शख़्सियत : चाॅकलेटी चेहरे वाला अभिनेता जिसके खून में बहता है ‘भारत’

भारत कुमार के नाम से प्रसिद्ध मनोज कुमार 84 वर्ष के हो चुके हैं

मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार
मनोज कुमार ने रोमांटिक भूमिकाएं भी बेहतर निभाईं

चाॅकलेटी चेहरा, मंद मुस्कुराहट, नशीली आंखें, गर्दन हल्की सी झुकाकर नायिका को देखते जिस हीरो को देखने के लिए 60 से 80 तक के दशक में लोग दीवाने थे, वो थे मनोज कुमार (24 जुलाई 1937)।

मैं न तो इन दशकों की पैदाईश हूं और न ही मेरे होश संभालने तक मनोज कुमार फिल्मों में बहुत सक्रिय थे। लेकिन फिर भी वो मेरे अब तक के सबसे पसंदीदा अभिनेता हैं।

इत्तेफ़ाक ये है कि मेरा सबसे पसंदीदा गाना ‘चांद सी महबूबा हो मेरी’ मुझे तीन शख़्सों – आनंद बख्शी, मुकेश और मनोज कुमार से बांधकर रखता हैं। इससे बड़ा इत्तेफ़ाक ये है कि 21 जुलाई को मेरे इस पंसदीदा गीत के लेखक, 22 जुलाई को उसके गायक और 24 जुलाई को उसमें अभिनय करने वाले अभिनेता का जन्म दिन होता है।

अदब, आवाज और अदाकारी के ये तीन नाम मेरे पसंदीदा हैं।

फिर मनोज कुमार के साथ तो ये इत्तेफ़ाक भी है कि उन्होंने देशभक्ति की जो फिल्में बनाई हैं, मेरी पीढ़ी उन्हें ही देखकर बड़ी हुई है। किसी भी राष्ट्रीय पर्व के मौके पर दूरदर्शन पर आने वाली फिल्म या तो मनोज कुमार जी की उपकार होती थी, या पूरब-पश्चिम या फिर क्रांति।

चेहरे पर एक हाथ रखकर उसकी ओंट से उनकी धीमी सी मुस्कुराहट हिंदी सिनेमा के अब तक आए अभिनेताओं में सबसे आकर्षक है। उनकी खूबसूरती का आलम ये था कि अभिनेता धर्मेंद्र भी उनके सामने कमजोर ही पड़े।

रूपहले पर्दे पर मनोज कुमार के नाम से मशहूर हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी (मूलनाम) का जन्म पाकिस्तान के एबोटाबाद में हुआ था। बंटावारे के बाद उनका परिवार राजस्थान के हनुमानगढ़ में आकर बसा।

बंटवारे के दर्द को अपनी बाल आंखों से देखने वाले गोस्वामी जी के ज़हन में अपनों से छूटने का दर्द, सरहद के खूनी मंज़र और ख़त्म होते सौहार्द्र ने शायद हिंदुस्तान को बहुत गहरा बैठा दिया था। 1957 में अपने फिल्मी करियर की शुरूआत करने वाले मनोज कुमार 1998 तक फिल्म जगत में पूरी मजबूती के साथ सक्रिय रहे। लेकिन वर्ष 1960 से 1985 तक का काल उनके उरूज का काल था।

बकौल मनोज कुमार, उन्हें अपना नाम बचपन से बहुत पसंद था। लेकिन अपने विद्यार्थी जीवन में दिलीप साहब की फिल्म शबनम में निभाए उनके किरदार से वह इतना प्रभावित हो गए थे कि उन्होंने खुद ही अपना नाम उस किरदार के नाम पर मनोज कुमार रख लिया।

मनोज कुमार जी की पहली फिल्म ‘फैशन’ (1957) थी। लेकिन लोगों के दिलों में उन्होंने जगह बनाई ‘शहीद’ (1965) से। ये वो दौर था जब हिंदुस्तान बाहरी आक्रमण से जूझ रहा था। पाकिस्तान और चीन की सीमा पर हो रहे तनाव को झेल रहा था। ऐसे में उनकी इस फिल्म ने देशवासियों के दिलों में देशभक्ति का अजब की संचार किया। यहां से उनके अभिनय को स्वीकार्यता और प्रमाणिकता मिल गई। इसके बाद मनोज कुमार साहब ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

उन्होंने अधिकतर देशभक्ति फिल्मों में अभिनय किया। मनोज कुमार ने भूतपूर्व भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर उपकार बनाईं जो शास्त्री जी के दिए हुए नारे ‘जय जवान-जय किसान’ पर आधारित थी।

मनोज कुमार की फिल्मों में ‘हरियाली और रास्ता’ (1962), ‘वो कौन थी’ (1964), ‘शहीद’ (1965), ‘हिमालय की गोद में’ (1965), ‘गुमनाम’ (1965), ‘पत्थर के सनम’ (1967), ‘उपकार’ (1967), ‘पूरब और पश्चिम’ (1969), ‘रोटी कपड़ा और मकान’ (1974), ‘क्रांति’ (1981) प्रमुख हैं। फिल्म ‘उपकार’ के लिए मनोज कुमार को नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।

