भारतेंदु और जिगर: अदब की नदी के दो किनारे, एक इधर-एक उधर

9 सितंबर को अग्रणी पत्रकार-साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद का जन्मदिन और जिगर मुरादाबादी जैसे बड़े शायर की पुण्यतिथि है.

भारतेंदु हरिश्चंद और जिगर मुरादाबादी
भारतेंदु हरिश्चंद और जिगर मुरादाबादी

 

नौ सितंबर अपने आप में बड़ा खूब दिन है। भाषा, साहित्य, थियेटर, सिनेमा, पत्रकारिता हर एक पक्ष के लिहाज़ से। लेकिन अफ़सोस ये है कि इन क्षेत्रों में काम करने और जीने वाले तमाम लोगों को ये दिन याद नहीं।

जब देश की मीडिया में रिया और सुशांत, बाॅलीवुड में नेपोटिज़्म बनाम फेवरेटिज़्म, थियेटर में कम्यूनिज़्म बनाम नेशनलिज़्म, गीतों में ओरिजनल बनाम रीमिक्स जैसे द्वंद्व चल रहे हों, ऐसे में इस तारीख को याद करना खास भी है और ज़रूरी भी।

ये तारीख इसलिए खास है कि इससे भाषा, साहित्य, थियेटर, सिनेमा को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से नई दिशा और सोच देने वाले दो महान लोगों का आना और जाना जुड़ा है। और ये दो नाम हैं – भारतेंदु हरिश्चंद्र (जन्म 9 सितंबर 1850) और जिगर मुरादाबादी (पुण्यतिथ 9 सितंबर 1960)।

इन दोनों की शख़्सियत के विषय में इंटरनेट से लेकर किताबों तक आपको बहुत कुछ मिल जाएगा। उन्हीं को दोबारा लिखकर और आपको पढ़वाकर मैं अपना और आपका वक़्त ज़ाया नहीं करूंगा।

लेकिन नई उम्र के पाठकों को इनके तुलनात्मक पहलुओं को पढ़वाना इसलिए जरूरी है क्योंकि आज के दौर में जिस तेरी भाषा-मेरी भाषा, इनका सिनेमा-उनका सिनेमा, हमारी बात-उनकी बात जैसे फ्रेम गढ़ दिए जाते हों, वहां इन दो हस्तियों को पढ़ना और समझना ज़रूरी हैै।

भारतेंदु हरिश्चंद्र को महज़ 34 वर्ष का जीवन मिला। इतने कम जीवनकाल में उन्होंने हिंदी, उर्दू, थियेटर, पत्रकारिता हर क्षेत्र के लिए अपना कुछ न कुछ योगदान किया।

इसलिए हिंदी में शुरू होने वाला नवजागरण काल भारतेंदु युग के नाम से जाना जाता है। पूर्व भारतेंदु काल और उत्तर भारतेंदु काल की अवधारणा भी अब नए अध्ययनों में मिलने लगी है।

अपने से पूर्व और समकालीन हिंदी साहित्य में जिन दो भाषाई परंपराओं को भारतेंदु देख रहे थे, उसे पूरी तरह पलट कर रख दिया था इस व्यक्ति ने। यही वजह है कि हिंदी साहित्य की चर्चा करते ही पहला नाम किसी का आता है तो वो हैं भारतेंदु हरिश्चंद्र।

उनके समय में हिंदी भाषा को दो तरह से रचा और गढ़ा जा रहा था, एक थी राजा लक्ष्मण सिंह की संस्कृतनिष्ठ हिंदी, जिसमें बाहरी भाषाओं के शब्दों के लिए कोई स्थान नहीं था। दूसरी थी राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद की फारसी निष्ठ हिंदी जो अधिकांश की समझ से परे थी।

भारतेंदु ने इन दोनों ही मार्गों को छोड़ा और अपनी नई भाषा गढ़ी।

पत्रकार स्वभाव के इस पुरोधा ने हिंदी की पहली पत्रिका का प्रकाशन किया। नाम था हरिश्चंद्र मैगज़ीन, जो बाद में हरिश्चंद्र पत्रिका बन गई। इसके नाम से ही पता लगता है कि भारतेंदु जी प्रयोग और समन्वयवाद का कितना बड़ा उदाहरण हैं।

इस पत्रिका के जरिये उन्होंने ऐसी भाषा को बनाया जो न तो संस्कृतनिष्ठ थी, न ही फ़ारसीनिष्ठ। वह थी शुद्ध, व्यावहारिक हिंदुस्तानी भाषा, जिसमें समय-समय पर परिष्कार होता रहा और आज वो सर्वाधिक चलन में है।

भारतेंदु एक अच्छे रंगमंच कलाकार भी थे, इसलिए उनके नाम पर भारतेंदु नाट्य अकादमी स्थापित कर अमृतलाल नागर ने उन्हें अनूठी श्रद्धांजलि दी।

स्क्रीनप्ले को नई तरह से लिखने के लिए भारतेंदु को याद किया जाना चाहिए। भारत दुर्दशा, वैदिक हिंसा, हिंसा न भवति जैसे नाटकों के जरिये उन्होंने संदेश देने वाले और काॅमिक पटकथा के चलन को शुरू किया।

दूसरा किरदार है, जिगर मुरादाबादी।

मोहब्बत की बात जब भी आएगी, जिगर का ज़िक्र अनिवार्य हो जाएगा। जिगर ने बेशक सिनेमा के लिए गीत न लिखे हों, लेकिन हिंदी सिनेमा को शानदार गीत लिखने वाला अपना शागिर्द तोहफ़े में दिया, मजरूह सुल्तानपुरी।

