जन्मदिन विशेषः ‘संपूर्ण सिंह कालरा’ जिसने बॉलीवुड को किया ‘गुलजार’

गुलजार का सिर्फ परिचय यही नहीं है कि वे फिल्मों में लिखते हैं. उनका एक परिचय ये भी होना चाहिए कि वे हिन्दुस्तान की तहजीब और अदब की नुमाइंदगी करने वाले शख्स भी हैं.

गुलज़ार ने अपने सृजनात्मकता में प्रयोगों को तरज़ीह दी
गुलज़ार ने अपने सृजनात्मकता में प्रयोगों को तरज़ीह दी

पाकिस्तान में दीने की गलियों को छोड़कर संपूर्ण सिंह कालरा बॉलीवुड में आकर ‘गुलजार’ बन गए. लेकिन इससे पहले उन्हें गालिब के शहर में भी आना था. बल्लीमारान की गलियां, जहां गालिब ने गजल लिखीं और अनगिनत शेर कहे.

झेलम नदी के पानी के तरह बहती जिंदगी को यमुना के किनारे बसी दिल्ली ने जब सहारा दिया तो गुलजार बंगला साहित्य के दीवाने हो चुके थे.

चीड़ के ऊंचे दरख्तों को छोड़कर कूचा-ए-दिल्ली, जहां गुलजार के बचपन का एक बड़ा हिस्सा गुजरा. इसके बाद वे मुंबई आ गए और मुंबई के वर्ली इलाके में उनका नया ठिकाना बना एक मोटर गैराज.

इस मोटर गैराज में गुलजार एक्सीडेंटल कारों का डेंट निकालते और रंगरेज की तरह कारों को पेंट करते. इस काम को करते-करते वे अपना जीवन गुजारने लगे. गुलजार को जब समय मिलता तो नॉवेल पढ़ते.

गुलजार पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से आए थे. गुलजार का जन्म पश्चिमी पंजाब के झेलम जिले, जो अब पाकिस्तान में है, के दीना गांव में 18 अगस्त, 1936 को हुआ था. जहां पंजाबी और उर्दू बोली लिखी और समझी जाती थी.

लेकिन दिल्ली में उन्हें बांगला भाषा से मोहब्बत हो गई. वो भी जुनूं की इस हद तक कि रवींद्रनाथ टैगोर के सारे नॉवेल पढ़ डाले.

नॉवेल पढ़ने की रफ़्तार इतनी तेज होने लगी कि मोटे और मटमेले नॉवलों को गुलजार किराए पर लाते और गैराज के कामों से फुर्सत मिलते ही ख़त्म कर डालते. मोटे जिल्द किए गए नॉबलों को गुलजार रात में पूरा करते और सुबह किताब घर जाकर दूसरे नॉबेल की मांग करते.

उनकी पढ़ने की इस रफ्तार से किताबों को किराए पर देने वाला भी घबरा गया और एक दिन हाथ जोड़ लिए.

दिल्ली में कुछ समय बिताने के बाद गुलजार ने मुंबई का रुख किया. जहां उन्हें आना ही था. क्योंकि इसी बॉलीवुड को संपूर्ण सिंह कालरा को अपनी लेखनी से गुलजार करना था.

चार दशक बीत जाने के बाद भी गुलजार की कलम की धार भोथरी नहीं हुई. उनके लिखे गीत, गजल, शेर, कहानी और त्रिवेणी में वहीं बांकपन आज भी महसूस होता है, जो ‘बंदिनी’ के गीतों में पहली बार महसूस हुआ था.

जमाने के साथ सुर लय और ताल मिलाते हुए वे नई पीढ़ी को भी अपने हुनर से रोशन कर रहे हैं.

बात जब कम शब्दों में कहनी हो तो गुलजार से बेहतर, भला कौन हो सकता है. ‘नजर में रहते हो जब नजर नहीं आते. ये सुर बुलाते हैं जब तुम इधर नहीं आते.’ पार्टिशन के दर्द को इस तरह से सिर्फ गुलजार ही बयां कर सकते हैं.

