परदे पर साथी किरदार को गटकने वाले हिंदी फिल्मों के नायकों की कहानी

हिंदी फिल्मों में कई बार ऐसा हुआ है कि छोटे या सपोर्टिंग रोल में आए एक्टर ने लीड एक्टर से अधिक तालियां बटोरी हों

नमकहराम में अमिताभ बच्चन राजेश खन्ना को खा गए थे
नमकहराम में अमिताभ बच्चन राजेश खन्ना को खा गए थे

अमिताभ बच्चन के आविर्भाव से पहले साठ और सत्तर के दशक की बात है. उन दिनों, हर शुक्रवार को रूपहले परदे पर आने वाली कुछ फिल्मों में दो नायक होते थे. जाहिर है, नायिका एक होती थी और दोनो हीरो उस पर जान छिड़कते थे. उस पर जान देते दिखते थे. नतीजा, फिल्म के अंत में दो में से एक नायक की जान चली जाती थी.

अमिताभ ने अकेले दम पर बॉलीवुड नायकों के इस हील-हुज्जत को परे रखकर गुंडे-बदमाशों के खिलाफ बेलचा उठा लिया था. बहरहाल, साठ-सत्तर के नायकों के जोड़े में से एक को सेकेंड लीड या सपोर्टिंग एक्टर कहा जाता था.

ऐसे हीरो के भी दो वर्ग थे.

पहला वर्ग था ऐसे नायक का, जो मेन लीड वाले हीरो का चुपचाप एकतरफा मुहब्बत का कष्ट झेलता था, हीरोइन के साथ मुहब्बत में जरूरत से ज्यादा शर्मीला दिखता था, बेहद पढ़ा-लिखा और शालीन होता था.

दूसरा वर्ग था ऐसे नायक का, जो लंपट, अमीर, महत्वाकांक्षी और बड़े दिल वाला होता था. इन फिल्मों में महमूद और उनके जैसे बाकी के कॉमेडियन भीड़ खींचने और उनको कॉमिक रिलीफ दिलवाने आइटम नंबर की तरह पेश किए जाते थे.

तब उन सिनेमाघरों में बाज़ी लगती थी कि दो हीरो वाली इन फिल्मों में कौन हीरो किसको खा जाएगा?

फिल्मी भाषा में कहें तो इसका सीधा मतलब था कि फिल्म के दो हीरों में से किस हीरो के हिस्से अधिक तालियां और सीटियां आएंगी. किस हीरो के बारे में सिनेमा देखकर घर लौटती भीड़ अधिक चर्चा करेगी.

इस प्रतिस्पर्धा की शुरुआता हुई थी जे ओमप्रकाश की फिल्म ‘आई मिलन की बेला’ से, जिसमें राजेंद्र (जुबली) कुमार, सायरा बानो और धर्मेंद्र थे. इस फिल्म में धर्मेंद्र वह बुरे आदमी थे जो आखिर में आकर सुधर जाता है.

फिल्म में अपने गरम धरम को सायरा नहीं मिलतीं, सीधे-सादे किरदार वाले राजेंद्र कुमार को ही मिलती है, लेकिन धर्मेंद्र के हिस्से में सारा ह्यमूर चला गया था. वह एक ऐसे शख्स थे जो सिगरेट और व्हिस्की पीता था, जिसकी क्लीन शेव चेहरे के साथ जब्बर बॉडी थी.

आई मिलन की बेला का दृश्य
फिल्म आई मिलन की बेला में धर्मेंद्र छा गए थे

राजेंद्र कुमार के हिस्से में मोहम्मद रफी के गाए सारे हिट गाने थे पर अब इतने गुण की खान धर्मेंद्र दर्शकों को अधिक पसंद आए.

तो सवाल था कि किसने किसको खाया? धर्मेंद्र सेकेंड लीड में थे, छोटी भूमिका में थे, सपोर्टिंग एक्टर थे पर वे राजेंद्र कुमार को खा गए.

उस वक्त से ही यह सवाल हर मल्टीस्टारर फिल्म में उछलने लगा कि कौन किसको खाएगा.

धर्मेंद्र उसके बाद से बड़ी भूमिकाओं में आने लगे थे. पर उनको भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा जब उनका साबका फिल्म ‘काजल’ में राजकुमार के साथ पड़ा. राज कुमार उन दिनों हीरो इटर्स के किंग कहे जाते थे और धर्मेंद्र ने उनके साथ काम करके खतरा मोल ले लिया था.

बी.आर. चोपड़ा की ‘आदमी और इंसान’ में राजकुमार की जगह फिरोज खान ने ले ली थी, पर उन्होंने भी धर्मेंद्र को नहीं बख्शा. फिरोज खान उन दिनों अपने पूरे शबाब में थे और उन्होंने अपने मेलोड्रामा से गरम धरम को नरम साबित कर दिया. इस फिल्म में फिरोज की मौत हो जाती है वह दर्शकों की सहानुभूति बटोर ले जाते हैं.

