शख्सियतः मां की दीवानगी ने बनाया सुनीता बुद्धिराजा को संगीत अध्‍येता

सुनीता बुद्धिराजा ने शास्त्रीय गायकों पर मशहूर किताबें लिखी हैं

सुनीता बुद्धिराजा ने संगीत समारोहों में एंकरिंग का तरीका बदल दिया
सुनीता बुद्धिराजा ने संगीत समारोहों में एंकरिंग का तरीका बदल दिया

किस्‍सा पचपन साल पहले का है। दिल्‍ली के एक घर में एक बालक और एक बालिका, जो सगे भाई बहन थे, बहन बड़ी और भाई छोटा। आम बच्चों जैसी दिनचर्या थी उनकी।

अलसुबह जागना, स्‍कूल जाना, शाम को खेलना और होमवर्क करना। पर एक बात अलहदा थी। शाम को भोजन कर दोनों भाई-बहन सोने के लिए मन बना ही रहे होते कि उनकी मां उन्‍हें तैयार करती और लगभग खींचकर दिल्‍ली में रात भर चलने वाले संगीत समारोहों में ले जाती।

मां कला, संगीत और साहित्‍य की जानकार थी। परन्‍तु दोनों बच्‍चे क्‍या समझते कि मंच पर कुछ गवैये और कुछ बजैये, क्‍या गा-बजा रहे हैं!

संगीत की सुर लहरियों में रसिक मां गोते लगाती रहती, दोनों बच्‍चे ऊंघते रहते। यह किस्‍सा पढ़कर आपको ऐसा लगेगा कि संगीत की रसिक एक स्‍त्री अपने संगीत प्रेम से वशीभूत होकर अपने बच्‍चों की नींद लील रही थी। पर, असल में वह एक सुशिक्षित और प्रतिबद्व मां थी, जो अपने बच्‍चों को भारतीय शास्‍त्रीय संगीत के संस्‍कारों में ढालने की जद्दोजहद कर रही थी।

आज चौरासी की उम्र पार करती उस मां के लिए यह गर्व की बात है कि उसने जो चाहा था, उसके बच्‍चों ने उसे सौ फीसद साकार किया है।

यह किस्‍सा है, देश की जानी-मानी लेखिका, शिक्षाविद डॉ. राज बुद्विराजा का, जिन्‍होनें अस्‍सी से अधिक किताबें लिखी है और उनकी पुत्री कवयित्री, लेखिका और संगीत अध्‍येता सुनीता बुद्विराजा का।

सुनीता ने गायन, वादन की कोई विधिवत शिक्षा प्राप्‍त नहीं की। परन्‍तु मां डॉ. राज बुद्विराजा के संगीत प्रेम के असर में बचपन से ही संगीत समारोहों में बड़े-बड़े कलाकारों को सुनते-सुनते सुनीता के कान सुरीले हो गये। उठते-बैठते संगीत की आदत-सी हो गयी, संगीत को गुनना आ गया।

पेशेवर रूप में जीवन के लगभग चार दशक शॅा वैलेस, यूबी ग्रुप, नागार्जुन ग्रुप और आजोन ग्रुप में बतौर कॉर्पोरेट कम्‍यु‍निकेशन हैड के रूप में नेतृत्‍व कर चुकीं सुनीता ने हालांकि, इन ग्रुपों में पूरी शिद्दत से अपने काम को अंजाम दिया। इससे इन संगठनों की प्रतिष्‍ठा और उसे लेकर अवधारणा में बदलाव भी आए।

परन्‍तु अपनी मां के व्‍यक्तित्‍व और कृतित्‍व से स्‍वाभाविक रूप से प्रभावित सुनीता का मन जीवन भर शब्‍दों और सुरों से जुगलबंदी करता रहा। इससे ज्‍यादा उन्‍हें चाहिए भी नहीं था।

सुबह उठकर बिना कुछ लिखे हुए सुनीता बुद्धिराजा के दिन की शुरुआत नहीं होती और रात को बिना कुछ पढ़े हुए नींद नहीं आती। किताबों से घिरे हुए कमरे में उठना-बैठना सुनीता को अच्छा लगता है।

सुनीता का शुरुआत में कविता के प्रति रुझान रहा। उनके तीन कविता संग्रह ‘आधी धूप’, ‘अनुत्‍तर’ तथा ‘प्रश्‍न–पांचाली’ खासे चर्चित रहे।

