पुस्तक समीक्षाः साहित्य के क्षेत्र में आ रहे लोकतंत्र का संकेत है नीलोत्पल मृणाल की डार्क हॉर्स

नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास सिविल सेवा अभ्यर्थियों से संघर्ष को नजदीक से उकेरने वाला और भदेस तेवरों वाला उपन्यास है

डार्क हॉर्सः नीलोत्पल मृणाल
नीलोत्पल मृणाल की किताब डार्क हॉर्स सिविल सेवा अभ्यर्थियों की दास्तान है

नई वाली हिंदी या सबकी वाली हिंदी के ज़माने में कुछ अहम बातें हुई हैं. पहली बात तो यही कि बदले ज़माने में हिंदी में नई पीढ़ी के रचनाकारों ने अपनी मौजूदगी दर्ज़ करानी शुरू कर दी है.

अपनी बात कहने में धमक लिए नए क़िस्म के और नए तेवर के इन लेखकों में दिव्य प्रकाश दूबे से लेकर निखिल सचान तक और सत्या व्यास से लेकर अजीत भारती तक हैं.

इसी पीढ़ी ने नई हिंदी का शिगूफा भी छोड़ा है. पर अभी तो यह पारिभाषित नहीं हो पाया है कि नई हिंदी क्या है? क्या वह व्याकरणिक दृष्टि से कुछ अलग है या लिपि में रोमन के कुछ शब्द घुसेड़ देना!

बहरहाल, डार्क हॉर्स नीलोत्पल मृणाल की पहली कृति और पहला उपन्यास है.

इस उपन्यास में आपको कथा और शैली के स्तर पर वही धारा नज़र आएगी, जो ‘यूपी 65’, ‘बनारस टॉकीज’ या ‘मुसाफिर कैफे’ जैसे उपन्यासों में दिखाई दी थी.

असल में चेतन भगत की लोकप्रियता ने हिंदी में नए रचनाकारों की एक पौध शुरू की है. इन रचनाकारों में कथा और शैली की परतें न तो मठाधीशी किस्म की है न उतनी बोझिल और दुरुह.

इस दौर में, नीलोत्पल मृणाल जैसे लेखक सृजनशीलता की बेचैनी को कागज पर उड़ेलते दिखते हैं.

यह पीढ़ी खम ठोंक रही है कि हिंदी अब मठाधीशों की जागीर नहीं है और इसलिए लोग बिना आलोचकों की परवाह किए, मनमर्जी का लिख रहे हैं और छप रहे हैं. यह साहित्य के लोकतंत्रीकरण का दौर है.

डार्क हॉर्स की अपनी भूमिका में ही मृणाल लिखते हैं कि उन्होंने उपन्यास के रूप में कोई साहित्य नहीं रचा है. अच्छा! क्या यह आलोचकों की नजर से बचने के लिए दिया गया बयान है या एक विनम्र दावा?

बहरहाल, इस कृति को साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार मिल चुका है. इस लिहाज से यह कहा जा सकता है कि लेखक ने इस कृति को वाकई साहित्य माना होगा और उसे इस पुरस्कार के लिए नामित भी किया होगा. तो भूमिका और पुरस्कार मिलाकर एक संभ्रम की स्थिति है. काहे कि, अगर यह उपन्यास, बकौल लेखक, साहित्य नहीं है, तो उन्हें यह पुरस्कार लेने से इनकार कर देना चाहिए था.

इस उपन्यास को शैली या कथ्य के लिहाज से परखा नहीं जा सकता.

कई दफा पढ़ते हुए आपको इसमें मौजूदा धारा के बनारस केंद्रित आधा दर्ज़न उपन्यासों की झलक दिखेगी. संवादों में क्षितिज रॉय के उपन्यास ‘गंदी बात’ का अक्स दिखेगा. पर अगर आपने या आपके परिवार में किसी ने कभी पटना, इलाहाबाद, दिल्ली के नॉर्थ या साउथ कैंपस में विजयनगर, मुखर्जी नगर और कटवारिया सराय में कभी सिविल सेवा की तैयारी की होगी, तो यह उपन्यास एक दफ़ा आपको ज़रूर पढ़नी चाहिए.