आदमी और इंसान में फिरोज खान का जलवा था
आदमी और इंसान में धर्मेंद्र सीधे-सादे व्यक्ति के किरदार में थे

पर जब फिरोज खान खुद लीड एक्टर बने, तो उन्होंने तय किया कि उनकी फिल्म में कोई सपोर्टिंग एक्टर नहीं होगा, जो उनको खा जाए.

इस बात को लेकर वह इतने मुख्तार थे कि सुपरस्टार राजेश खन्ना (सफर), राजेंद्र कुमार (आरजू) अशोक कुमार और राज कुमार (ऊंचे लोग) जैसे लोग भी उनकी दमदार स्क्रीन प्रेजेंस से दहशत में रहते थे. बहुत साल बाद, वह शत्रुघ्न सिन्हा के अपोजिट कास्ट किए गए.

सिन्हा खुद अपने साथी अदाकार को खाने के माहिर खिलाड़ी थे. तो जब फिल्म ‘कशमकश’ बन रही थी, तब ऐसा लग रहा था कि इन दो जब्बर एक्टरों के बीच की कश्मकश देखने लायक होगी, पर फिल्म सीला पटाखा साबित हुई और फुस्स हो गई.

जहां तक बिहारी बाबू का सवाल है उनका पसंदीदा शिकार थे अनिल धवन. वह शत्रु के दोस्त, प्रतिद्वंद्वी सभी थे, पर हमेशा बड़े भाई का किरदार निभाते थे. फिल्म ‘चेतना’ याद करिए, जिसमें वह शर्मीले और नर्वस अनिल धवन को वेश्या बनीं रेहाना सुल्तान के यहां ले जाते हैं और फिर उनका भारी-भरकम डायलॉग आता हैः “जब वेश्या की उम्र बढ़ती जाती है, तो उसका दाम घटता रहता है, बढ़ता नहीं.”

शत्रुघ्न सिन्हा की डायलॉग बोलने के अंदाज पर तालियां बज जाती थीं
चेतना में अनिल धवन शत्रुघ्न सिन्हा के सामने बेचारे लगे थे

बहरहाल, शत्रु ने सुपरस्टारों का शिकार करने में भी परहेज नहीं किया. यहां तक कि वह देव आनंद की फिल्म ‘गैंबलर’ में दो मिनट के कैमियो में रहे हो या ‘शरीफ बदमाश’ में. ‘भाई हो तो ऐसा’ में शत्रु ने जीतेंद्र की चटनी बना दी और ‘रामपुर का लक्ष्मण’ में रणधीर कपूर की.

लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा को भी आखिरकार उनका जोड़ीदार मिल ही गया. ये थे विनोद खन्ना. गुलजार की ‘मेरे अपने’ (अरे वही, श्याम कहां है? कह देना, छेनू आया था  वाली फिल्म) को याद कीजिए. फिल्म में खन्ना एक मजबूत और सॉलिड किरदार थे और एक बेरोजगार युवा की भूमिका में थे.

उनके किरदार में गजब की संवेदनशीलता थी और वे बेहद लाउड हो रहे शत्रुघ्न सिन्हा पर लगभग हर सीन में भारी पड़े थे. हालांकि, शत्रुघ्न सिन्हा का पहले सीन में परदे पर आना धमाकेदार था, पर क्लाइमेक्स आते-आते विनोद खन्ना भारी पड़ गए.

इधर विनोद खन्ना भी बड़े-बड़ों से भिड़ने आए थे. खुद अमिताभ बच्चन के साथ, वह ‘हेरा-फेरी’, ‘खून पसीना’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, में साथ आए. ‘मेरा गांव मेरा देश’ में खन्ना ने धर्मेंद्र के साथ जो किया, वह किसी हिंदी सिनेमा नायक के साथ ग्रे किरदार या विलेन ने नहीं किया होगा.

तो कल्ट बन गई इस फिल्म में किसने किसको खाया? जाहिर है, खन्ना ने धर्मेंद्र को.

पर ऐसा नहीं है धर्मेंद्र ऐसे हीरो थे कि किसी ने भी उनको आकर परदे पर धो दिया हो और दर्शकों का दुलारा बन बैठा हो.

अमिताभ बच्चन उन दिनो शशि कपूर और ऋषि कपूर को अपनी फिल्मों में रखते थे जिनकी चॉकलेटी शख्सियत के सामने अमिताभ का चरित्र और खिलकर उभरता था. पर अमिताभ के सामने ‘शोले’, ‘राम-बलराम’ और हृषिकेश मुखर्जी की ‘चुपके-चुपके’ में धर्मेंद्र ने अमिताभ का तकरीबन शिकार कर ही लिया था.

इनमें अमिताभ सुपरस्टार के रूप में उभरने से पहले सेकेंड लीड में थे.

