पुस्तक समीक्षा: रामकथा के पात्रों का परिष्कृत पुनर्पाठ है आशुतोष राना का ‘रामराज्य’

अभिनेता आशुतोष राना ने रामराज्य में रामायण के पात्रों को नए अंदाज में पेश किया है

रामराज्य का कवर
रामराज्य में रामायण के पात्रों को राना ने अलग अंदाज में पेश किया है

टेलीविजन, फिल्म और रंगमंच की दुनिया में श्रेष्ठ अभिनेता के रूप में स्थापित हो चुके आशुतोष राना एक लेखक, साधक और विचारक भी हैं। उनका लेखक, साधक और विचारक होना उनके नए उपन्यास, ’रामराज्य’ से सिद्ध होता है।

राना के लेखकीय कौशल का अनुमान तो गत वर्ष ही लग गया था, जब उनका एक व्यंग्य संग्रह ’मौन मुस्कान की मार’ प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास में लेखक आशुतोष राना ने अपनी कथा की विषय-वस्तु रामायण को रखा है।

रामायण के पात्रों को लेकर आम जनमानस में छवियाँ पूर्व से ही स्थापित हैं। इस उपन्यास में लेखक आशुतोष राना ने इस महाकाव्य के नायक राम पर तो प्रभावी रूप से लिखा ही है, साथ ही साथ अन्य चरित्रों के विषय में भी नवीनतम सोच के साथ धारणाएं स्थापित करने का प्रयास किया है।

उन्होंने मननायक-जननायक श्री राम के विषय में तो गहरे से पड़ताल की ही है साथ ही साथ रामकथा में कतिपय खलचरित्रों के बारे में नयी सोच के साथ प्रस्तुति दी है।

खलनायक के प्रति सकारात्मक दृष्टि

आशुतोष राना मूलतः रंगकर्मी हैं, वे जानते हैं कि खलनायक ही नायक होने का मार्ग प्रशस्त करते है। सम्भवतः इसीलिए उन्होंने इस उपन्यास में कई खलचरित्रों की नकारात्मकता को भी सकारात्मकता के साथ चरित्र विस्तार देकर अपने उपन्यास में ’राम, ’रामत्व, ’रामराज्य’ की आवश्यकता को प्रकट किया है।

लेखक ‘रामराज’ की जगह ’रामराज्य’ की स्थापना पर अधिक बल देता है। उपन्यास संवादात्मक शैली में लिखा गया है। उपन्यास की भाषा और प्रस्तुति इतनी प्रभावी है कि कई स्थानों पर लेखक अपनी प्रतिभा से अपने पाठकों को चौंकाता है।

कहना न होगा कि यह कृति आशुतोष राना को एक श्रेष्ठ लेखक के रूप में स्थापित करने के लिए पर्याप्त है। स्वयं आशुतोष के शब्दों में “श्रीराम का चरित्र और उनकी कथा, हृदय को आनंद देने के साथ-साथ कई प्रश्नों को भी खड़ा करती थी। ये सभी प्रश्न ऐसे थे जिनसे मेरे हृदय और बुद्धि में निरंतर घर्षण होता रहता था। इसी घर्षण का प्रतिफल है, उपन्यास ’रामराज्य’।”

राम का चुनाव था वनवास

यह उपन्यास ग्यारह शीर्षकों के अन्तर्गत बंटा हुआ है। कैकेयी, सुपर्णा-शूर्पणखा, हनुमान चरित्रों पर आधारित खंड हैं, तो विजयपर्व, पंचवटी, लंका जैसे शीर्षक घटनाओं-स्थानों पर आधारित हैं।

उपन्यास का आरम्भ होता है, ’कैकेयी’ से। इस खंड में आशुतोष राना ने कैकेयी के चरित्र को पर्याप्त ग्लोरीफाई किया है। कैकेयी के व्यक्तिगत सौंदर्य व गुणों का बखान करने में आशुतोष राना ने कोई कमीं नहीं छोड़ी है।