हिंदी सिनेमा में जब भी मोहब्बत पर सबसे खास शेर कोट किया गया तो वो जिगर का ही था –

ये इश़्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

इस शेर के साथ जिगर सिनेमा के परदे पर न जाने कितनी बार याद किए गए और कितनी बार गुनगुनाए गए।

जिस दौर में उर्दू शायरी को फ़ारसीनिष्ठ बनाकर पेश किया जा रहा था, उस दौर में खड़ी बोली हिंदी के साथ समन्वय करके उन्होंने शायरी की नई भाषा को जन्म दिया। इस भाषा को आप हिंदवी कह सकते हैं। इतना ही नहीं वह मुशायरों में शायरों को पेमेंट देने की हिमायत करने वाले पहले शायर थे।

मुशायरों में उनसे पहले किसी ने यह मांग नहीं की थी। लेकिन उन्होंने अपने कलाम पेश करने की एवज़ में पेमेंट की परंपरा शुरू की। अतिश्योक्ति न होगी यह कहना कि इसी चलन के कारण सिनेमा में गीतकारों को पूरा सम्मान और बेहतर पारिश्रमिक दिया जाने लगा था।

जिगर की लोकप्रियता का अंदाज़ा इससे लगा सकते हैं कि उनके जीते-जी दो बार उनकी मरने की खबर फैली और दोनों बार उन पर अख़बारों में पूरे-पूरे पन्ने लिख दिए गए। हालांकि उन्होंने खुद ही इसका खंडन कर दिया। साहित्य अकादमी की ओर से प्रकाशित ‘भारतीय साहित्य के निर्माता जिगर मुरादाबादी’ नाम की किताब में इसका ज़िक्र मिलता है।

4 मई 1936 को अपने दोस्तों के साथ वह मुरादाबाद के पास के ही किसी गांव में गए थे। वहां से वह उनके साथ लौटे नहीं। उनके प्रतिद्वंद्वियों को मौका मिल गया और उन्होंने उनकी मृत्यु की खबर उड़ा दी। फिर क्या था, समाचार पत्रों, टीवी और रेडियों में खबर आग की तरह फैल गई।

रेडियो ने उनको श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम तय कर दिया। बाद में खुद उन्होंने ही अपनी मौत का खंडन किया और उसी कार्यक्रम में अपने शेर पेश किए।

1958 में भारत और पाकिस्तान में उनकी मृत्यु की खबर उड़ी तो शायरी की दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई। बाद में उन्होंने इस खबर का खंडन किया। इसी साल उन्हें साहित्य अकादमी से भी सम्मानित किया गया। मोहब्बत और अना के शेरों में अक्सर उनका हवाला दिया जाता है।

अपना ज़माना आप बनाते हैं अहल-ए-दिल

हम वो नहीं कि जिनको ज़माना बना गया

उनका जो काम है वो अहल-ए-सियासत जाने

मेरा पैग़ाम मोहब्बत है, जहां तक पहुंचे

ये दोनों ही व्यक्तित्व हिंदी और उर्दू को जोड़ने वाली कड़ी हैं।

अफसोस ये है कि इन दोनों ही किरदारों को कुछ सीमित वर्गों के ही लोग याद करते हैं। जबकि आज के दौर में अपनी अभिव्यक्ति देने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इन्हें याद करना चाहिए। यदि ये दोनों ही शख़्स न होते तो आपको अपनी बात कहने के लिए संस्कृतनिष्ठ हिंदी को प्रयोग करना पड़ा या न समझ आने वाली उर्दू को, कुछ कह नहीं सकते।

हिंदी और उर्दू में वर्जनाओं को तोड़कर गर्जनाओं के साथ बात कहने का अधिकार इन दो लोगों की ही देन है। रोमांटिज़्म, इगोस्टिक, प्रोगेसिवनेस और एक्सप्रेरिमेंटल शायरी और कविता के लिए ये दोनों ही हस्तियां याद की जाती रहनी चाहिए। (इन अंग्रेज़ी शब्दों से आप इनकी रेंज को ज्यादा अच्छे से समझ सकेंगे)

चलते-चलते इन दोनों के दो शेर देखिए, बालीवुड के गीतों के आधार को समझा जा सकता है –

निगाहों में छुपकर कहां जाइएगा

जहां जाइएगा, हम्हें पाइएगा

जिगर के इस शेर के साथ आपको फिल्म ‘आरज़ू’ में लिखा हसरत जयपुरी का मशहूर गीत याद आता होगा। इसी तरह एक और गीत है फिल्म ‘कल की आवाज़’ का, जिसके गीतकार हैं समीर और गीत है, ‘तुम्हारी आंखों में हमने देखा, अजब सी चाहत बरस रही है।’

इस गीत की बहर का आधार है, भारतेंदु की ग़ज़ल, उसका शेर देखिए और गुनगुनाइये –

फ़सादे दुनिया मिटा चुके हैं, हुसूले हस्ती उठा चुके हैं

खुदाई अपने में पा चुके हैं, मुझे गले यह लगा चुके हैं

भारतेंदु के जन्मदिन और जिगर की पुण्यतिथि पर इस नन्हीं सी कलम की ओर से उन्हें नमन, जिगर के ही इस शेर के साथ –

ज़िदगी एक हादिसा है और कैसा हादिसा

मौत से भी ख़त्म जिसका सिलसिला होता नहीं।

 

(लेखक अमर उजाला में उप संपादक हैं। साहित्य, भाषा, सिनेमा और थियेटर में गहरी रुचि रखते हैं।)