दिलीप कुमार से प्रेरित होकर रखा मनोज कुमार नाम, ‘शहीद’ देखकर लालबहादुर शास्त्री भी हुए मुरीद

देशभक्ति फिल्मों के लिए मशहूर मनोज कुमार ने अपना फिल्मी नाम दिलीप कुमार से प्रेरित होकर रखा था

मनोज कुमार उर्फ भारत कुमार
मनोज कुमार ने रोमांटिक भूमिकाएं भी बेहतर निभाईं

साल 1949 में फिल्मिस्तान स्टूडियो की एक फिल्म आई थी, जिसमें मुख्य भूमिकाओं में दिलीप कुमार और कामिनी कौशल थे. इस फिल्म का नाम था ‘शबनम’ और ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट भी रही थी. लेकिन मनोज कुमार का इस फिल्म शबनम से क्या रिश्ता है? वो तो इस फिल्म के रिलीज होने के समय केवल 12 साल के थे!

दरअसल, मनोज कुमार को मनोज इसी फिल्म ‘शबनम’ ने बनाया, क्योंकि मनोज कुमार ट्रेजिडी किंग दिलीप कुमार के बहुत बड़े फैन थे और ‘शबनम’ में दिलीप साहब के किरदार का नाम था मनोज.

और ब्रिटिश इंडिया के एबटाबाद (जो आज पाकिस्तान में है) में 24 जुलाई, 1937 को पैदा हुए हरिकिशन गिरि गोस्वामी अपने आइडल के किरदार से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना नाम ही मनोज कुमार रखने का फैसला कर लिया. जी हां, मनोज कुमार का असली नाम हरिकिशन गिरि गोस्वामी ही है.

बंटवारे की वजह से 1947 में उनका परिवार दिल्ली आ गया था, जहां दिल्ली यूनिवर्सिटी के हिंदू कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद मनोज कुमार ने फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाने की सोची.

1957 में उन्हें पहली फिल्म मिली ‘फैशन’, लेकिन इसमें उन्हें कुछ खास रोल नहीं मिला था.

हालांकि, उन्हें फिल्में मिलती रहीं, और उनकी किस्मत चमकी 1962 की सुपर हिट मूवी ‘हरियाली और रास्ता’ से, जिसमें उनकी नायिका थीं माला सिन्हा और शशिकला. प्रेम त्रिकोण वाली इस फिल्म का म्युजिक भी खूब पॉपुलर हुआ और कई गीत मसलन ‘तेरी याद दिल से भुलाने चला हूं’ और ‘अल्लाह जाने क्या होगा आगे’ आज भी पुरानी गीतों के शौकीन लोग गुनगुनाते मिल जाएंगे.

हैंडसम मनोज कुमार की अपने चेहरे को उंगलियों से ढकने की अदा तो आज भी मशहूर है.

मनोज कुमार ने इसके बाद फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा.

उनकी अदाकारी से सजी कई फिल्में एक के बाद हिट होती गईं, जिनमें ‘वो कौन थी’, ‘गृहस्थी’, ‘गुमनाम’ और ‘हिमालय की गोद में’ मुख्य थीं. लेकिन मनोज कुमार को जिस मूवी ने एक नया अवतार दिया, वो थी साल 1965 में आई ‘शहीद’.

शहीद-ए-आजम भगत सिंह के जीवन पर बनी, देशभक्ति की भावना से भरपूर इस फिल्म में मनोज कुमार ने भगत सिंह का किरदार निभाया था, और इस सुपरहिट फिल्म ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री तक को प्रभावित किया था.

इस फिल्म के कई गीत आज भी हमारे दिलों को देशभक्ति से ओत-प्रोत कर देते हैं, जिनमें शामिल हैं, ‘ऐ वतन, ऐ वतन, हमको तेरी कसम’, ‘सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है’ और ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’.

13वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में ‘शहीद’ को हिंदी की बेस्ट फीचर फिल्म का अवॉर्ड मिला था.