याद कीजिए ‘आनंद’. उस समय के सनसनी बन चुके राजेश खन्ना के मुकाबले बाबू मोशाय का किरदार छोटा था पर अमिताभ ने सीन-दर-सीन राजेश खन्ना को टक्कर दी थी. हां, ‘नमकहराम’ का किस्सा अलहदा है.

‘नमकहराम’ तक आते-आते राजेश खन्ना का जादू बिखरने लगा था और अमिताभ का परफॉर्मेंस इतना दहकता हुआ था कि राजेश खन्ना उस फिल्म में उड़ ही गए.

नमकहराम में अमिताभ बच्चन राजेश खन्ना को खा गए थे
नमकहराम में अमिताभ बच्चन राजेश खन्ना को खा गए थे

राजेश खन्ना के कथित करिश्मे की अमिताभ ने उस फिल्म में हवा निकाल दी.

उन्हीं दिनों यश चोपड़ा ‘दीवार’ के लिए कास्टिंग कर रहे थे. उनकी पहली पसंद राजेश खन्ना थे. जाहिर है, उन्हें बच्चन या शशि कपूर वाली भूमिकाओं में किसी एक का प्रस्ताव दिया जाने वाला था.

लेकिन राजेश खन्ना ‘नमकहराम’ में अमिताभ के साथ काम करके हाथ जला बैठे थे. ऐसे में, बड़ी मूर्खतापूर्ण ढंग से चोपड़ा से उन्होंने दबाव डाला कि वह इसमें डबल रोल करना चाहते हैं. जाहिर है, चोपड़ा ने मना कर दिया. फिर, उसके बाद जो हुआ, वह इतिहास है.

अमिताभ के सामने पानी नहीं मांगनेवाला एक और किस्सा नवीन निश्चल का है. फिल्म थी ‘परवाना’. फिल्म पिटी थी पर अमिताभ के दबदबे भरे परफॉरमेंस के सामने नवीन निश्चल बिल्कुल बेचारे साबित हुए थे.

यह लेख अधूरा रहेगा अगर हम राजकुमार की चर्चा न करें. राजकुमार की दबंगई से निबटने के लिए फिल्मकारों ने सोचा कि एक हीरो शायद पूरा न पड़ता हो. इसकी झलक ‘दिल एक मंदिर’ में राजेंद्र कुमार, ‘पाकीजा’ में अशोक कुमार और ‘हमराज’ में सुनील दत्त देख चुके थे. राजकुमार, परदे पर भूखे शेर की तरह दिखते थे.

तब आई ‘वक्त’, जिसमें बलराज साहनी, सुनील दत्त और शशि कपूर थे. पर जिस भी फ्रेम में ये राजकुमार के साथ रहे, पलड़ा राजकु  मार के पक्ष में झुका हुआ साफ दिखा.

वक्त में राजकुमार सब पर भारी पड़े थे
वक्त में राजकुमार सब पर भारी पड़े थे

दिलीप कुमार एकमात्र एक्टर रहे, जिन्होंने ‘सौदागर’ में राजकुमार का मुकाबला किया.

यहां तक कि इस मामले में दिलीप कुमार भी कुछ खास दयालु नहीं थे. एचएस रवैल की फिल्म ‘संघर्ष’ में नवागंतुक संजीव कुमार और बलराज साहनी दोनों के साथ उनका मुकाबला देखने लायक है.

पर, शिकार के मामले में सबसे बड़ी फिल्म है ‘शोले’. संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र सबके परफॉर्मेंस पर गब्बर सिंह बने अमजद खान भारी पड़े थे. इस फिल्म के बाद अमजद खान ने भी कई सारे किरदार निभाए, लेकिन कभी किसी दूसरे किरदार पर भारी पड़ते दिखाई नहीं दिए.

‘मुकद्दर का सिकंदर’ में अमिताभ की तरह का किरदार था उनका, और ऐसा ही उदाहरण ‘कुरबानी’ भी है. पर गब्बर वाला जादू गायब था.

हालांकि अमिताभ के सुपरस्टारडम में छाने के बाद यह चलन कम हो गया. उनकी फिल्मों में शशि कपूर (दो और दो पांच) शत्रुघ्न सिन्हा (काला पत्थर, दोस्ताना) या मिथुन (अग्निपथ) में इसलिए लिए जाते थे ताकि अमिताभ की भव्य उपस्थिति और और अधिक भव्य बनाया जा सके.

कई पीढ़ियों के बाद, हीरो को खाने वाला यह दौर खत्म हो गया. बस एकाध मिसालें हैं, जब ‘डर’ में कककक….किरण कहकर शाहरुख ने सनी देयोल को निबटा दिया था और सनी देयोल ने यही काम ‘जीत’ में सलमान खान के साथ किया था.

पर फिल्मी हीरो की ऐसी टक्कर अब कम देखने को मिलती है.