सिर्फ़ भोजपुरी के नहीं पूरी हिंदी पट्टी के नायक हैं भिखारी ठाकुर

भिखारी ठाकुर का नाट्य पूरी हिंदी पट्टी की विरासत है

भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाते हैं भिखारी ठाकुर
भिखारी ठाकुर का नाट्य संसार समाज की सचाई है

आज जन-साधारण के बीच आप भोजपुरी की बात करते ही, प्रतिनिधि चेहरे के तौर पर अमूमन ऐसे गायक और अभिनेता दिखते हैं, जिन्हें आप न तो परिवार के साथ सुन सकत हैं न देख सकते हैं. यूट्यूब या गूगल पर इन लोगों ने भोजपुरी भाषा की पहचान ही अश्लील भाषा के तौर पर कर दी गई है. जबकि, भोजपुरी का आत्मा और उसका रस के झंडाबरदार तो भिखारी ठाकुर और महेंदर मिसिर जैसे लोग होने चाहिए थे.

भिखारी ठाकुर बिहार में नाच विधा के सबसे अहम और मशहूर कलाकार रहे हैं. इनको भोजपुरी का शेक्सपियर भी कहा जाता है क्योंकि इस ठेठ भाषा में भिखारी ठाकुर ने अद्भुत और जमीन से जुड़ी नाट्य और मंचीय रचनाएं की.
भिखारी ठाकुर ने अपनी नाच मंडली की स्थापान 1917 में की थी. बिदेसिया, भाई-बिरोध, पिया निसइल, गबरघिचोर, बेटी-बेचवा, गंगा-स्नान, नाई-बाहर, नकल भांड और नेटुआ समेत विभिन्न सामाजिक-धार्मिक प्रसंगों और गीतों की उन्होंने सृजन किया.

उस वक्त के भोजपुरी समाज की समस्याएं ही नहीं, बल्कि कुरीतियों और दकियानूसी रीति-रिवाज पर भी उन्होंने गीतों और नाटकों के जरिए हमला किया था.

बिला शक बिदेसिया उनका सबसे मशहूर नाटक है. 1930 से 1970 के बीच भिखारी ठाकुर की नाच मंडली हिंदी पट्टी से परे, असम और नेपाल तक जाकर नाच दिखाती थी.

एक सौ बरस हुए, जब वह बंगाल में नाई की काम करते थे. रामलीला देखते हुए वह बहुत प्रभावित हुए थे. उस वक्त पढ़ना-लिखना उन्होंने बस शुरू ही किया था. अंग्रेजी तो दूर, हिंदी भी नहीं आती थी. आती थी तो सिर्फ भोजपुरी.
अपने गांव में वे गीत-कवित्त सुनते थे और खुद ही लिखना भी शुरू कर दिया. गांव में रामलीला भी शुरू की. भिखारी ठाकुर तीस साल के हुए तो उन्होंने अपनी नाच मंडली शुरू कर ली थी.

भिखारी ठाकुर अपने परिवेश को और अपने समाज के मिजाज को समझते थे. उन्होंने अपने समाज को ही साधना शुरू किया. साधारण और मामूली बातें सिरजकर सुनाने लगे. और चमत्कार हो गया.

हालांकि भिखारी ठाकुर के सामने आने से पहले भी नाच विधा प्रचलित थी. रसूल मियां और गुदर राय नाच विधा के उस वक्त के मशहूर कलाकार रहे. लेकिन भिखारी ठाकुर की दृष्टि व्यापक थी. उन्होंने उस वक्त के हिसाब से प्रासंगिक नाटक रचे. वह समाज और सामाजिक समस्याओं को लेकर जागरूक थे और उसका अक्स उनके नाटकों में दिखता है.

1971 में निधन के बाद से लेकर आज 2020 तक के दौर में भिखारी ठाकुर अब सिर्फ भोजपुरी के नहीं रहे. भाषा और क्षेत्रीयता की उन संकेंद्रीय परिधियों से बाहर निकल अब पूरे हिंदी पट्टी के बड़े सांस्कृतिक नायक हैं. उनकी सामाजिक दृष्टि और उनके ऑब्जरवेशन में इस हिंदी पट्टी की धड़कनें पैवस्त हैं.

भिखारी ठाकुर की मुख्य कृतियां
लोकनाटक
• बिदेशिया
• भाई-विरोध
• बेटी-बियोग या बेटी-बेचवा
• कलयुग प्रेम
• गबरघिचोर
• गंगा स्नान (अस्नान)
• विधवा-विलाप
• पुत्रवध
• ननद-भौजाई
• बहरा बहार
• कलियुग-प्रेम
• राधेश्याम-बहार
• बिरहा-बहा,
• नक़ल भांड अ नेटुआ के
अन्य
शिव विवाह, भजन कीर्तन: राम, रामलीला गान,

भजन कीर्तन: कृष्ण, माता भक्ति, आरती, बुढशाला के बयाँ, चौवर्ण पदवी, नाइ बहार, शंका समाधान, विविध.