आशुतोष के शब्दों में, कैकेयी रूप सौंदर्य की दृष्टि से तो आकर्षक है ही साथ ही वह राजा दशरथ के चारों पुत्रों की गुरु भी है। वह उन चारों बच्चों की वृत्ति, प्रवृत्ति, भाव और स्वभाव को भली भाँति जानती है।

कई प्रसंगों के माध्यम से लेखक ने कैकेयी के चरित्र को अत्यन्त आकर्षक बनाने का प्रयास किया है। लेखक यह भी दिखाता है कि राम का वनवास कैकेयी के कारण नहीं हुआ था। वह तो राम स्वयं ही जब कैकेयी से अनुरोध करते हैं कि उन्हें सिंहासन की अपेक्षा कुश-आसन से अधिक मोह है, क्योंकि जो कार्य कुश-आसन पर बैठकर सम्पन्न किए जा सकते हैं वे सिंहासन पर बैठकर सम्पन्न नहीं किए जा सकते।

राम, कैकेयी से आग्रह करते हैं कि “मैं चाहता हूँ कि आप पूज्य पिताजी से बात करें कि वे राम को अपने मन के मार्ग पर नहीं अपितु वन के मार्ग पर चलने दें।”

राम और कैकेयी का अनूठा सम्बन्ध

इस उपन्यास में पाठकों को राम और कैकेयी के बीच अनूठा सम्बन्ध देखने को मिलता है। इन दोनों के बीच होने वाले संवादों में कितने ही विषयों को स्पर्श किया गया हैं, वह इस खंड की उपलब्धि है।

इसी वार्तालाप के दौरान राम के माध्यम से लेखक कहता है कि संसार में मूलरूप से दो विचारधाराएँ होती हैं। एक सम्पत्ति को ही संस्कृति मानने वाले होते हैं और दूसरे वे, जिनके लिए संस्कृति ही सम्पत्ति होती है। एक उपभोक्तावादी वर्ग होता है और दूसरा उपयोगिता के सिद्धांत में विश्वास रखने वाला समुदाय।

उपभोक्ता संस्कृति को मानने वाला वर्ग, सम्पत्ति को ही संस्कृति मानकर उसका रक्षण और वर्धन करता है। सम्पत्ति को ही संस्कृति मानने वाले मनुष्य ही असुर कहलाते है। असुर अतिक्रमण में विश्वास करते हैं। वे सब कुछ लूट लेने के भाव से भरे होते हैं। ये संसार के समस्त वैभव को, सम्पत्ति को और संसाधनों को अपनी शक्ति के दम पर अपने अधीन कर उस पर आधिपत्य स्थापित करना चाहते हैं।

आशुतोष इस नये मिथक को अत्यन्त खूबसूरती के साथ गढ़ने का प्रयास करते हैं कि राम का वनागमन कैकेयी की महत्वाकांक्षा के कारण न होकर वस्तुतः स्वयं राम की इच्छा पर ही हुआ था।

लेखक इस खंड से कैकेयी के विषय में एक नयी धारणा और नया मिथक पाठकों के मनो-मस्तिष्क में स्थापित करने का प्रयास करता है।

शूर्पणखा और दण्डकारण्य

इसी प्रकार दूसरे खंड में लेखक अपने पाठकों को सीधे दंडकारण्य से जोड़ता है। यहाँ की अधिष्ठात्री सुपर्णा है, जिसे शूर्पणखा के नाम से जाना जाता है। इस क्षेत्र में ही श्रीराम अपने वनवास के अन्तर्गत एक बड़ा कालखंड व्यतीत करते है।

इस समयावधि में वे दंडकारण्य के वनवासी नागरिकों के आचार व्यवहार में व्यापक परिवर्तन लाते हैं और उन्हें मानव होने का बोध कराते हैं, और उनमें आक्रान्ताओं से लड़ने का साहस उत्पन्न करते हैं।

