ऋषिकेश मुखर्जी: आम आदमी का फ़िल्मकार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र को दिए अविस्मरणीय रोल

ज़िंदगी ऐसा कनवास है जहां मौसम हमेशा बदलते रहते हैं, कभी पतझड़, तो कभी बहार होती है। कोई दिन कभी अच्छा जाता है तो कोई दिन खराब। कभी चाय में दूध कम पड़ जाता है तो कभी एक्सट्रा कप बन जाता है। उसी एक्सट्रा चाय के कप की चुसकियाँ लेकर जब आम इंसान कोई फिल्म देखता है तो स्क्रीन पर डांस कर रहे हेरो को देखकर सोचता है क्या ज़िंदगी सच में ऐसी होती है? ऐसी चटक रंग की शर्ट पहनकर जब हम गायें तो हमारे गले से भी मोहम्मद रफी जैसी आवाज़ नेकलेगी? बिना किसी बैंड के अपने आप बगीचे में ऑर्केस्ट्रा बजने लगेगा? डांस करते वक़्त स्टेप्स अपने आप सूजते जाएंगे वो भी सबको एक जैसे ही?

धत्त! ऐसा थोड़ी होता है, ये तो फिल्मी दुनिया है। असल दुनिया अलग होती है। फिल्मी हीरो अलग होते हैं और आम जनता अलग। क्या दोनों दुनिया कभी मिल सकती हैं? जी हाँ! और इस असल और फिल्मी दुनिया को मिलाने वाले, आम आदमी को ही हीरो बनाने वाले थे सबके चहेते डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी यानि ऋषि दा। उनका जन्म कोलकाता में हुआ और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलकाता से उन्होंने कैमिस्ट्रि में ग्रेजुएशन की। कुछ वक़्त उन्होंने साइन्स और मथेमेटिक्स पढ़या भी। पर उनका मन कैमरा में अटका था।

ऋषि दा ने कैमरामैन बनने के लिए 1945 में BN Sircar के New Theatres प्रॉडक्शन कंपनी को जॉइन किया| वह वहाँ की प्रोसेसिंग लैबोरटरी में वो काम करते थे। वो फोटोग्राफी की बारीकियाँ सीखना चाहते थे। उस वक़्त उनके पास रिक्शा के पैसे नहीं हुआ करते थे तो वो New Theatres पैदल चलकर जाते थे। वहाँ पैदल चलते हुए वो बहुत से फिल्मी सितारों की गाडियाँ स्टूडियो में जाते देखते थे। एक बार उन्हें बिमल रॉय गाड़ी में जाते दिखे। उन्होने बिमल रॉय को देखकर हाथ हिलाया तो बिमल दा ने उनके लिए गाड़ी रोकी और उन्हे अंदर बैठने को कहा| ऋषि दा को लगा कि वो लकी हैं कि बिमल दा ने उनके लिए गाड़ी रोकी पर जैसे गाड़ी आगे बढ़ी तो उन्होंने देखा कि जो भी बिमल दा को हाथ हिलाकर संबोधित कर रहा था, वो उन सबको गाड़ी में लिफ्ट दे रहे थे, चाहे वो कोई, कारपेंटर हो या technician हो या जूनियर आर्टिस्ट। ये थी उनके गुरु, बिमल दा के साथ उनकी पहली मीटिंग। ऋषि दा के जीवन की सबसे अहम कड़ी है बिमल दा और उनका गुरु शिष्य का रिश्ता।

ऋषि दा को पहला ब्रेक कब मिला और कैसे इसकी कहानी अलग है। उन्हें New Theatres में काम करते हुए काफी वक़्त हो गया था। पर वहाँ freelancer होने कि प्रथा नहीं थी। वहाँ वो प्रिंटिंग लैब में काम करते थे और बारह बजे उनका काम पूरा हो जाता था। आगे बढ़ने का कोई जरिया ना दिखते हुए उन्होने New Theatres छोडने की सोची। उन्होने एक कंपनी में केमिकल supervisor का जॉब भी ढूंढ लिया था।

एक दिन बारह बजे जब वो अपना काम खत्म कर जा रहे थे तब उन्हे पता चला कि बिमल दा के एडिटर बीमार हो गए और पूरा भार assistant एडिटर पर आ गया। वो assistant एडिटर ऋषि दा के सीनियर थे। तो जब उन्होंने ऋषि दा से पूछा कि क्या वो एडिटिंग में उनकी मदद करेंगे तो उन्होने हाँ कहा। तब एडिटिंग का प्रोसेस अलग हुआ करता था, नेगेटिवेस बनते थे फिर प्रिंटिंग लैब में जाते थे। लगभग मेन्यूअल काम था। बिमल दा की फिल्म की एडिटिंग करते वक़्त एक सीन में कुछ मिस-सिंक हो रहा था। कुछ था जो सिंक में नहीं जा रहा था। पर कोई समझ पा रहा था कि वो exactly कौनसा शॉट था? बिमल दा और उनके सारे assistant गड़बड़ी ढूँढने में लगे हुए थे। इतने में पीछे से ऋषि दा की आवाज़ आई, उस वाले शॉट को वापस देखिये, वहाँ से ही कुछ छूट रहा है और गड़बड़ हो रही है। उन्होनें अपनी मैथेमैटिक्स लगाकर गलती ढूँढी। बिमल दा ने देखा और वाकई गड़बड़ वहीं से शुरू थी| उन्होंने ऋषि दा से कहा कि, “तुमने पहले क्यूँ नहीं बताया?” ऋषि दा ने जवाब दिया कि उन्हें पक्का नहीं पता था, वो तो बस टेक्निकल हेल्प के लिए थे वहाँ|

