विरासतः राजिन्दर सिंह बेदी की एक चादर मैली सी

राजिंदर सिंह बेदी के उपन्यास एक चादर मैली सी पर फिल्म भी बनी जिसमें ऋषि कपूर, हेमा मालिनी और पूनम ढिल्लों ने अभिनय किया था

एक चादर मैली सी को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था
एक चादर मैली सी को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था

राजिन्दर सिंह बेदी सियालकोट में पैदा हुए थे. लेकिन उनका पालन-पोषण और शिक्षा लाहौर में हुई. डी.ए.वी. कॉलेज लाहौर से 1933 में एफ.ए. करने के बाद उसी साल पोस्ट आफिस में नौकरी करने लग गए. नौ साल के बाद इस्तीफ़ा देकर 1943 में रेडियो स्टेशन, दिल्ली के साथ संपर्क कायम कर लिया. आखिरकार 1949 में बम्बई आ गए और फ़िल्मी जीवन का आरंभ किया.

काजल में धर्मेंद्र थे
काजल में धर्मेंद्र थे

बेदी साहिब सारी उम्र तरक्की-पसंद लहर के साथ जुड़े रहे. उन्होंने कहानियाँ और नाटक लिखे, लेकिन उनके उपन्यास ‘एक चादर मैली सी’ का उर्दू साहित्य में विलक्षण स्थान है.

उनकी रचनायें हैंः

कहानी संग्रह: दाना ओ दाम, ग्रहण, कोख जली, अपने दुख मुझे दे दो, हाथ हमारे कलम हैं, मुक्ति बोध;

नाटक: सात खेल, बेजान चीज़ें;

उपन्यास: एक चादर मैली सी.

दस्तक का आवरण, साभारः पेंगुइन-हिंद पॉकेट बुक्स
दस्तक का आवरण, साभारः पेंगुइन-हिंद पॉकेट बुक्स

बेदी का उपन्यास एक चादर मैली सी पेंगुइन-हिंद पॉकेट बुक्स ने प्रकाशित किया है. पेंगुइन की अनुमति से हम उनके इस उपन्यास का एक हिस्सा प्रकाशित कर रहे हैंः

एक चादर मैली सी

आज शाम सूरज की टिकिया बहुत ही लाल थी. आज आसमान के कोटले में किसी निर्दोष की हत्या हो गई थी और खून के छींटे नीचे बकाइन के पेड़ पर पड़ते हुए तिलोके के आंगन में टपक रहे थे. टूटी-फूटी कच्ची दीवार के पास, जहां घर के लोग कूड़ा फेंकते थे. डब्बू मुंह उठृउठाकर रो रहा था. दोपहर के लगभग बड़ी जैल के कारिन्दे कुत्तों को गोली डालने के लिए आए तो डब्बू बच गया. वह तिलोके के घर कहीं आंगन में पड़ी घड़ौंची के नीचे सो रहा था. ऊपर मुलतानी मिट्टी के घड़े रिस रहे थे और नीचे कच्ची जमीन को ठंडी और सुगन्धित बना रहे थे. और डब्बू उस ठंडक और बू-बास से पूरा लाभ उठा रहा था…कुछ देर में वह उठकर अकड़ा, मुंह खोलकर जमुहाई ली और फिर बाहर चला आया. तब तक उसकी चहेती कुतिया बौड़ी की आंखें कांच हो चुकी थीं. …बौड़ी के पास पहुंचकर डब्बू ने उसे एक-दो बार सूंथा और फिर अचानक एक ओर चल दिया, जैसे कोई बात ही नहीं. तिलोके की पत्नी रानी और उसकी पड़ोसिन चन्नो एक दूसरी का मुंह ताकने लगीं. चुन्नी ने अपनी कोके वाली नाक पर उंगली धरी, फिर एक लम्बी सांस भरी और बोली-“हां ! मर्द की जात… सब एक – सी होती है…” रानों के भारी पपोटे फड़फड़ा रहे थे, जैसे कोठई कपड़ा धोकर सुखाने के लिए उसे छांट रहा हो. फिर कुछ सीलकर आंखे पोंछते हुए रानो ने चन्नों की ओर देखा और मुस्कुराकर बोली- “अड़िए ! तेरा डब्बू तो ऐसा नहीं…?”

राजिन्दर सिंह बेदी के संग्रह लंबी लड़की का कवर, फोटो सौजन्यः पेंगुइन-हिंद पॉकेट बुक्स
राजिन्दर सिंह बेदी के संग्रह लंबी लड़की का कवर, फोटो सौजन्यः पेंगुइन-हिंद पॉकेट बुक्स

इसके उत्तर में चन्नों ने रानों को एक मर्दों वाली गाली दी, जिससे फिर आप ही लजाकर अपने घर की ओर भाग गई. रानो भी अन्दर पहुंचकर काम में जा रगी. सांझ के समय जब वह रात की आह और दिन की वाह का कूड़ा फेंकने के लिए बाहर आई तो दोपहर की सब घटनाएं भूल चुकी थी. जिस हाथ से उसने कूड़ा फेंका, उसी से झाड़ू फटकारती हुई वह मुंह उठा-उठाकर रोने वाले डब्बू को दुरदुराने लगी- “हात ! …हात मुरदे ?… यहां धरा ही क्या है तेरे रोने को? रोना ही है तो जा, सामने चौधरियों के घर जाकर रो, जहां दौलत के ढेर हैं, मर्दों दी लाम लगी है….”

चौधरी मेहरबानदास के रानो को जाने काहे का वैर था. शायद इसलिए कि तिलोके रानो के घरवालो को बदमाशी की दीक्षा मेहरबानदास के हाथों मिली थी. फिर गांव की औरतों की अजीब बात- अपने मर्द का कुछ पता नहीं, दूसरियों के मर्दों का खाया-पिया सब मालूम! रानो अपने तिलोके के बारे में नवाब इक्केवाले या गुरुदास की पत्नी से सुनती तो जल-भुनकर राख हो जाती. राख नहीं-कोयला ! क्योंकि अंदर से रानो बहुत पक्की थी. तिलोका घर लौटता तो वह उससे लड़ती. उसे नोचती, काटती और आप ही मार खाती हुई एक ओर जा बैठती और सोचती- एक तरह से अच्छा ही है जो बाहर ही गुस्सा निकाल आता है अपना…मेरे जी का जंजाल तो नहीं होता!