यह ’रामराज्य’का अत्यन्त सुन्दर पक्ष है। शूर्पणखा इसी दंडकारण्य में राम को देखती है। शूर्पणखा का मन राम के प्रति अनुराग से भर जाता है। कालांतर में शूर्पणखा का अंग भंग होने की घटा तो सर्वविदित है।

उपन्यास के इस खंड में शूर्पणखा को एक अलग ही दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। आशुतोष की शूर्पणखा में बुद्धिमता है, साहस है और वह अपने भाई रावण के सर्वनाश के लिए प्रतिबद्ध है, क्योंकि रावण ने उसके पति की हत्या की थी। वह प्रतिशोध की ज्वाला में जल रही है, वह अवसर की तलाश में है और यह अवसर उसे लक्ष्मण द्वारा अंग-भंग किये जाने के उपरान्त प्राप्त होता है।

विदूषी शूर्पणखा

लेखक अपने भाई लंकेश को राम से अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए प्रेरित करती है। इस पूरे प्रसंग में लेखक आशुतोष राना ने अपनी कल्पनाशीलता का अदभुत परिचय दिया है। इस खंड में उन्होंने शूर्पणखा को विदुषी, चिन्तनशील, आकर्षक स्त्री बताते हुए योजनाबद्ध तरीके से लंकेश को समाप्त करने के लिए जिम्मेदार बताया है। इस खंड में शूर्पणखा और राम के बीच संवाद अत्यन्त प्रभावी हैं। इसके अतिरिक्त इस खंड में ही शूर्पणखा का स्वंय से साक्षात्कार तथा ऋषि विश्रवा के साथ वार्तालाप भी पाठकों को आनन्दित करते हैं।

‘पंचवटी’ खंड में राम द्वारा वनवासियों की सहायता से खर, दूषण, त्रिशरा सहित सहस्त्रों सैनिकों को पराजित किये जाने का वर्णन किया है। यह खंड अन्य खंडों की अपेक्षा अति संक्षिप्त है किन्तु इसमें राम और सीता के आपसी सम्बन्धों और उनके बीच होने वाले बौद्धिक, किन्तु स्नेहिल वार्तालाप को प्रभावी ढंग से व्यक्त किया गया है।

एक पति और पत्नी के मध्य हुए संवाद कितने सारगर्भित और वैचारिक हो सकते हैं, यह राम और सीता के वार्तालाप से समझा जा सकता है। इस खण्ड में एक स्थान पर राम सीता से कहते है कि, “किसी स्त्री का आहत अहम शक्तिशाली पुरूष के सामथ्र्य से भी अधिक घातक होता है सीता। स्त्री की क्षमता अपार होती है। वह शून्य में भी सृजन कर सकती है और सृजन को भी शून्य बना सकती है।”

इस प्रकार के संवाद यद्यपि प्रथम दृष्टतया मंचीय प्रतीत होते हैं, किन्तु ये संवाद ही उपन्यास की रोचकता बढ़ाते हैं। ये संवाद लेखक के वैचारिक परिश्रम को अत्यन्त प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

कल्पनाशील हनुमान खण्ड

उपन्यास के ’हनुमान” खंड में आशुतोष राना ने पुनः अपनी कल्पनाशीलता का भरपूर उपयोग किया है। इस खंड में लेखक ने यह कल्पना की है कि जब श्रीराम अपनी पूरी सेना के साथ समुद्र के तट पर पहुँच गये तो अपने अभियान को आरम्भ करने से पूर्व रावण को उपासक के रूप में बुला लाते हैं। रावण, श्रीराम को विजयीभव का आशीर्वाद देकर लंका की और प्रस्थान कर जाता है।

यह कहानी पाठकों के लिए नयी कल्पना है, किन्तु आशुतोष अपने व्यक्गित जीवन में स्वयं ही शिव के बड़े भक्त हैं, अतएव यह घटना निश्चित रूप से उनके लेखक मन द्वारा गढ़ी गयी घटना प्रतीत होती है।

