गीता दत्त: तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले, अपने पे भरोसा है तो ये दाँव लगा ले

गुरु दत्त और गीता रॉय ने सन 1953 में की थी शादी।

गाने के दिलकश अंदाज की मल्लिका गीता दत्त ऐसी फनकार थीं जिन्हें हर तरह के गीत गाने में महारत हासिल थी. हिंदी फ़िल्म संगीत में सबसे मख़मली आवाज़ इन्हीं की थीं. गायकी और अपनी अदाकारी से लोगों के दिल पर राज़ करती थी. पचास और साठ के दशक में अपने करियर के शिखर पर थी.

उन्होंने ऐसे दौर में अपनी अलग पहचान बनाई, जब लता मंगेशकर के जादू की शुरूआत हो चुकी थी. गीता दत्त ने करीब तीन दशक लंबे फिल्मी सफर में तरह तरह के गीतों को स्वर दिया. आज भी संगीत प्रेमियों पर उनका जादू कायम है.

सोलह साल की उम्र में मिला पहला ब्रेक

बांग्लादेश का एक शहर है फरीदपुर. इसी शहर में 23 नवंबर 1930 को गीता दत्त का जन्म हुआ. उस वक्त गीता दत्त का नाम गीता रॉय चौधरी हुआ करता था. इनके पिता जम़ींदार थे. चालीस के दशक में परिवार जमीन-जायदाद छोड़कर कलकत्ता आ गए. साल 1942 में मुंबई शिफ्ट हो गए. दादर में एक अपार्टमेंट में रहने लगे.

गीता रॉय की मां अमिय देवी कवियत्री थीं. भाई मुकुल रॉय संगीतकार थे. गीता, अपनी मां के लिखे और भाई के संगीतबद्ध गीतों को गाती रहती थी.

गीता को संगीत का शौक़ बचपन से थे. हरदम अपने कमरे में गुनगुनाती रहती थी. ऐसे ही एक बार वहां से एक संगीतकार गुजर रहे थे. गीता की आवाज सुनते ही वो वहीं रूक कर सुनने लगे. उसके बाद उन्होंने गीता के माता पिता से कहा कि आप अपनी बच्ची को संगीत जरूर सिखाएं. उस वक्त शायद ये बात कोई नहीं जानता था कि आगे चलकर वहीं संगीतकार गीता रॉय को फिल्मों में गाने का मौका भी देगा. वो संगीतकार हनुमान प्रसाद थे.

उन्होंने साल 1946 में ‘भक्त प्रहलाद’ फिल्म में गीता रॉय को गाने का मौका दिया.वो भी सिर्फ़ दो लाइन. वो दो लाइनें स्टूडिओ में मौजूद सभी को पसंद आईं.

 

हर तरह के गीत गाने के लिए मशहूर थीं

‘भक्त प्रहलाद’ में अपनी आवाज़ से लोगों का दिल जीतने के बाद संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन ने गीता को एक बड़ा मौक़ा दिया. फ़िल्म ‘ दो भाई’ में गीता को गाने का मौक़ा दिया. इस फ़िल्म का एक गीत ‘मेरा सुंदर सपना बीत गया’ सुपरहिट हुआ. आवाज़ दिया था गीता दत्त ने. इसके बाद गीता दत्त ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. बुलंदियों को छूती गईं.

गीता दत्त ने फिल्म ‘बाजी’ के गीतों में अपनी मादक आवाज का जादू जगाकर जल्द ही संगीत जगत पर छा गईं. उस जमाने की नई पीढ़ी की पहली पसंद बनकर उभरीं.
गीता ने अपने करियर में करीब 1200 हिंदी गाने गाए. आवाज में बंगाली खनक उन्हें अपने जमाने की दूसरी गायिकाओं से अलग करती थी. संगीत निर्देशक एस. डी. बर्मन ने उनकी आवाज की इस खासियत का ‘देवदास’ और ‘प्यासा’ में अच्छा इस्तेमाल किया और इन फिल्मों के गाने बहुत पसंद किए गए. ‘प्यासा’ का गीत’, ‘आज सजन मोहे अंग लगा लो’, बंगाली ‘कीर्तन’ के हिन्दी में अनुवादित भजन भी गाया.