‘प्रश्न-पांचाली’ का मंचन-निर्देशन विख्यात रंग-निर्देशक दिनेश ठाकुर ने किया है। इसके 35 शो मुंबई, दिल्ली, अजमेर, वृंदावन, जोधपुर और लंदन में हुए।

1980 तक सुनीता कविता तक ही सीमित थीं। 1981 में धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती ने एक अनौपचारिक बैठक में उन्‍हें सुझाव दिया कि वह कविता तक ही सीमित क्‍यों है? जनसम्‍पर्क की नौकरी में विदेश यात्राएँ अनवरत करती रहती हो, इन यात्राओं पर धर्मयुग के लिए रिर्पोताज लिखो।

सुनीता ने भारती जी के सुझाव को सम्‍मान दिया और उनका पहला रिर्पोताज ‘जापान: एक देश चरित्रवान’ 1981 में धर्मयुग में छपा, जो बेहद सराहा गया।

इसके बाद तो कवियत्री सुनीता बुद्विराजा की दिशा ही बदल गई। उनके रिर्पोताज, लेख और इंटरव्‍यू ‘धर्मयुग’, ‘साप्‍ताहिक हिन्‍दुस्‍तान’, ‘पहल’, ‘ज्ञानोदय’, ‘हिन्‍दुस्‍तान’, ‘नवनीत’, ‘इंडिया टुडे’, ‘जनसत्‍ता’ आदि अनेक पत्र-पत्र‍िकाओं में प्रकाशित हुए और सराहे गए।

इसके बाद तो सुनीता की दुनिया ही बदल गयी।

कवि मन, शब्‍दों के अर्थ और उच्‍चारण पर पकड़, सुरों की समझ से वह संगीत समारोह में बतौर एंकर की भूमिका निर्वाह करनी लगी। तब तक संगीत समारोह में एंकरिग का परम्‍परागत तरीका यह था कि स्‍पष्‍ट उच्‍चारण करने वाला एंकर संबधित कलाकार का बायोडाटा पढ़ते हुए बताता कि उसका जन्‍म कब हुआ, कहां हुआ, संगीत की शिक्षा किस गुरु से प्राप्‍त की आदि।

लेकिन सुनीता ने इस परम्‍परा को तोड़ दिया। वह मंच पर बिना किसी कागज, बिना किसी बायोडाटा के जाती और उस कलाकार की साधना के बारे में अपने शब्‍दों में इतनी आत्‍मीयता से बताती कि वह कलाकार भी चौंक जाता कि इस एंकर को मेरे बारे में इतना सब कुछ कैसे मालूम है!

अपनी इस शैली के बारे में वह कहती हैं कि मान लीजिए पंडित जसराज का कार्यक्रम है, बतौर एंकर मैं श्रोताओं को बताऊं कि पंडित जी मेवात घराने के है, इन्‍होंने अपने बड़े भाई से सीखा तो यह श्रोताओ को बेवकूफ समझने जैसा होगा।

सभागार में जो श्रोता पंडित जसराज को सुनने आए हैं, वह उनके बारे में यह सब पहले से जानते हैं। इसे दोहराना श्रोताओं का अपमान करना है। जरूरत इस बात की है कि पंडित जी की साधना के बारे में बताऊं, आज कौन-सा भजन सुनाने जा रहे हैं, उसके बारे में बताऊं ताकि एक समां बंधे और पंडित जी और अधिक प्रवाह से सुनायें और श्रोता दुगुने प्रवाह से उसे सुनें।

एंकरिग की परम्‍परागत शैली से इतर सुनीता की एंकरिग की एक बानगी देखिएः

“पं. जसराज के सुरों की पालकी पर चलकर बसंत आता है। तभी तो वे गाते हैं: और राग सब बने बराती दूल्‍हा राग बसंत। पर, बसंत तब आता है जब पं. जसराज उसे बुलाते हैं। बसंत तब आता है जब पंडित जसराज उसे गाते हैं।”

पंडित हरिदास समारोह, वृंदावन संगीत समारोह, पंडित मोतीराम और पंडित मनीराम समारोह हैदराबाद, न्‍यूयॉर्क के विशिष्‍ट वार्षिक वैदिक विरासत समारोह में अपने ज्ञान, शब्‍दों की पकड़ और स्‍पष्‍ट उच्‍चारण, सुरों की समझ से अपनी नायाब शैली मे एंकरिग की खूशबू बिखेर चुकी सुनीता बताती हैंः

