मधुमती, बंदिनी, और बेनजीरः बिमल रॉय की विरासत पर छूट-से गए नोट्स

बॉलीवुड के रेट्रो थीम में हेयर स्टाइल तो अपनाया पर उस जमाने के सिनेमा का नैरेटिव नहीं

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मधुमती से हिन्दी सिनेमा में पुनर्जन्म की कहानियों की शुरुआत हुई

आज अगर बिमल राय सरीखे फिल्मकार जिन्दा होते तो फिल्मी दुनिया के हालात से थोडा नाखुश जरूर होते। सीनियर लोगों की विरासत को जिन्दा रखने में काफी हद तक नाकाम रहा है बालीवुड।

आज का सिनेमा विरासत को कुल मिलाकर अवार्डस व रिट्रोस्कटीव के दायरे तक बचाए हुए है। फिल्मों के जरिए किसी के टाईप आफ सिनेमा को बरकरार रखने की तरफ फिक्र दिखाई नहीं पडती। गुजरा वक्त यह उम्मीद रख कर चला गया कि आगे चलकर कोई उनके तरह का काम आगे भी करेगा। मुख्यधारा फ़िल्मों ने इसे गुजारिश तरह भी लिया होता तो बिमल दा का सिनेमा आज की फिल्मों में बचा रहता।

बिमल राय सरीखे महान फिल्मकारों की फिल्में इतिहास के दायरे तक रहने को मजबूर हैं। बेमानी से विषय ‘किसी नज़र में दमदार’ पर काफी मेहनत व दौलत लुटा दी जाती है।

बिमल राय के निर्देशन में बनने वाली पहली फिल्म ‘उदय पथ’ बांग्ला सिनेमा की बडी उपलब्धि मानी जाती है। चालीस दशक के शुरूआती दौर में बहुत से फिल्मकार कलकत्ता से बंबई कूच कर गए। द्वितीय विश्व युध एवं ‘विभाजन’ की त्रासदी ने उस समय के बांगला सिनेमा का सबसे ज्यादा नुक्सान किया।

बंबई आकर उन्होंने बिमल राय प्रोडक्शन’ को कायम करते हुए ‘दो बीघा जमीन’ बनाई। इस गैर-मामूली फिल्म को न सिर्फ देश बल्कि पूरी दुनिया में काफी सराहना मिली। अपने मिजाज की यह पहली भारतीय फिल्म रही, जिसे आज भी सिनेमा की उल्लेखनीय उपलब्धि माना जाता है।

यह समकालीन सामाजिक विसंगतियों पर बनाई गई अनोखी फिल्म थी। बहुत से मामलों में फिल्म को ‘समानांतर सिनेमा’ की गाईड कहा जा सकता है। बिमल राय की ज्यादातर फिल्मों में कला व सामाजिक पक्षों का खूबसुरत मेल देखने को मिलेगा, दो बीघा जमीन इसकी बेहतरीन मिसाल है।

उनकी ‘मधुमती’ पुनर्जन्म की दिलचस्प कहानी लेकर आई थी। सिलसिले को पूरा करने के लिए दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला के किरदार एक से अधिक बार रचे गए हैं।

इस अवधारणा में आनंद और मधु की प्रेम कहानी का दिलचस्प अंत देवेन्द्र और राधा में हुआ। मधु, माधवी और राधा के किरदारों से वैयजंती माला प्रमुखता से उभर कर आई हैं। आनंद एवं मधु की रूहानी मुहब्बत जो कभी क़ुदरत की गोद में सांसे ले रही थी, त्रासद रुप से इन्ही फिजाओं में सिमट कर मिट गई।

हरित – नैसर्गिक आबो हवा में पल रही मुहब्बत को विकास के ठेकेदार (पूंजीवादी खलनायक) की नज़र लगी ।

खलनायक को बर्दाश्त नहीं कि मधु उसे न चाहकर किसी और को तवोज्जोह दे। वह पूंजीवादी व्यवस्था का फरमाबरदार है, टिम्बर कंपनी का मालिक होने के नाते प्राकृतिक संपदा एवं भोले-भाले पहाडी लोगों का शोषण करता है।

