शख्सियतः जनता की जुबान पर चढ़ जाते थे आनंद बख्शी के लिखे गीत

आनंद बख्शी के गीत जनता की जबान पर चढ़ जाते थे

आनंद बख्शी के गीत बहुत लोकप्रिय होते थे
आनंद बख्शी के गीत बहुत लोकप्रिय होते थे

मैं उन दिनों शायद दो या तीन बरस का रहा होऊंगा, मैंने अपने होश में जो पहला फिल्मी गीत सुना वो था फिल्म ‘मैं तुलसी तेरे आंगन की’ (1978) का, ‘ये खिड़की जो बंद रहती है’। इस गीत की ये अकेली पंक्ति थी जिसे मैं गुनगुनाता रहता था।

वह भी यूं कि मेरा परिवार उस वक्त पहली मंजिल पर रहता था। सामने एक घर था, वहां बंद खिड़की थी। शायद उसे देखकर इस गाने ने मेरे मन को और भी छुआ और बचपन से उसे गुनगुनाता रहा हूं।

इसके बाद थोड़ा और होश संभाला तो दूरदर्शन पर चित्रहार देखने लगा था। दूसरा गीत जो मैंने गाना शुरू किया और मेरा अब तक पसंदीदा है, वो था फिल्म हिमायल की गोद का गीत, ‘चांद-सी महबूबा हो मेरी..’।

मैं नहीं जानता था कि ये गीत किसके हैं। बड़े होकर जैसे-जैसे गीत-संगीत, कविता-शायरी की ओर झुकाव हुआ तो इन सबकी तलाश करनी शुरू की। इत्तेफाक यह रहा कि ये दोनों ही गीत आनंद बख्शी (21 जुलाई, 1930-30 मार्च, 2002) के लिखे हुए थे।

शायद मेरे हिस्से में आनंद बख्शी जन्म से ही जुड़े हैं।

उन दिनों सबसे ज्यादा कोई हीरो पसंद किए जाते थे तो वो थे शशि कपूर साहब। कपूर खानदान के इस असफल बेटे को सफलता के मुकाम दिलाने में यदि किसी को श्रेय दिया जाता है तो उनमें आनंद बख्शी एक अहम कड़ी हैं।

उनके गीतों ने शशि जी को सबका चहेता बना दिया था। सेना से सिनेमा की ओर आने वाले आनंद जी ने चार दशक तक हिंदी सिनेमा के गीत जगत में अपनी मौजूदगी बनाए रखी।

उनकी अंतिम फिल्म के रूप में 2001 में आई ‘गदर-एक प्रेम कथा’ को भुलाया नहीं जा सकता। युवाओं, विशेषकर युवतियों की सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली फिल्म ‘दिल वाले दुल्हिनया ले जाएंगे’ के गीत आनंद बख्शी के ही लिखे हुए हैं।

यह फिल्म आदित्य चोपड़ा की निर्देशक के रूप में पहली फिल्म थी। यश चोपड़ा इस फिल्म को लेकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे। हालांकि प्रेम फिल्मों में यश चोपड़ा बैनर की फिल्म को नजरअंदाज कर पाना दर्शकों के लिए मुमकिन नहीं था, फिर भी यश जी ने आनंद जी को गीतकार के तौर पर चुना।

उन्हें भरोसा था कि कहानी, निर्देशन या संवाद में कहीं कोई कमी हुई तो गीत और संगीत दर्शकों को इससे दूर नहीं जाने देगा। लेकिन, आदित्य नई उम्र के थे। वो विदेश में मिले एक प्रेमी जोड़े को ध्यान में रखकर फिल्म बना रहे थे। इस सिचुएशन में आनंद जी के शायरी और कविता विधान से बंधे गीतों को समझ पाना आदित्य चोपड़ा की समझ से बाहर थे।

उन्होंने आनंद जी के लिखे गीत की शुरूआती दो पंक्तियां बदल दीं। अब गीत की शुरुआती पंक्तियां हो चुकीं थीं, ‘तुझे देखा तो ये जाना सनम, प्यार होता है दीवाना सनम।’

आनंद जी ने इसी जमीन पर गीत उठाया। गीत की लोकप्रियता आज तक बनी हुई हैं। बख्शी जी की यही खासियत थी कि वो किसी भी गीत को इस तरह निभाते थे कि श्रोता फिल्म भले ही भूल जाए लेकिन गीत जुबान पर चढ़े रहें।

636 के करीब फिल्मों में चार हजार से ज्यादा गीत लिख चुके आनंद बख्शी को 40 बार फिल्म फेयर पुरस्कारों के लिए यूं ही नहीं नाॅमिनेट किया गया। आनंद बख्शी जी के चाहने वालों में भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना, ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार, शशि कपूर, अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना लगभग सभी थे।

हिंदी सिनेमा में जिन गीतकारों को आम जनमानस जानता था उनमें साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूंनी के साथ आनंद बख्शी एक प्रमुख नाम है।

आनंद बख्शी का परिवार 2 अक्तूबर, 1947 को बंटवारे के बाद पाकिस्तान के रावलपिंडी से भारत आ गया था।

यहां से मेरठ में आकर शुरुआती दिनों में रहे। मेरठ उन दिनों दंगों से लेकर बदलते हिंदुस्तान का गवाह रहा था। इसके बाद उनका परिवार दिल्ली चला गया।

लेकिन ठेठ पाकिस्तानी परिवेश से उत्तर प्रदेश के परिवेश में अपना कैशोर्य बिताने वाले आनंद जी के जीवन को सबसे ज्यादा शक्ल यहीं से मिली। उत्तर प्रदेश की जमीन उन्हें खाद पानी दे रही थी। उन्हें यहां से ही शायरी और गीतों का चाव लगा था। इसके बाद गालिब की दिल्ली में वो और ज्यादा इस पेेशे की ओर डूब गए थे।

सेना में जाने के बाद भी वो गीत लिखते रहे और अपने ट्रूप के लिए गीत लिखते रहे। उन्हें सिनेमा में आने का बहुत शौक था। इसी शौक ने उन्हें 1956 में पहला ब्रेक दिलाया। इसके बाद धीरे-धीरे आनंद जी ने कदम बढ़ाए।

60 के दशक को उनका उदयकाल कहा जाएगा। इसके बाद आनंद जी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

70 का दशक उनके उरूज का दौर था। इस दशक में दो खास लोग शायरी और गीतों में एक जैसी आदतों और बिंबो के कारण सुननेवालों के पसंदीदा थे। एक थे रघुपति सहाय ‘फिराक गोरखपुरी’ और दूसरे थे आनंद बख्शी जी। दोनों की कदकाठी, चेहरे के हावभाव एक जैसे।

इतना ही नहीं, आदतों में सिगरेट पीने की आदत भी एक ही जैसी थी।

आनंद बख्शी शायद एकमात्र ऐसे गीतकार हैं जिन्होंने संगीतकारों और निर्देशकों की दो पीढ़ियों के साथ काम किया। 60 के दशक में शुरू हुआ गीतों का ये सिलसिला नई सदी की दस्तक तक फिल्मों की जान बना रहा।

इस लाजवाब गीतकार को लोग सदियों तक भी नहीं भूलेंगे। उनके 90वें जन्मदिन पर उनको उनके एक प्रशंसक के साथ बहुत नमन।

(लेखक अमर उजाला में उप संपादक हैं।)