धूप ला रहे हैं गुलज़ार, विशाल और रेखा भारद्वाज

गुलज़ार की गैर-फिल्मी नज़्मों को विशाल और रेखा भारद्वाज संगीतबद्ध कर रहे हैं

धूप आने दो
गुलजार की नई नज़्मों को सुर में ढाल रहे विशाल और रेखा भारद्वाज

टेबल पर रखी हुई बहुत सारी किताबें, उन किताबों के पीछे, सफ़ेदपोश शख्स. वह, जो कई सालों से, अपने ज़हन में रखे हुए सूरज से, हल्की-हल्की धूप छिड़कता रहता है.

बम्बई के पाली हिल में रहता वो दरवेश है, चिट्ठी पर लिख दो बोस्कियाना तो सीधे पते पर चली जाती है.

समझ तो गए होंगे आप उनका नाम है “गुलज़ार”.

कभी जो जाओ वहां, तो मिंट लेमन की ग्रीन टी ज़रूर पीना, हाँ, बिना शक्कर डाले. उन्हें देखकर शक्कर की ज़रूरत ही नहीं पड़ती.

जब से लॉकडाउन शुरू हुआ है, गुलज़ार साहब घर में ही हैं. लेकिन दुनिया तो आपके घर में भी आ जाती है, भले ही आप घर से बाहर न निकलो, पर दुनिया अलहदा सूरतों में घर में आ ही जाती है. मुल्क़ में एक कोरोना की वजह से जो कुछ चल रहा था, उससे कोई भी अछूता तो नहीं है. भले वो मज़दूरों का पलायन हो, बढ़ती हुई बीमारी हो, लॉकडाउन हो… उसकी वज़ह एक उदासी ने सबको छुआ था.

गुलज़ार साहब की कलम चली और नज़्म निकली “धूप आने दो”…. यहाँ धूप शायद ज़िन्दगी को कहा गया है, शायरी की यही तो ख़ूबसूरती है, पढ़ने वाला अपना मतलब निकाल लेता है. पोएट्री की ख़ासियत है, वह सबके साथ अलग अंदाज़ में संवाद करती है.

मैं अपनी बात कहते-कहते ज़रा भटक जाता हूं. बहरहाल, हम बात कर रहे थे, धूप की, ज़िन्दगी की धूप की. इस नज़्म में छुपी हुई धूप की गर्माहट को महसूस किया, विशाल भारद्वाज और रेखा भारद्वाज ने… और धूप पकने लगी.

उसने आवाज़ और संगीत के जेवर पहने और इसके साथ ही विशाल भारद्वाज ने अपने म्यूजिक लेबल भी लॉन्च किया, जिसका नाम है वीबी म्युज़िक. और साथ ही साथ उन्होंने वादा किया है, वो हर महीने एक गीत इस लेबल के तले हमें ज़रूर परोसेंगे. क्योंकि फ़िल्म की अपनी बंदिश होती है, और हर आर्टिस्ट चाहता है, वो इस बंदिश से थोड़ी-सी रिहाई ले ले और खुलकर साँस ले पाए.

तो वीबी म्युजिक वही आज़ाद हवा है. इस लेबल का पहला गीत हमारे बीच आ गया है “धूप आने दो”.

और एक नज़्म, गीत बनकर हमारे सामने आ गई. जिसे आवाज़ दी है विशाल और रेखा भारद्वाज ने और संगीत दिया है, विशाल भारद्वाज ने. आप जब इसे सुनेंगे तो, धीमे धीमे बोस्कियाना से निकली धूप आपके कमरे में बिखर जायेगी.

आप भी इस ज़िन्दगी की धूप की गर्माहट को महसूस कीजिए. क्योंकि, हमें इस धूप की सख्त़ ज़रूरत है. गुलज़ार साहब कहते हैं-

मीठी–मीठी है, बहुत खूबसूरत है
उजली रोशन गई ज़मीं, गुड़ की ढेली है

गहरी सी ज़हरी हवा उतरी है इस पर
लगे न घुन इसे
हट के ज़रा सी देर तो ठहरो

धूप आने दो! धूप आने दो!