इसके बाद लाल बहादुर शास्त्री के नारे ‘जय जवान, जय किसान’ को थीम बनाकर मनोज कुमार ने फिल्म बनाई, ‘उपकार’, जो उनके करियर की सबसे बड़ी फिल्म साबित हुई.

इसमें उन्होंने किसान और सैनिक दोनों का रोल निभाया. देशभक्ति से भरी इस फिल्म के बाद मनोज कुमार को लोग भारत कुमार ही कहने लग गए.

उपकार में मनोज के किरदार का नाम भारत था और ये फिल्म इसकी कहानी, कलाकारों की अदाकारी और शानदार गीत-संगीत के चलते सुपर हिट साबित हुई.

मनोज ने ख़ुद इस फिल्म का डायरेक्शन भी किया था, और इसे फिल्म फेयर के कई पुरस्कारों के अलावा नेशनल फिल्म अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था. ‘मेरे देश की धरती, सोना उगले…’ और ‘कसमें वादे प्यार वफ़ा सब…’जैसे गीतों को कौन भूल सकता है, जो इसी फिल्म ‘उपकार’ के हैं.

ऐसा नहीं है कि मनोज साहब ने इसके बाद रोमांटिक हीरो वाले रोल नहीं किए. ‘पत्थर के सनम’, ‘बेईमान’, ‘संन्यासी’ और ‘दस नंबरी’ जैसी कई हिट-सुपरहिट फिल्में मनोज कुमार ने दी हैं. लेकिन अपनी भारत कुमार की इमेज को पुख्ता करने के लिए उन्होंने ‘पूरब और पश्चिम’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’ और ‘क्रांति’ जैसी फिल्में ख़ुद डायरेक्ट की, जो देशभक्ति पर आधारित फिल्में हैं.

1981 में आई ‘क्रांति’ में मनोज कुमार को अपने आइडल दिलीप साहब को डायरेक्ट करने का मौका भी मिला.

मल्टीस्टारर ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी.

दिलचस्प बात ये है कि उपकार के अलावा ‘पूरब और पश्चिम’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘क्रांति’ और 1989 की फिल्म ‘क्लर्क’- इन सबमें मनोज कुमार के किरदार का नाम भारत ही है.

हालांकि, क्रांति के बाद से ही मनोज कुमार का फिल्मी करियर ढलान पर आने लगा था. इसके बाद आई फिल्मों में ना तो उनकी अदाकारी कोई कमाल कर पाई, ना ही उनका डायरेक्शन.

1995 में बतौर एक्टर उनकी आखिरी फिल्म आई थी- ‘मैदान ए जंग’, जिसमें उन्होंने मास्टर दीनानाथ का रोल निभाया था. इसके बाद मनोज साहब ने एक्टिंग को अलविदा कह दिया.

1992 में मनोज कुमार को पद्म श्री से सम्मानित किया गया था, और फिर 2016 में उन्हें भारतीय सिनेमा में लाइफटाइम कंट्रीब्यूशन के लिए दादा साहब फाल्के अवॉर्ड दिया गया.

चार दशकों से भी ज्यादा समय तक भारतीय फिल्मों को अपनी अदाकारी, लेखन और डायरेक्शन से समृद्ध करने वाले मनोज कुमार ने अपने करियर में ढेरों अवॉर्ड्स जीते और लोगों का भरपूर प्यार हासिल किया.

बतौर एक्टर मनोज कुमार ने पर्दे पर रोमांस, कॉमेडी, एक्शन और ड्रामा सब कुछ किया है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान तो ‘भारत कुमार’ की ही है.

जब भी भारतीय फिल्म इतिहास में पैट्रियोटिक फिल्मों का जिक्र होगा, मनोज साहब की मैग्नम ओपस ‘उपकार‘ हर बार टॉप फिल्मों में एक मानी जाएगी. आज 83वें जन्मदिन पर रुपहले पर्दे के इस देशभक्त चितेरे को हम सबका सादर नमन.