फ्लैश-बैकः पहली बोलती फिल्म आलमआरा के हीरो मास्टर विट्ठल की कहानी

भारत की पहली बोलती फि्ल्म आलमआरा के हीरो तो उस जमाने के मशहूर कलाकार मास्टर विट्ठल थे, पर उस फिल्म में उन्हें संवाद नहीं दिए गए और एक तरह से उनका करिअर चौपट हो गया

सवाक फिल्म में अवाक हीरो
सवाक में अवाकः मास्टर विट्ठल पहली बोलती फिल्म आलमआरा के हीरो थे पर उनके हिस्से कोई संवाद न था

भारतीय सिनेमा का इतिहास मास्टर विट्ठल के उल्लेख बगैर अधूरा माना जाएगा. हिंदी सिनेमा की प्रथम सवाक फिल्म ‘आलमआरा’ का लीड एक्टर स्मृतियों से धूमिल होता जा रहा है.

इस ऐतिहासिक शुरूआत बाद भी हिंदी फिल्मों में वो ऊंचा मुकाम हासिल नहीं कर सके, जिसकी अलख फिल्म ने जगाई थी. इस फिल्म के लिए एक गैर-मराठी भाषी को साईन करना ‘आत्मघाती’ निर्णय साबित हुआ था.

मास्टर विट्ठल उन्हें हिंदी सवाक सिनेमा के प्रथम अभिनेता होने का गौरव जरूर मिला, लेकिन बोलने के लिए संवाद नहीं मिले. इस संदर्भ में विटठल-आर्देशिर ईरानी के दरम्यान मनमुटाव का कारण भी बताया गया.

दरअसल कमजोर हिंदी और नायिका प्रधान कहानी ने बेडा गर्क़ किया.

यदि हम मास्टर विटठल के कैरियर-ग्राफ पर गौर करें तो पाएंगें कि दरअसल यही फ़िल्म उनके कैरियर को बर्बादी के कगार पर ले गई. अभिनेता की गुमनामी दृष्टि से बडा ‘टर्निंग प्वांइट’.

मास्टर विट्ठल को सिनेमा की ओर लाने का श्रेय बंबई की ‘शारदा फ़िल्म कंपनी’ को जाता है. शारदा में रहते हुए उन्होंने उस जमाने की एक्शन प्रधान फ़िल्मों में काम किया.

दौर मूक फिल्मों का था तो इस मराठी अभिनेता की खूब पूछ थी. वह मास्टर विटठल का स्वर्णिम दौर रहा क्योंकि उनकी तुलना हालीवुड के शीर्ष अभिनेताओं से की गयी. इस छवि की मदद से मूक फ़िल्मों में विटठल की साख बनी.

विटठल ज्यादातर विद्रोही छवियों में नजर आ रहे थे, जनता ने भी हीरो के क्रांतिकारी किरदारों को पसंद किया.

वह देश के लिए ‘परतंत्रता’ की बेडियों का दौर था, हरेक भारतीय ने फिरंगियों से मुक्ति पाने का संकल्प लिया था. विटठल के विद्रोही किरदारों की लोकप्रियता पीछे यही ताकत काम कर रही थी.

वह अपने जमाने के ‘एंग्री यंग मैन’ रहे. बीस के दशक में अभिनेत्री जेबुन्निसा के साथ बनी फ़िल्मों ने हिंदी सिनेमा को पहली जोडी दी.

तीस के दशक में शारदा से ‘सागर स्टुडियो’ पलायन समय जमाने के सबसे अधिक फीस पाने वाले सितारे थे । लोकप्रियता का यह आलम रहा कि आर्देशिर ईरानी ने ‘आलमआरा’ के लिए विटठल का नाम बहुत पहले सोच रखा था. यह निर्णय लिया गया कि इस मुस्लिम मिजाज की कहानी में अभिनेता का किरदार उन्हें ही दिया जाएगा.

इंपीरियल ने उन्हें फ़िल्म के लिए साईन कर लिया. इस समय वो कंपनी में पूरी तरह आए भी न थे. पुरानी कंपनी का कुछ मसला अब भी बाक़ी रह गया था, दरअसल बीच में ही करार को तोड इधर आए थे.

इस आरोप में विटठल पर मुकदमा चलाया गया. मोहम्मद अली जिन्नाह ने बचाव पक्ष की ओर से मुकदमा लडा और विटठल को संकट से बाहर निकाला।

बहरहाल ‘आलमआरा’ जब शुरू हुई तो विटठल के हिंदी संकट ने मज़ा किरकिरा किया. यह अभिनेता के दृष्टि से बहुत दुखदायी अनुभव था. अफसोस फ़िल्म के अधिकांश हिस्से में लीड अभिनेता को कोई भी संवाद नहीं मिला. ज्यादातर सीन में उन्हें अवचेतन स्थिति में दिखाया गया. उन्हें भारी जिल्लत सहन करनी पडी.

इस सार्वजनिक किरकिरी ने मास्टर विटठल की ‘सवाक यात्रा’ को कहीं का न छोड़ा. उनके पास सवाक प्रस्ताव आने बंद हो गए, वह फिर से मूक फ़िल्मों की ओर लौटे. लेकिन यहां भी देर हो चुकी थी, अभिनय का उनका सुनहरा दौर सिरे से गायब हो चला.

यह सिल्वर स्क्रीन पर ‘शाहू मोदक’ के आगमन का समय था.

वक्त की नब्ज को भांपते हुए विटठल निर्देशन के क्षेत्र में चले आए. उनके निर्देशन में बनी ‘आवारा शहजादा’ को प्रशंसा भी मिली.

हिंदी सिनेमा को ‘डबल रोल’ का विचार मास्टर विटठल ने ही दिया. वह बीच-बीच में मराठी व हिंदी फ़िल्मों में छुटपुट काम करते रहे, लेकिन स्पष्ट था कि अभिनय का एक सितारा अस्त हो चुका है. इसे विडंबना ही कहना होगा कि ‘आलमआरा’ का उत्सव उसके ‘हीरो’ को मझधार में ले गया ।