उपन्यास के 95 फ़ीसद पन्नों में सिविल सेवा के अभ्यर्थियों के नाकामियों का दास्तान है. और नायक के, यानी डार्क हॉर्स की लंतरानियों का भी. पर उसके संघर्ष को बिना दिखाए डेढ़ पैराग्राफ में निपटाकर मृणाल ने सीधे उसे सफल घोषित कर दिया. यहां शैलीगत जर्क दिखाई देता है.

पर, सिविल सेवा अभ्यर्थियों के मानसिकता और मनोविज्ञान को मृणाल ने करीने से पकड़ा है.

उपन्यास में एक संवाद है, ‘जेतना दिन में लोग एमए-पीएचडी करेगा, हौंक के पढ़ दिया तो ओतना दिन में तो आईएसे बन जाएगा.’ यह समझिए उन अभ्य़र्थियों के मनोविज्ञान को पकड़ता है, जो साल-दर-साल किस तरह तैयारियों में जुटे रहते हैं.

डार्क हॉर्स में सिविल सेवा अभ्यर्थियों के ऊंचे और ख़ूबसूरत ख़्वाब हैं. ज़िम्मेदारियों का ज़िक्र है. ठसक है. परिवार और गांव में अपनी इज़्ज़तआफज़ाई और अगली कई पीढ़ियों का उद्धार कर देने का उत्साह है.

मुखर्जी नगर को उकेरते हुए मृणाल एकदम ईमानदार तस्वीर पेश करते हैं. मानो आप एक खिड़की पर बैठकर सारे किरदारों और दृश्यों को सामने साकार होते देख रहे हों. पर साथ ही, इसमें एक फिल्मी और बॉलीवुडीय नाटकीयता भी है.

उसी नाटकीयता में गांव से आए चाचा भी हैं, जो दिल्ली दिखाने की जिद करते हैं. उसी में ग़रीबी भी है, गांव की बिकती हुई ज़मीन भी है. कई दफ़ा हो जाने वाला नवयुवकीय प्रेम भी है.

पर उपन्यास में उस तनावपूर्ण क्लाइमेक्स की कमी है, जो एक कृति को बेहतर बनाती है.

अगर आपने हाल-फिलहाल के हिंदी उपन्यासों को उचटती निगाह से भी पढ़ा हो तो आपको नए क़िस्म के किरदार बमुश्किल ही मिलेंगे. आपको बनारस केंद्रित उपन्यासों के ही पात्र दिखेंगे (शायद नए लेखकों की पौध उसी इलाके से है) बस लगेगा कि थियेटर में पीछे का सेट बदल दिया गया हो. कैनवास बदल गया है किरदार बस अलग कपड़ों में नज़र आते हैं.

हो सकता है हमारे युग का सत्य यही हो.

वैसे, मृणाल की तारीफ़ इस बात में है कि उन्होंने अपने किरदारों को कॉलर पकड़ कर नहीं चलाया है. उनके पात्र जब जो चाहा, बोलते हैं. शायद इसलिए मृणाल अपनी रचना को साहित्य के दर्जे में नहीं रखते.

हालांकि, साहित्य में शुचिता जैसी चीजें बेमानी हैं (गोकि साहित्य समाज का दर्पण होता है) पर, किरदारों में विभिन्नता, उनके भावात्मक यात्रा में आरोह-अवरोह में वैविध्य की उम्मीद तो की ही जा सकती है.

कुल मिलाकर उपन्यास पठनीय तो है, बिकाऊ भी. पर कथ्य के लिहाज से औसत है. मृणाल संभावनाएं जगाने वाले लेखक हैं, इसलिए दिलचस्प होगा कि वह अगली दफ़ा कैसी कहानी लेकर आते हैं.

किताबः डार्क हॉर्सः एक अनकही दास्ताँ… (उपन्यास)

लेखकः नीलोत्पल मृणाल

प्रकाशकः हिन्द युग्म

कीमतः 175 रु. पेपरबैक