गुलजार जब बात हिन्दुस्तान की करते हैं तो चंद लाइनों में भूत, वर्तमान और भविष्य आंखों के सामने रख देते हैं और कहते है-

‘हथेलियों में भरें धूप और उजाला करे.

उफक पे पाँव रखो और चलो अकड़ के,

चलो फलक पकड़ के उठो और हवा पकड़ के चलो.

तुम चलो तो हिंदुस्तान चले.’

ये बात वही कह सकता है जिसने इस देश को अपने भीतर जज्ब कर लिया हो. गुलजार का सिर्फ परिचय यही नहीं है कि वे फिल्मों में लिखते हैं. उनका एक परिचय ये भी होना चाहिए कि वे हिन्दुस्तान की तहजीब और अदब की नुमाइंदगी करने वाले शख्स भी हैं.

उम्र के इस पड़ाव पर भी वे गुलजार हैं, यही उनकी सबसे बड़ी खासियत है. सिनेमा में वे उस परंपरा को लेकर चलने वाले शख्स हैं, जिसकी नींव बिमल रॉय ने रखी थी. गुरुदत्त ने इसे उर्वरा शक्ति प्रदान की. शैलेंद्र ने हुस्न बख्शा, ऋषिकेश मुखर्जी ने जिसे अपने हुनर से संवारा और गुलजार ने इस परंपरा की आबपासी की.

ऐसे मिला पहला गीत

बिमल रॉय ‘बंदिनी’ फिल्म बना रहे थे. ये बात सन 1963 की है. बिमल रॉय की किसी बात को लेकर गीतकार शैलेंद्र से अनबन हो गई. गुलजार के भीतर छिपी प्रतिभा को शैलेंद्र ने भांप लिया था.

शैलेंद्र ने ही गुलजार को बिमल रॉय के पास भेजा. गुलजार जब बिमल रॉय के ऑफिस पहुंचे तो बिमल राय पहले तो उन्हें खास तवज्जो नहीं दी, लेकिन जब गीत लिखकर दिया तो वे हतप्रभ रह गए. उन्होंने गुलजार से पूछा, क्या करते हो, तब गुलजार ने कहा वे मोटर गैराज में काम करते हैं.

इस पर बिमल रॉय ने कहा- ‘वहां जाने की कोई जरुरत नहीं है, गैराज में जाकर अपना समय खराब मत करो.’

ऐसे बदली जिंदगी

बिमल रॉय की इस बात का गुलजार पर बहुत गहरा असर हुआ और इसके बाद उन्होंने तय कर लिया कि वे अब गैराज नहीं जाएंगे. बिमल रॉय की ये बात याद कर इतने बरस बीत जाने के बाद गुलजार आज भी भावुक हो जाते हैं. उनकी आंखे नम हो जाती हैं.

ये गुरु और शिष्य के बीच आत्मीय रिश्ते को दर्शाता है. गुलजार और बिमल रॉय का रिश्ता कुछ-कुछ वैसा ही था, जैसे एक मुरीद का रिश्ता अपने मुर्शिद से होता है.

प्रयोग करने से कभी नहीं डरे

यह कहना गलत नहीं होगा कि गुलज़ार शब्दों के जादूगर हैं. वह आम बोलचाल के शब्दों से ऐसी रचना तैयार करने का हुनर रखते हैं, जो वर्षों तक लोगों की जुबान पर चढ़ा रहता है.

फिर चाहें ‘चड्डी पहन के फूल खिला’ हो या फिर ‘कजरारे कजरारे तेरे कारे कारे नैना.’ हर विधा में गुलजार शत-प्रतिशत खरे उतरते हैं.

विलक्षण प्रतिभा के धनी गुलज़ार ने लेखन की हर विधा को समृद्ध किया है. गुलजार रुपहले पर्दे पर भी कैमरे से कहानी कहने में माहिर हैं. अचरज होता कि आखिर एक व्यक्ति में इतनी खूबियां कैसे हो सकती हैं. लेकिन जवाब के तौर पर भी ‘गुलजार’ हैं न.