शख्सियतः अरुण गोविल से बहुत पहले राम की तरह पूजे जाते थे बड़े परदे के राम एक्टर प्रेम अदीब

टेलिविज़न के वक़्त में भले ही अरुण गोविल बतौर भगवान राम लोगों के दिल में बसे हों, पर बड़े परदे पर श्रीराम की भूमिका निभाने वाले प्रेम अदीब लोगों के बीच पूजे जाते थे

हिंदी सिनेमा में राम के रूप में प्रेम अदीब मशहूर रहे
हिंदी सिनेमा में राम के रूप में प्रेम अदीब मशहूर रहे

भारतीय सिनेमा में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम पर कई फिल्में बनी. कई अदाकारों ने श्रीराम का चरित्र निभाया. साहू मोदक, महिपाल, त्रिलोक कपूर, अभि भट्टाचार्य, मनहर देसाई, अनंत कुमार, चंद्रकांत जैसे अभिनेताओं ने भगवान राम का किरदार निभाया.

लेकिन श्रीराम के परदे पर रूप की बात आते ही अभिनेता प्रेम अदीब का ख़्याल सबसे पहले आता है. टेलीविज़न युग में यह ख्याति अरुण गोविल के नाम दर्ज है. बहरहाल वो दूसरी कहानी है.

प्रेम अदीब ने ‘भरत मिलाप’, ‘रामराज्य’, ‘रामबाण’, ‘राम-विवाह’, ‘रामनवमी’, ‘राम-हनुमान युद्ध’, ‘राम लक्ष्मण’, ‘रामभक्त विभीषण’ जैसी मशहूर फिल्मों में श्रीराम का किरदार निभाया.

सिनेमा के दुनिया के ‘राम’ शिव प्रसाद अदीब का जन्म 10 अगस्त, 1916 उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ था. आपके पिता पंडित रामप्रसाद वकालत करते थे.

साहित्य की तरफ़ परिवार का रुझान शुरू से रहा. साहित्य में विशेष योगदान के लिए नवाब वाजिद अली शाह ने आपके पिता पंडित रामप्रसाद को अदीब के उपनाम से नवाजा. तब से ही परिवार के लोग अपने नामो में अदीब लिखने लगे.  अदीब के शाब्दिक मायने पंडित अथवा विद्वान होते हैं.

मूक फिल्म अनारबाला का किशोर शिव के मन पर बहुत असर पड़ा. ऐसा माना जाता है कि इसी फिल्म को देखने बाद आपने फिल्मों में जाने का मन बना लिया.

मैट्रिक बाद उन्होंने कालेज में दाखिला जरूर लिया मगर पढ़ाई पूरी नहीं पाए. वजह उनकी फिल्मों को लेकर दीवानगी. तीस दशक के मध्य में पढ़ाई बीच में छोड़के कलकत्ता चले आए. महीनों तक शहर के विभिन्न स्टूडियो का चक्कर लगाते रहे. मगर कुछ हाथ नहीं लगा. हिम्मत रखते हुए आगे बढ़े लाहौर की तरफ़. यहां भी ख़ास बात नहीं बनी.

आखिरकार बंबई जाना पड़ा. यहां एक ख्वाबों का जहान इंतज़ार कर रहा था.

मायानगरी ने आपको निराश नहीं किया. बहुत थोड़े समय में राजपूताना फिल्मस में आपको ब्रेक दिया.

राजपूताना के निर्देशक मोहन सिन्हा (फिल्म अभिनेत्री विद्या सिन्हा के पिता) ने आपको पहला ब्रेक दिया. शिव अदीब को ‘प्रेम अदीब’ का स्क्रीन नाम मोहन सिन्हा ने ही दिया था.

‘रोमांटिक इंडिया’ नाम खी फिल्म से एक अन्य कश्मीरी चरित्र अभिनेता जीवन ने भी फिल्मों में कदम रखा था. जल्द ही प्रेम अदीब को फिल्मों में और काम मिलने लगे. वो एक जाना-पहचाना नाम हो गए थे.

दरियानी प्रोडक्शन तले कई फिल्मों में आपको कास्ट किया गया. उस दौर में मशहूर फिल्म बैनर मिनर्वा मूवीटोन की  “खान बहादुर’ तथा ‘तलाक़’ भी आपको मिली. हालांकि लीड एक्टर के रूप में पहली फिल्म  इंडस्ट्रीयल इंडिया ‘निराला हिंदुस्तान’ थी.

निराला हिंदुस्तान में तीन संगीतकारों ने मिलकर इसे धुनों से सजाया था. नौशाद ने बतौर असिस्टेंट काम किया. फिल्म सफल रही थी. प्रेम अदीब को अब लीड के ऑफर मिलने लगे थे.