इस उपन्यास का आठवां खंड ’कुम्भकर्ण’ है। जिसमें उन्होंने कुम्भकर्ण के व्यक्तित्व के कई अपरिचित पहलुओं को पाठकों के सामने लाने का प्रयास किया है।

लेखक की दृष्टि में कुम्भकर्ण एक विकट योद्धा ही नहीं, एक महान वैज्ञानिक भी था। रावण के समस्त प्रयोगों, वैज्ञानिक सूत्रों, आविष्कारों को मूर्त रूप प्रदान करने का कार्य कुम्भकर्ण किया करता था। उसके द्वारा किये जा रहे भीषण वैज्ञानिक आविष्कारों को संसार से गुप्त रखने के लिए रावण ने सम्पूर्ण जगत में यह प्रचारित कर दिया था कि उसका भाई कुम्भकर्ण वर्ष में छः मास निद्रामग्न रहता है।

कुम्भकर्ण का लौह यंत्र

लेखक ने उपन्यास में रोचकता बढ़ाने के लिए युद्व के दौरान कुम्भकर्ण मनुष्य के जैसे दिखाई देने वाले अत्याधुनिक लौह यंत्र में सवार होकर आना बताया है। यह प्रसंग आज के रोबोट युग की परिकल्पना से प्रभावित लगता है। इस युद्ध में राम और रावण के बीच हुए संवाद अत्यन्त विचारोत्तेजक हैं।

रावण और मंदोदरी के बीच हुए वार्तालाप भी इस खंड के अत्यन्त भावपूर्ण प्रसंग है। अन्ततः रावण का पराभव हो जाता है, और राम-रावण युद्ध समाप्त हो जाता है।

अन्तिम खंड ’सीता परित्याग’ है। इस खंड में राम-सीता के अलग होने का वर्णन है। दुर्मुख द्वारा सीता पर आरोप लगाए जाने के कारण राम द्वारा अधूरे मन के साथ सीता का त्याग करते हैं। पूरे उपन्यास में राम को पहली बार अपमान की अग्नि में जलते हुए दिखाया जाता है। इस खंड में सीता-राम के वार्तालाप अद्भुत हैं।

सुरुचिपूर्ण संस्कृतनिष्ठ भाषा

इस उपन्यास का सर्वाधिक सशक्त पक्ष इसकी भाषा है। भाषा यद्यपि संस्कृत निष्ठ है, किन्तु इतनी प्रवाहमय है कि पाठकों को सुरुचिपूर्ण लगती है। यदि कहीं कोई क्लिष्ट या गूढ़ शब्द आता भी है, तो उसका अर्थ भी उसी पृष्ठ पर नीचे दे दिया गया है। पूरे उपन्यास में स्थान-स्थान पर ऐसे विचारपूर्ण संवाद पढ़ने को मिलते हैं, जो जीवन के दर्शन का उद्घोष करते हैं। यह लेखक की कुशलता है कि वे इस दर्शन को अलग-अलग पात्रों के माध्यम से व्यक्त कराते हैं।

अंततः ’रामराज्य’ जनश्रुतियों में रची-बसी और जनमानस के मनोमस्तिष्क में स्थापित रामकथा को एक नए कोण से देखने की कोशिश है। कैकेयी और शूर्पणखा जैसे खलचरित्रों की नकारात्मक छवि को बदलने के लिए जो प्रयास आशुतोष राना ने किए हैं, क्या उससे इन खलचरित्रों की पूर्व स्थापित छवि बदलेगी यह एक सवाल है।

’रामराज्य’ निश्चित रूप चरित्रों के प्रकटीकरण और प्रस्तुतिकरण में अपने नवीन प्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण कृति सिद्ध होगी। ऐसे पाठक जो विचारशील हैं, उन्हें यह कृति लेखक आशुतोष राना की प्रयोगधर्मिता के कारण प्रभावित करेगी। बहरहाल एक प्रयोगधर्मी अभिनेता तथा लेखक आशुतोष राना को उनके साहसिक व वैचारिक साहित्यिक प्रयास के लिए साधुवाद।

(लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी हैं।)