पान राजा जैसे लोग कंपनी के गैर-इंसानी फितरत के खिलाफ हैं। मधु पान राजा की खूबसूरत बेटी है, पूंजीवादी पाश से अनजान खुली फिजाओं की गोद में आज़ादी से गुनगुनाती है।

हिन्दी सिनेमा में क़ुदरती फिजाओं की खूबसुरती (दिलकश नज़ारे)  ‘मधुमती’ से निखर कर आई थी।

क्या मूल सेट-अप से अलग होकर ‘मधुमती’ की वजूद में आ सकती थी? शायद नहीं क्योंकि मधु का होना इसी फिजा की देन है। क़ुदरती नजारों के बीच गूंजती पुकार ‘आ जा रे परदेशी’ कहानी के खास सेट-अप को पूरा करते हैं।

मधुमती प्रकृति की गोद में पली-बढी, इस माहौल से उसे मुहब्बत है। फिल्म की पूरी कहानी इसी दिलकश फिजा में सांस ले रही है । इसी वजह से ‘जंगलों की हिफाजत’ की बात फिल्म में आई है। पहाडी लोग व पान राजा टिम्बर कंपनी के कामकाज के खिलाफ हैं। कंपनी फिजाओं में मौजूद खुदाई देन को मिटाने को तैयार खडी है।

उनकी ही एक फिल्म ‘बेनजीर’ की कहानी तीस दशक के बिहार में एक आपदा से शुरू होती है। जलजले से जान व माल का भारी नुकसान में बहुत थोडी ही चीजें बाक़ी रह सकी। जो भी इस अज़ाब से बच सका खुशनसीब था, जिंदगी की अमान में होने वाली एक लडकी जिन्दा रह गई।

तक़दीर ने उसे भलमनसाहत वाला आदमी नसीब कर दिया, जिसने उसे अपनी औलाद की तरह अपना लिया। उम्मीद की जा रही थी कि कहानी आगे हिन्दी सिनेमा की फार्मूला कहानियों की राह जाएगी, लेकिन बिमल दा का नजरिया कुछ अलग था।

बडी होकर वो लडकी लखनऊ की मशहूर स्टेज कलाकार ‘बेनजीर’ बन जाती है।

कहानी नवाबों के शहर लखनऊ में किरदारों को बयान करती है। नवाब अफसर हुसैन (अशोक कुमार) बेनजीर (मीना कुमारी) की कला व अदाओं के दीवाने होकर उससे इश्क करते हैं।

दर्द-ए-सितारा मीना कुमारी का किरदार यहां भी एक ट्रेजिक फ्रेम में जी रहा है। न जाने क्यों लेखक उनकी शख्सियत को तकलीफ भरे किरदारों में ज्यादा तस्व्वुर करते थे? ताज्जुब नहीं कि मीना कुमारी का दुख परदे के परे जिंदगी में भी कायम था। मीना कुमारी की यह फिल्म ‘पकीज़ा’ का पहली किस्त की तरह मालूम पडती है।

आपकी बहुचर्चित’ सुजाता’ छुआछूत की कुप्रथा को उजागर करती शानदार फिल्म थी। असाधारण फिल्म होने के कारण इसे कई पुरस्कार भी मिले।

इसी स्तर की एक अन्य फिल्म ‘ बंदिनी’ भी नहीं भूलाई नहीं जा सकती।

बिमल दा के पास विषयों की ज़बरदस्त वैरायटी थी। इन विषयों पर आपने ऐसी फिल्में बनाईं जिस पर आज भी सिनेमा गर्व कर सकता है।

साहित्य को भी सिनेमा में सफलता पूर्वक लाकर बिमल दा ने मिसाल कायम की।  विडम्बना देखिए कि आज आपको याद भी नही किया जाता। बिमल राय जैसा गैरमामूली फिल्मकार मर सकता है क्या!