“1982 की बात है, मथुरा में बांसुरी सम्राट पंडित हरि प्रसाद चौरसिया का प्रोग्राम था। एंकरिग करने की जिम्‍मेदारी सुनीता की थी। प्रोग्राम शुरू होने से पहले सुनीता पंडित जी के पास गयी और पूछा कि आज कौन-कौन से राग सुनाने वाले हैं। पंडित जी ने पूछा मेरा बायोडाटा है ना तुम्‍हारे पास? सुनीता ने जबाव दिया नहीं। पंडित जी ने अनमने ढंग से कहा बायोडाटा नही है, तब क्‍या कहोगी, क्‍या करोगी?

जो करुगी मन का करुंगी, मन से करुंगी के सूत्रवाक्‍य से बंधी सुनीता ने पंडित जी को भरोसा दिलाया कि जो कहूंगी, जो करुंगी, आपकी प्रतिष्‍ठा के अनुरूप ही होगा। परन्‍तु पंडित जी से आश्‍वस्‍त नहीं हुए।

प्रोग्राम शुरू हुआ। बिना बायोडाटा के सुनीता ने पंडित जी की साधना के बारे में इतनी भावप्रद एंकरिग की कि पंडित जी भाव-विभोर हो उठे।

इस तरह की एंकरिग करना इतना आसान नहीं था। इसके लिए जरूरी था इन कलाकारों के बारे में छोटी से छोटी बात का समझना, पढ़ना, गुनना और यह तो सुनीता का नित्‍य का कर्म था। लिखना, पढ़ना, सुनना ही जीवन का सरोकार था।

एंकरिग के काम को करते रहने की प्रक्रियों में बड़े-बड़े कलाकारों से भेंट-मुलाकात का सिलसिला स्‍वाभाविक था। हालांकि, सुरों की संगत में रची-बसी पगी सुनीता को इन कलाकारों के बारे में पहले ही अथाह जानकारी होती, परन्‍तु अपने भीतर के छात्र को हमेशा जीवित रखने की चाहत ने सुनीता के पास हरदम एक एक छोटा टेप-रिकॉर्डर या डिक्टाफ़ोन होता। जब, जहाँ सम्भव हुआ, कलाकारों के साथ बातचीत रिकॉर्ड कर ली।

इस रिकॉर्ड बातचीत को सुनीता ने शब्‍दों में पिरोना शुरू किया।

2014 में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्‍तक ‘सात सुरों के बीच’ इसी का परिणाम है। ‘सात सुरों के बीच’ उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ, पं. किशन महाराज, पं. जसराज, मंगलमपल्ली बालमुरली कृष्ण, पं. शिवकुमार शर्मा, पं. बिरजू महाराज तथा पं. हरिप्रसाद चौरसिया के साथ वर्षों की गयी चर्चाओं पर आधारित सुरीली रचना है्, जिसे बेहद सराहना मिली।

2010 तक आते-आते सुरसम्राट पंडित जसराज के पास कई लेखकों के प्रस्‍ताव आ चुके थे कि वह उन पर किताब करना चाहते हैं। पंडित जी और उनका परिवार भी चाहता था कि उन पर किताब आने का समय हो गया है परन्‍तु दुविधा यह थी कि किताब कौन करेगा!

देश के सात प्रतिष्ठित कलाकारों के सुरों की इंद्रधनुषी आभा से सजी पुस्‍तक ‘सात सुरों के बीच’ की तैयारियां की जानकारी पंडित जसराज, उनकी पत्‍नी मधुरा जी को थी। जिनके दशकों से सुनीता बुद्विराजा से पारिवारिक रिश्‍ते हैं और यह संबध इतने पके हैं कि सुनीता हैदराबाद में घर खरीदे और इसकी सूचना पंडित जी को दे तो वह इतना खुश जैसे स्वयं उन्होंने घर खरीदा हो और स्वयं ही कहे कि “मैं आता हूं और मैं गाऊंगा।“

बसंत पंचमी के दिन सुनीता के घर के मुहूर्त के अवसर पर पंडित जी पहुंचे और “तिहारो घर सुबस बसो“ गाया।