गीता दत्त के मशहूर गानों में ‘मेरी जान मुझे जान न कहो’, ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले’, ‘जाने कहां मेरा जिगर गया रे’, ‘कोई चुपके से आ के’, ‘जा जा जा बेवफ़ा’, ‘वक़्त ने किया क्या हसीन सितम’ शामिल हैं.

हिन्दी फिल्मों में हर तरह के गीत गाने की क्षमता का प्रदर्शन सबसे पहले गीता ने ही किया. चाहे रूमानी गीत हों, तेज संगीत वाले गाने हों, अध्यात्मिक गीत हों या फिर गम भरे नग्मे हों, इस फनकार ने हर गीत को बखूबी गाया. सुनने वालों को मंत्रमुग्ध किया.
वहीदा की वजह से शादीशुदा ज़िंदगी में आई खटास

बात है पचास के दशक की. गीता दत्त देव आनंद के घर आती-जाती रहती थीं. अच्छी दोस्ती थी. एक दिन गीता जब देव आनंद के घर गईं, तो वहां गुरु दत्त भी मौजूद थे. देव आनंद के कहने पर गीता ने गाना गाया. उस गाने को सुनकर गुरु दत्त ने अपनी फ़िल्म ‘ बाजी’ के लिए गीता को गाना गाने का ऑफर दिया. गीता दत्त ने ऑफर स्वीकार किया.

बाजी के सेट पर दोनों की दोस्ती बढ़ने लगी. गीता दत्त, गुरु दत्त से मिलने उनके घर जाया करती थीं. अपने घर से यह कह कर निकलती थीं कि वो गुरु दत्त की बहन से मिलने जा रही हैं.

साल 1951 में फ़िल्म ‘बाजी’ परदे पर आई. फ़िल्म सुपरहिट हुई. इस फ़िल्म का एक गाना ‘तदबीर से बिगड़ी हुई तक़दीर बना ले’ मशहूर हुआ. इस गाने को गीता दत्त ने गाया था.

इसके बाद दोनों की दोस्ती प्यार में तब्दील हो गई. दोनों ने 26 मई 1953 में शादी कर लिया. अब गीता रॉय हो गईं गीता दत्त. इनके तीन बच्चे हुए. तरुण, अरुण और नीना.

गीता दत्त की शादीशुदा जिंदगी में उस समय भूचाल आया जब गुरु दत्त का नाम एक्ट्रेस वहीदा रहमान से जुड़ा. गुरु दत्त की फिल्म ‘प्यासा’ जब बन रही थी. उस फ़िल्म में गुरु दत्त ने, वहीदा को बतौर कलाकार काम दिया. अफेयर की चर्चाएं होने लगीं. तभी से दोनों के रिश्तों में खटास आ गया.

बाद में गुरु दत्त, गीता दत्त को लेकर एक फ़िल्म बनाना चाहते हैं. उस फ़िल्म का नाम ‘गौरी’ था. इस फ़िल्म में गीता दत्त को गायिका का किरदार निभाना था. लेकिन अफेयर की ख़बरों से नाराज़ गीता दत्त ने उनके साथ फ़िल्म करने से मना कर दिया. कुछ दिन शूटिंग चली, लेकिन फ़िल्म पूरी नहीं हो पाई. इससे गीता दत्त के करियर पर काफ़ी बुरा असर पड़ा.

वो काम को लेकर ढीला रवैया अपनाने लगीं. वक़्त देकर भी नहीं पहुंचती थीं. संगीतकार उनसे नाराज़ हो गए. संगीत निर्देशक एसडी बर्मन भी आशा भोंसले को तरफ़ रूख कर लिए.

पारिवारिक समस्याएं बढ़ती जा रही थीं. साल 1964 में शराब पीने और नींद की गोलियां खाने की वजह से गुरु दत्त का निधन हो गया.
गुरुदत्त की मौत के बाद गीता दत्त को गहरा सदमा पहुंचा. अपने आप को नशे में डुबो दिया. सत्तर के दशक में गीता दत्त की तबीयत ख़राब होने लगी. 20 जुलाई 1972 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया.