सलिल चौधरी क्या थे मत पूछिए, पूछिए कि वह क्या नहीं थे

संगीतकार सलिल चौधरी का संगीत कानों में मिसरी घोलता है, पर वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे

विलक्षण संगीतकार थे सलिल चौधरी
विलक्षण संगीतकार थे सलिल चौधरी

समंदर बहुत विशाल होता है. न जाने कितने मोती होते हैं इसके अंदर, कितनी अनगिनत नदियां समाई होती हैं इसमें. कभी एकदम शांत, जैसे सत-चित्त-आनंद प्राप्त हो गया हो, तो कभी बैचेन होकर उफ़ान भी मारता है यह समंदर.

ऐसा ही है बेमिसाल उस्ताद सलिल चौधरी या सलिल दा का संगीत. उनके गाने बिलकुल सागर जैसे ही तो हैं. पल भर में अंतरे की एक पंक्ति उपर जाती है और पल भर में दूसरी पंक्ति नीचे आते-आते वापस सम तक पहुंच जाती है.

शायद इसे ही लाइफ साइकल या जीवन-चक्र भी कहते हैं.

जीवन में भी एक दौर होता है जिसमें हम ऊपर रहते हैं तो अगले ही पल हम अपने आपको ज़रा नीचे पाते हैं, फिर आखिर जीवन सम पर चलने लगता है. संगीत, कला ही नहीं जीवन जीने का तरीका है. यही तरीका सलिल दा ने अपने गीतों में बखूबी पिरोया है.

सलिल दा का जन्म 19 नवम्बर, 1925 में पश्चिम बंगाल के गाज़ीपुर गाँव में हुआ था. उनका बचपन असम के चाय के बागीचों में खेलते हुए बीता. उनके पिताजी के लिए एक आयरिश डॉक्टर ग्रामोफोन और वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक का कलेक्शन छोड़ गए थे. उन्हें फिर वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक बहुत भा गया. वह वहाँ बगीचे में काम करने वाले लोगों के साथ नुकड़ नाटक भी करते थे और वक़्त मिलते ही ग्रामोफोन सुनते.

सोचिए, छोटे से सलिल दा चाय के बगीचों को निहारते हुए, भाप निकलते हुए ताज़ा चाय के कप के साथ ग्रामोफोन में मोज़ार्ट के क्लासिक तराने सुन रहे हैं. बागीचे में काम करते हुए लोग असम का लोकगीत गा रहे हैं. हल्की बारिश हो रही है, चिड़ियों की चहचहाहट के साथ. पीछे दूर पहाड़ी से बांसुरी की मीठी धुन सुनाई दे रही है. ऐसे खूबसूरत, विविधता भरे आर्टिस्टिक माहौल में वह बड़े हुए.

उनके बचपन की यादों की छाप, ये विविधता उनके गीतों में भी छलकती है.

उनके बनाए हुए गीत असम के बगीचों में हल्की फुहार जैसे लगते हैं. उनके गानों का आधार तो लोकगीत या हिंदुस्तानी राग होते लेकिन उनके म्यूजिक या ऑर्केस्ट्रा का arrangement वेस्टर्न स्टाइल में ही होता.

उनका संगीत हिन्दुस्तानी और वेस्टर्न म्यूजिक का मिलन होता था. उन्होंने एक बार खुद कहा था कि उन्हें इस तरह की शैली बनानी है जो सब सरहदें पार करे, जो असरदार हो, कसी हुई हो पर predictable न हो.

उन्होंने इसी शैली के गाने बनाए. जैसे ‘माया’ फिल्म का गाना,’ तस्वीर तेरी दिल’ में जिस तरह से लय का उतार-चढ़ाव है वो बहुत unpredictable है पर कहीं भी सम को नहीं छोडता गाना.

या फिर ‘छोटी-सी बात’ फिल्म का गाना ‘न जाने क्यूँ’ का भी चलन बदलता रहता है, पर गाना बहुत ही कसा हुआ है जो आपके मन में भी किसी की याद की कसक छोड़ जाता है. अलग ही असर है उनके संगीत का.

लेकिन सलिल दा के गुण सिर्फ संगीत तक ही नहीं सीमित थे, वे संगीतकार होने की साथ साथ, गीतकार, बांसुरीवादक, कवि और लेखक भी थे. इनमें से वो क्या ज़्यादा थे, उन्हें खुद भी नहीं मालूम था. वह कहते, ‘मुझे नहीं पता मुझे क्या चुनना चाहिए, कविता, कहानी या फिल्मों के लिए संगीत देना? मैं बस कुछ रचनात्मक करना चाहता हूँ, जब जो उस समय और मेरे उस मूड पर फिट बैठे मैं वो कर देता हूँ.’

