्बत के पठार से निकलती है, हिंदू परंपरा में महादेव उसके अधिपति हैं और अरबों लोगों की कल्पना में एक विराट आदि पुरुष की तरह विराजमान हैं। एक पैगन देवता की तरह जो जादूटोना, भूतप्रेत, टीला, झाड़ी और तंत्र का देवता है जिसके चिह्न केंद्रीय यूरोप तक पसरे हुए देखे जा सकते हैं।

सावन की पहली सोमवारी उसी स्मृति को नमन है जिसका अलिखित, अस्पष्ट और धुँधला सा चित्र हमारे मानस में रचाबसा है।