उस ज़माने की नामी कम्पनी सागर मूवीटोन के साथ आपने तीन फिल्में की. सागर की ‘भोलेभाले’, ‘साधना’ और ‘सौभाग्य’. ‘सौभाग्य’ (1940) में एक बार फिर आपको शोभना समर्थ के ऑपोजिट कास्ट किया गया.

तीस से चालीस दशक के दरम्यान आपकी तकरीबन एक दर्जन फिल्में रिलीज हुई.

चालीस का दशक ने हालांकि प्रेम अदीब के करियर को अधिक मकबूल किया. आपके एक्टिंग करियर का यह सबसे जबरदस्त फेज यह था. इस दौरान आप तीस से अधिक फिल्मों में नजर आए. अभिनय के अलावा फिल्मों का निर्माण भी किया.

इन्होंने ‘राम-विवाह’ (1949) को मिलाकर तीन फिल्में प्रोड्यूस की. ‘राम विवाह’ का निर्देशन भी अदीब ने किया था.  चालीस का दशक बहुत ही ख़ास रहा प्रेम अदीब के लिए.

इस दौर के नामी बैनर ‘प्रकाश पिक्चर्स’ के साथ आपने बहुत शानदार काम किया. प्रकाश पिक्चर्स के साथ विजय भट्ट, दुर्गा खोटे, शोभना सामर्थ, जयंत, जैसे कई मशहूर नाम जुड़े हुए थे.

इस बैनर की भरत मिलाप, रामराज्य , रामबाण प्रेम अदीब की सबसे खास फिल्मों में थी. चालीस दशक के शुरू के सालों में ही अदीब ने अभिनेत्री प्रतिमा से विवाह किया था.

‘भरत मिलाप’ की कहानी लिखी थी मशहूर मराठी लेखक विष्णुपंत औंधकर ने. आप चाहते थे कि ‘अदीब’ राम का रोल करें. विष्णु जी के ऑफर को यह कहते हुए मना करने लगे कि भरत की कहानी में राम का कहां महत्व होगा.

विष्णु जी ने बिंदु को समझाया तो आप राज़ी भी हो गए. संयोग से यह अदीब के  करियर का सबसे अहम रोल साबित हुआ. फिल्म को कलकत्ता के सामारोह में स्वर्ण पदक मिला. उस समारोह में कन्हैयालाल मुंशी भी आए थे. निर्माता विजय भट्ट से भेंट में कन्हैयालाल ने उन्हें ‘लव-कुश’ फिल्म बनाने को कहा.

महात्मा गांधी ने सपनों के रामराज्य के आह्वान को ध्यान में रखते हुए विजय भट्ट ने यह फिल्म बनाई. फिल्म को ‘रामराज्य’ नाम दिया. सुपर सिनेमा बंबई में रिलीज़ हुई थी. उस ज़माने की बड़ी हिट फिल्मों में इसका शुमार है.

‘भरत मिलाप’, ‘रामराज्य’ की अपार सफलता ने जनमानस में भगवान श्री राम की वह छवि बनी जिसमें लोग प्रेम अदीब को अपना आराध्य मानने लगे. प्रेम अदीब भगवान राम के रूप में पूजे जाने लगे. सिल्वर स्क्रीन पर उन्हें केवल भगवान राम का चरित्र निभाने को मिलता था.

अदीब फैंस को समझाते कि उन्हें भगवान राम की पूजा जाना ठीक नहीं. लेकिन जनता के बीच वो राम की तरह स्वीकार्य थे. सिर्फ़ वही नहीं रामराज्य में माता सीता का किरदार निभाने वाली शोभना समर्थ को सीता की तरह पूजा जा रहा था. जनता दोनों में अपने आराध्य  राम और सीता को देखती थी.

महात्मा गांधी ने जीवन सिर्फ़ एक बार फिल्म देखी. फिल्म थी प्रेम अदीब की ‘रामराज्य. यह तथ्य अदीब साहब का सिनेमा में महत्व बताने के लिए काफ़ी है.

गांधीवादी कनु देसाई ने बापू को फिल्म की खूबियां बताई थीं. पचास के दशक में प्रेम अदीब की तीस के क़रीब फिल्में रिलीज हुई. ज्यादातर धार्मिक पृष्टभूमि की कथा थी. साठ दशक में रिलीज हुई ‘अंगुलीमाल’ प्रेम अदीब की आखिरी फिल्म थी. हालांकि अदीब इसका रिलीज न देख सके.

1959 में आपका निधन हो गया था. स्टेशन मास्टर, चांद, दर्शन और अनोखी अदा जैसी सिल्वर जुबली फिल्मों से अदीब मकबूल हुए. लेकिन ‘रामराज्य’ ने आपको हमेशा के लिए अमर कर दिया.