देशभक्ति की फिल्मों में आने वाला पहला और सबसे पसंदीदा नाम कोई है तो वो मनोज कुमार का हैं। इतना पसंदीदा की लोग उन्हें मनोज कुमार की जगह भारत कुमार करने लगे।

देशभक्ति की फिल्मों ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई, लेकिन उनकी रोमांटिक छवि को पसंद करने वाले भी कम नहीं हैं। उन पर फिल्माए गए प्रेमगीत अमर हैं। ‘मैं न भूलूंगा, मैं न भूलूंगी’, ‘महबूब मेरे-मेहबूब मेरे’, ‘चांद सी महबूबा हो मेरी’, ‘हाय-हाय ये मजबूरी’, ‘कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे’, अल्ला जाने क्या होगा आगे और भी बहुत से।

1965 में ही आई उनकी एक और खास फिल्म थी ‘गुमनाम’। इस फिल्म में उनके रोल को खूब सराहा गया। बाॅलीवुड में सस्पेंस थ्रिलर में इस फिल्म को नोटेबल फिल्मों की श्रेणी में रखा जा सकता है। हालांकि इस फिल्म में महमूद के किरदार ने मनोज कुमार को कई जगह टक्कर थी। लेकिन फिर भी मनोज साहब के तिलिस्म को वह तोड़ नहीं पाए।

हां, इतना जरूर था कि इस फिल्म के लिए महमूद को बतौर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

1964 में आई मनोज जी की फिल्म ‘वो कौन थी’ अपने समय की हिट फिल्म थी और उससे भी हिट हैं उसके गीत।

उसकी प्रसिद्धि का अंदाज़ा इस बात से लगा सकते हैं कि 50 साल बाद भी सारेगामा को अपना नए दौर का रेडियो बेचने के लिए उस फिल्म के गीत ‘लग जा गले कि फिर ये हंसी रात हो न हो’ का सहारा लेना पड़ा। इसी फिल्म का एक और गीत ‘जो हमने दास्तां अपनी सुनाई आप क्यों रोए’ भी काफी हिट रहा।

मनोज जी पर फिल्माए गए देशभक्ति के गीतों का जादू तो आज तक नहीं टूटा है। शायद ही हमारी पीढ़ी के समय में स्कूल में होने वाला कोई कार्यक्रम होता होगा जिसमें उनकी फिल्म पूरब-पश्चिम और उपकार के गीतों पर परफारमेंस न होती हो।

उनकी खास बात ये थी कि उन्होंने फिल्म जगत में केवल खुद को स्थापित नहीं किया, बल्कि दो सुपरस्टार को भी सहारा दिया। राजेश खन्ना को उन्होंने अपनी फिल्म में ब्रेक दिया। दूरदर्शन के एक इंटरव्यू में उन्होंने इसका पूरा किस्सा बयान किया।

इसके अलावा अपनी असफलताओं से हताश हो चुके अमिताभ बच्चन को मुंबई से दिल्ली लौटने से उन्होंने ही रोका और अपनी फिल्म रोटी, कपड़ा और मकान में मौका दिया। बीबीसी को दिए अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि इंडस्ट्री को उस लड़के में कुछ नहीं दिख रहा था, लेकिन मुझे अमिताभ पर पूरा भरोसा था।

मनोज जी को असफलताओं ने कभी नहीं डराया। ‘मेरा नाम जोकर’ उनकी सर्वाधिक असफल फिल्मों में शुमार हैं। लेकिन वह कभी विचलित नहीं हुए। गीत सम्राट संतोष आनंद को पहचान दिलाने वाले मनोज साहब ही थे।

संतोष आनंद जी की कलम से उनके लिए निकले गीत न केवल सर्वाधिक हिट हैं, बल्कि 20वीं सदी का गीत जिसे बताया गया वो भी मनोज जी पर ही फिल्माया गया। फिल्म थी शोर और गीत था एक प्यार का नग़मा हैं।

मनोज कुमार ने आम आदमी के दर्द को तस्वीर दी रोटी, कपड़ा और मकान के जरिये। हमको हाय ये महंगाई मार गई, गीत उस वक्त लोगों की जुबान पर खूब चढ़ा। उनका एक और गीत है, एक तारा बोले, तुन-तुन, ये गीत अपनी तरह का ऐसा गीत है जिसकी तरह का प्रयोग न पहले कभी हुआ और न बाद में।

इस गीत को अपनी फिल्म में चुनते समय उनके परिचितों ने उन्हें कहा कि इस तरह के गीत कविता के मंचों पर अच्छे लगते हैं, फिल्मों में नहीं। लेकिन मनोज साहब को भरोसा था कि इस गीत को लोग पसंद करेंगे और हुआ भी यही। इस गीत को इतनी सफलता मिली कि मनोज साहब पर फिल्माए हिट गीतों में इसका भी नाम हैं।

इन दिनों यदि वही 40 बरस के मनोज लौट आएं तो देशभक्ति फिल्मों का नजरिया भी दूसरा ही होगा और उनके गीत भी। मिथक तोड़ने और प्रतिमान गढ़ने का दूसरा नाम है – मनोज कुमार।

अभिनव चौहान
(लेखक अमर उजाला में उप संपादक हैं)