धुनें बनाना तो उन्होने कॉलेज से ही शुरू कर दिया था. फिर उन्होंने थिएटर के लिए नाटक भी लिखे.

उस जमाने का उनका सबसे पोपुलर गाना था, ‘बेचारपोती तोमर बिचार’. पहली बंगाली फिल्म जिसमें उन्होंने संगीत दिया वो थी, ‘पोरीबोर्तन’ जो कि 1949 में रिलीज हुई.

हम सबसे ज़्यादा उन्हें हिन्दी फिल्मों के गीतों की द्वारा ही जानते हैं. पर क्या आप जानते हैं कि उनका हिन्दी फिल्म संगीत से जुड़ना महज़ इत्तफाक था!

जी हुआ यूं, कि सलिल दा ने एक बंगाली फिल्म की स्क्रिप्ट लिखी थी जो कि एक किसान के बारे में थी, जिससे उसकी ज़मीन छीन ली गयी थी.

जब ऋषिकेश मुखर्जी कोलकाता आए हुए थे तब उन्होंने सलिल दा से ये कहानी सुनी. उन्हें ये बहुत पसंद आई और उन्हें बिमल रॉय के पास भेज दिया. बिमल रॉय ने जब ये कहानी सुनी, तो उन्हें भी बहुत पसंद आई और उनसे अगले दिन कि मीटिंग तय की. पर अगले दिन जब सलिल दा उनके पास पहुंचे तो उन्हे पता चला कि बिमल दा urgently मुंबई के लिए रवाना हो गए थे.

इस बात को एक हफ्ता बीत गया और सलिल दा कि कहानी को अब भी फिल्म का स्वरूप नहीं मिल रहा था. पर एक हफ्ते बाद अचानक बिमल दा का टेलीग्राम आया. वह उनकी कहानी पर फिल्म बनाना चाहते थे.

तो इस तरह से उन्हें उनकी पहली हिन्दी फिल्म मिली, “दो बीघा ज़मीन” जो रवींद्र नाथ टैगोर की एक कविता से प्रेरित थी. इसकी कहानी सलिल दा की लिखी हुई थी और ये पहली हिन्दी फिल्म बनी जिसमें उन्होंने संगीत दिया था. उनकी लिखी इस फिल्म को Cannes Film Festival में इंटरनेशनल प्राइज़ मिला.

इसतरह, उन्होंने कुछ बीस साल बंगाली और हिन्दी फिल्मों में काम करने के बाद मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा. आगे चलते-चलते उन्होंने तेरह भाषाओं की फिल्मों में संगीत दिया, जिनमें मराठी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, गुजराती, ओड़िया और असमिया फिल्में शामिल हैंं.

वह इतने अलग बशाओं में कैसे काम कर लेते हैं, उनका मेथड क्या है, जब उनसे ये पूछा गया तो उन्होंने बताया कि वह पहले फिल्म डाइरेक्टर से गाने की सिचुएशन पूछते, उस हिसाब से संगीत तैयार करते फिर गीतकार उस धुन पर बोल लिखते. हर बार उनका प्रोसेस यही रहता पर हर बार उनका unpredictable संगीत हमें हैरान करता.

पर इस विलक्षण संगीतकार का खुद का पसंदीदा संगीतकार कौन था? जवाब है मोज़ार्ट. उनकी बेटी अंतरा जी ने एक इंटरव्यू में बताया कि सलिल दा ने एक बार मज़ाक में कहा था कि कहीं वो खुद मोज़ार्ट का पुनर्जन्म तो नहीं!

कला दर्पण है कलाकार का. सलिल दा हमेश कुछ unpredictable करना चाहते थे और म्यूजिक भी वैसा ही था. वह असम के जंगलों, वहाँ के बगीचों कि महक अपने गानों में घोल ही देते थे.

अभी बारिश का मौसम है, आप भी अपने बरामदे में बारिश को निहारते हुए, भाप निकलते हुए चाय के कप के साथ, बैक्ग्राउण्ड में सलिल दा गाना, ‘आहा रिमझिम के ये प्यारे प्यारे गीत लिए, आयी रात सुहानी देखो प्रीत लिए’ चला लीजिये और घूम हो जाइए उनके संगीत के जादू में.