पंडित जसराज के निधन पर आशा भोंसले ने दी मार्मिक श्रद्धांजलि, कहा, संगीत का सूरज डूब गया

साल 2000 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से उन्हें नवाजा गया. इससे पहले उन्हें साल 1975 में पद्मश्री से नवाजा जा चुका था.

पद्म विभूषण शास्त्रीय गायक पंडित जसराज का अमेरिका में 90 साल की उम्र में निधन हो गया है. उन्होंने अमेरिका के न्यू जर्सी में अंतिम सांस ली.

उनके निधन से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की स्वर्णिम पीढ़ी का एक दीपक बुझ गया. पंडित जसराज के निधन से संगीत जगत से लेकर बॉलीवुड तक सभी शोक में डूब गया है.

पंडित जसराज के निधन पर मशहूर गायिका आशा भोंसले ने गहरा शोक जताया है. पंडित जसराज को याद करते हुए आशा भोंसले ने कहा, “मैं पंडित जसराज जी के दुर्भाग्यपूर्ण निधन से बेहद दुखी हूं. मैंने ऐसे व्यक्ति को खोया है जो मेरे लिए बेहद प्रिय थे. मैंने वास्तव में एक बड़े भाई को खो दिया है.”

वह आगे कहती हैं कि उनके जाने से संगीत का सूरज डूब गया. जसराज जी हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेंगे.

आशा भोंसले ने कहा है कि जसराज एक उत्कृष्ट गायक थे. वह उन्हें काफी वक्त से जानती थी. उनकी वी. शांताराम की बेटी से शादी हुई उससे भी पहले से जानती थीं. जसराज और आशा के घरेलू संबंध थे. जब भी जसराज जी को वक्त मिलता, वह आशा भोंसले के घर आया करते थे.

आशा भोंसेल कहती हैं, “वे मेरी काफी प्रशंसा किया करते थे और हमेशा कहा करते थे कि मैं आपको गाना सिखाऊंगा.”

अपने पुराने दिनों की याद करते हुए आशा जी कहती हैं कि जब वह अमेरिका में उनके शास्त्रीय स्कूल गई थीं, वहां जसराज मेधावी और उभरते संगीतज्ञों की परख करके उन्हें संगीत सिखाया करते थे. आशा भोंसले ने कहा, मुझे याद है कि  कैसे मैं, उनके स्कूल में दाखिला लेना चाहती थी.

आगे कहती हैं “एक बार जसराज जी और आशा जी डिनर के लिए एक साथ गए थे. जसराज जी, जो कि एक पक्के शाकाहारी थे, वह मुझसे भी स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए शाकाहारी बनने का अनुरोध करते रहे. मैं हमेशा उनके बचपना को सदा याद रखूंगी.”

संगीत साधना में जुटे पद्म विभूषण पंडित जसराज मेवात घराने के सशक्त स्तंभ थे
संगीत साधना में जुटे पद्म विभूषण पंडित जसराज मेवात घराने के सशक्त स्तंभ थे

28 जनवरी 1930 को जन्मे पंडित जसराज का संबंध मेवाती घराने से था. बचपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया था और उनका पालन पोषण बड़े भाई पण्डित मणीराम के देखरेख में हुआ. पंडित जसराज भारतीय शास्त्रीय संगीत के पहचान की तरह थे. भारतीय शास्त्रीय संगीत की सेवा के लिए उन्हे कई सम्मान भी मिल चुके हैं.

अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ  ने ग्रह को पण्डित जसराज के सम्मान में ‘पण्डितजसराज’ नाम दिया था. इंटरनेशनल एस्ट्रोनामिकल यूनियन (आईएयू) ने ‘माइनर प्लेनेट’ 2006 वीपी 32 (नंबर 300128) का नामकरण पंडित जसराज के नाम पर किया है. इस ग्रह की खोज 11 नवंबर 2006 को की गयी थी. ‘माइनर प्लेनेट’ वह ग्रह होते हैं जो न तो ग्रह हैं और न ही इन्हें पूरी तरह से धूमकेतु का जा सकता है.

यह सम्मान पाने वाले पंडित जसराज पहले भारतीय संगीतकार थे. उनसे पहले सिर्फ मोजार्ट बीथोवन और टेनर लूसियानो पावारोत्ति को यह सम्मान मिला था.

पिछले आठ दशक से संगीत साधना में जुटे पद्म विभूषण पंडित जसराज मेवात घराने के सशक्त स्तंभ थे. 28 जनवरी 1930 को जन्मे पंडित जसराज अपने जिंदगी के आखिरी समय तक संगीत के क्षेत्र में सक्रिय रहे.

पंडित जसराज का सबसे बड़ा योगदान शास्त्रीय संगीत को जनता के लिए सरल और सहज बनाना रहा. इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ी. उन्होंने ख्याल गायकी में ठुमरी का पुट डाला, जो सुनने वालों के कानों में मिसरी घोल जाता था. वह बंदिश भी अपने जसरंगी अंदाज में गाते थे.

वह दुनिया भर का संगीत सुनते थे और सराहते थे. भारत, कनाडा, अमेरिका समेत दुनिया भर में संगीत सिखाने वाले पंडित जसराज खुद अपने शिष्यों से सीखने को लालायित रहते थे.

शास्त्रीय संगीत के साथ पंडित जसराज ने अर्ध शास्त्रीय शैली जैसे हवेली संगीत को भी लोकप्रिय बनाया. उन्होंने मंदिरों में भजन गाए थे.

साल 2000 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से उन्हें नवाजा गया. इससे पहले उन्हें साल 1975 में पद्मश्री से नवाजा जा चुका था.

उनके जीवन से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा है. एक शास्त्रीय सम्मेलन में उनसे किसी ने मजक में पूछा कि क्या आपकी कोई  ख्वाहिश अभी भी अधूरी है? यह सवाल सुनकर जोर से हंस पड़े. फिर वो मुस्कुराते हुए कहते हैं,

“गालिब कहते हैं कि हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले. जब यह बात इतने बड़े शायर गालिब कह गए हैं, तो हम क्या चीज हैं! किसी भी इंसान की ख्वाहिश कभी पूरी नहीं होती.”