सुनीता के लिए इससे बेहतर आशीर्वाद हो ही नहीं सकता था।

पंडित जी से आत्‍मीयता इतनी कि पंडित जसराज जो सुनीता बुद्विराजा के घर पर आराम करने आए और शाम को सुनीता जी के वापिस लौटने पर उन्हें अपने हाथ से बनाकर गर्मागरम परांठे खिलाए। ऐसे पके रिश्‍तों की मिठास में मथुरा जी ने पंडित जी को सुझाया कि सुनीता बुद्विराजा से ही किताब कराई जाए।

जिन पंडित जसराज को साक्षात सुन पाना उन्हीं के प्रारब्ध में होता है, जिन पर ईश्वर की कृपा होती है, ऐसे पंडित जसराज के व्यक्तित्व पर कोई किताब करने का आग्रह स्‍वयं पंडित जी द्वारा सुनीता बुद्विराजा से किया जाए, इसे मां सरस्‍वती का आशीर्वाद ही कहा जाएगा।

पंडित जसराज से आत्मीय, सरल, सहज संबधों के रहते उनपर किताब करना सुनीता बुद्विराजा के लिए बहुत सरल था परन्तु यह सुनीता बुद्विराजा की पंडित जसराज के प्रति श्रद्धा, प्रेम और अटूट आस्था से निमित्त समर्पण था कि वह उन संगीत प्रेमियों के लिए जिन्हें पंडित जसराज को छूने का, उनसे बतियाने का, यहां तक कि साक्षात पंडित जी को सुनने तक का अवसर नही मिल सका, उनके लिए भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक प्रामाणिक दस्तावेज तैयार करना चाहती थी।

उसके लिए उन्होनें दशकों पुराने अपने संबधों में पाए अमृत के एक-एक बूंद को तो सहेजा ही, साथ ही पंडित जी की परिवार, परिचित संसार यहां तक कि जिसका भी पंडित जी से थोड़ा भी संबध है, उन सबसे साक्षात्कार किया।

पंडित जी के बारे में इन सब लोगों से सवाल पूछने की शब्दावली अलग-अलग रही होगी पर मूल भाव यही था कि पंडित जी से क्या पाया।

यह प्रक्रिया आसान नहीं थी। इसमें सात वर्ष लगे और सात वर्षो के अनवरत परिश्रम के उपरांत बहुत सुन्दर भाषा शैली, जिसे नक्‍काशीदार भाषाशैली कहना ज्‍यादा मुफीद होगा, में लिखी गयी 534 पेज की किताब ‘रसराज पंडित जसराज’ तैयार हुई, जिसे 2018 में वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया।

सुनीता बुद्विराजा की संगीत की हस्‍ति‍यों पर लिखी गयी दोनों किताबें न केवल इन कलाकारों से अपि‍तु भारतीय शास्‍त्रीय संगीत की महान परम्‍परा से सहज रूप से पाठकों को बावस्‍ता कराती है।

अपने लिक्‍खे के लिए सुनीता को कई पुरस्‍कार मिल चुके हैं, जिनमें शिरोमणि पुरस्‍कार, शिरोमणि महिला पुरस्‍कार, सुपर स्‍टार अवॉर्ड, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पुरस्‍कार, पीआर पर्सन आफ द ईयर अवार्ड, ग्‍लोबल वूमन एचीवर अवॉर्ड शामिल हैं। समाचार पत्र अमर उजाला द्वारा उन्‍हें वर्ष 2018 के लिये शब्द सम्मान से नवाजा जा चुका है।

हैंडलूम साड़ियों के प्रति अपने प्रेम और बुनकरो के लिए कुछ करने के जज्बे की वजह से तीन साल पहले सुनीता ने सिक्‍स यार्डस ऐंड 365 नामक फेसबुक कैम्‍पैन शुरू किया। केवल तीन सदस्‍यों से आरम्‍भ इस कैम्‍पैन आज दुनिया भर की 31,000 से अधिक महिला सदस्‍य हैं, जिसमें नामी कलाकार, लेखिका, थि‍एटरकर्मी, शिक्ष‍ाविद, उद्यमी, डॉक्‍टर, एनजीओकर्मी, मीडियाकर्मी और कुशल गृहणी तक सभी वर्गो की महिलाएं हैं।

बहरहाल, जीवन के पैंसठ बसंत देख चुकी सुनीता थकी नहीं है। ऊर्जावान हैं और इन दिनों ‘सात सुरों के बीच’ के दूसरे खण्‍ड के रूप में जुगलबंदी कलाकारों यथा राजन-साजन मिश्रा, गुंदेला बन्‍धु पर एक किताब पर काम कर रही हैं।