बॉलीवुड के पहले और असली सुल्तान थे दारा सिंह

शारीरिक शक्ति के मामले में दारा सिंह जीवित किंवदंती बन गए थे

दारा सिंह शारीरिक शक्ति के प्रतीक थे
दारा सिंह का नाम कहावतों में आने लगा था

हम जब छोटे थे तो हमारे इलाके में एक कहावत बहुत चला करती थी. जब भी कोई आदमी अपनी कूव्वत से अधिक का शारीरिक काम करने की कोशिश करता तो उसे रोकने के लिए कहा जाता, ज्यादा दारा सिंह (Dara Singh) मत बनो.

दारा सिंह का मुक्का, दारा सिंह की छाती, दारा सिंह ने किंग कॉन्ग को चीर कर फेंक दिया… गांवों में ऐसे किस्से दालानों पर सुनने को मिलते थे. लालटेन को घेरकर बैठी बच्चों को भीड़ गांव में आए किसी फूफा या बहनोई के सुनाए फिल्मी किस्सों को भी सच मानती और कहां से असली कहानी शुरू होती और कहां सिनेमा (Cinema) के परदे वाली कहानी, पता ही नहीं चलता था.

पर सचाई है कि दारा सिंह भारत के ऐसे व्यक्ति तो थे ही जो पहलवान (wrestler) भी थे, अभिनेता (Actor) भी और बाद में राजनेता (Politician) भी.
पर ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि दारा सिंह उन बेहद कम पहलवानों में होंगे जिन्हें इतनी मशहूरी मिली.

1928 में नवंबर महीने की 19 तारीख को अमृतसर के धरमूचक में जन्मे दारा सिंह, असल में दारा सिंह रंधावा थे. यह भी सचाई है कि पूरी जिंदगी में उन्होंने कोई कुश्ती हारी नहीं थी.

और अगर शारीरिक सौष्ठव को लेकर उपमा दारा सिंह बने तो इसके पीछे बाजिव वजहें भी थीं. क्या लंबाई थी, 6 फुट 2 इंच और छाती, 53 इंच. उनके जमाने में ऐसा शरीर सौष्ठव किसी पहलवान का नहीं था.

दारा सिंह जब जवान हो रहे थे तो उनकी बॉडी देखकर ही उनको पहलवान बनने की सलाह दी गई और बतौर पहलवान उन्होंने मेलो और हाटों में अपनी पहली कुश्तियां लड़ीं.

शैली देसी थी. जिसको हम लोग कहते हैं न पहलवानी. लंगोट कसकर अखाड़े की धूल बदन में लपेट कर. कुश्ती की जो परंपरा भारत में हजार साल से चली आ रही है वह तकनीक.

दारा सिंह कुश्ती में हिस्सा लेने के लिए कई एशियाई देशों के दौरे पर गए थे. सन 1947 में वह सिंगापुर गए थे. उन्हें तब चैंपियन ऑफ मलेशिया का खिताब मिला जहां उन्होंने तरलोक सिंह को पटखनी देकर हराया था. 1954 में वे राष्ट्रीय चैंपियन बने और तब उनकी उम्र थी महज 26 साल.

1959 में वे राष्ट्रमंडल खेलों में चैंपियन बने और तब के बड़े नाम किंग कॉन्ग, जॉर्ज गोर्दिएन्को और ज़ॉन डि सिल्वा जैसे बड़े नामों को हराकर उन्होंने अपने लिए खिताब और किंवदंतियां दोनों हासिल कर लीं. 1968 में अमेरिका के लोऊ तेस्ज को हराकर वह विश्व चैंपियन भी बने. तो उनकी पहलवानी के लिए उन्हें रुस्तम-ए-हिंद और रुस्तम-ए-पंजाब जैसे खिताब दिए गए.

1983 में उन्होंने दिल्ली में आय़ोजित एक टूर्नामेंट में अपने रिटायरमेंट की घोषणा कर दी.

दारा सिंह ने अपनी फिल्मों में भी अपनी ताकत को जमकर भुनाया, या ऐसे कहना ठीक होगा कि बंबइया फिल्म उद्योग ने उनकी बॉडी को परदे पर कमाई का जरिया बनाया. सिकंदर-ए-आज़म, वतन से दूर, दादा, रुस्तम-ए-बग़दाद, शेर दिर और राका जैसी फिल्में इस बात की तस्दीक करती हैं.

लेकिन दारा सिंह छोटा हो या बड़ा, परदे के सबसे प्रामाणिक हनुमान भी बने. चाहे राम की भूमिका में विश्वजीत हों, जीतेंद्र हों या अरुण गोविल.

दारा सिंह पहले ऐसे खिलाड़ी थे जिन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया था. 2003 से लेकर 2009 तक वगह राज्यसभा सदस्य रहे.