फिर बिमल दा ने उन्हें एडिटिंग डिपार्टमेंट जॉइन करने के लिए कहा। New Theatres में रुल्स बहुत स्ट्रीक्ट थे। ट्रांसफर्स नहीं होते थे| बिमल दा ने बात करके उनका एडिटिंग डिपार्टमेंट में ट्रान्सफर करवाया। उसके बाद बिमल दा के साथ उनका सफर शुरू हुआ, जहां उन्होंने एडिटिंग सीखी, चीफ assistant डाइरेक्टर बने और स्क्रिप्ट रायटर भी। जब तक वो उनके साथ थे, उनकी हर फिल्म की एडिटिंग ऋषि दा ने की। उनसे एक बार पूछा गया कि जब उन्होंने खुद इंडिपेंडेंट डाइरेक्टर बनने का डिसीजन लिया तो क्या बिमल दा ने उन्हें रोका या वापस आने को कहा? तो उनका जवाब था – “नहीं! वो क्यू कहेंगे ऐसा? उन्होंने मुझे बनाया| वो मुझ जैसे और कितने बना सकते हैं।”

बिमल दा को कोई ऐसा एडिटर चाहिए था जो उनके साथ चौबीस घंटे काम करे, जो अब ऋषि दा के लिए मुमकिन नहीं था। तो बिमल दा ने कहा कि अब ऋषि दा सिर्फ अपने काम पर कॉन्संट्रेट करें और इसलिए अब वो उनकी जगह किसी और को रखना चाहते हैं तो ऋषि दा ने कहा,” हाँ बिल्कुल क्यूँ नहीं?” पर ऐसा नहीं था की इसका बाद उनका रिश्ता पीछे छूट गया, जब सुजाता का पहला नेगेटिवे काटा जाना था तब उन्होंने ऋषि दा को बुलाया और कहा, “पहली नेगेटिवे कि कटिंग तुम ही करोगे और देख भी लेना sequence में सब है या नहीं।” वो professionally नहीं जुड़े हुए थे उनसे, वो बिमल दा के परिवार का हिस्सा थे| उनके लिए वो पिता के समान थे।

वहाँ से ऋषि दा का नया सफर शुरू हुआ। उस सफर का पहला स्टेशन था “मुसाफिर”, मतलब उनकी पहली फिल्म थी, “मुसाफिर”। जिसका पूरा क्रेडिट वो दिलीप कुमार को देते हैं। Actually वो अपने डायरेक्टर बनने का क्रेडिट भी उन्हें ही देते हैं। वो ही थे जो बार-बार उनसे डाइरैक्शन करने को कहते थे और ऋषि दा हर बार मना कर देते थे। एक बार जब दिलीप साब उनके घर गए तो उनसे पूछा कि वो किस तरह की फिल्में बनाना चाहते हैं? तो उन्होंने जवाब दिया कि ये घर देखिये, उनसे पहले कोई और किरायेदार यहाँ रहने आया होगा, उसकी अलग कहानी होगी, जो उससे भी पहले आया उसकी अलग, किसी के जीवन में कुछ संघर्ष होगा, किसी के कुछ, एक ही घर में कितने लोग आए यहाँ, कितनी कहानियाँ हो सकती हैं। उन्हें एक ही घर के अलग अलग किराएदारों की तीन शॉर्ट स्टोरीस की फिल्म बनानी थी| ये सुनकर दिलीप साब मुस्कुराए और बोले,”तू मरेगा! इस तरह की फिल्में चलती नहीं हैं। पर तुम बनाओ, मैं फ्री में काम करूंगा। मैं तुम्हें फिल्म डाइरेक्टर बनते देखना चाहता हूँ|” उनका ये कहना है की उन्हें फिल्म डाइरैक्शन का जो भी ज्ञान है वो बिमल दा की वजह से है पर उनका बतौर फिल्म डायरेक्टर उनका जो करियर बना वो दिलीप कुमार की वजह से बना।

मुसाफिर कमर्शियल हिट नहीं थी। इस तरह की फिल्में उस समय क्या अब के समय के लिए अहेड ऑफ टाइम हैं। पर इस फिल्म को नेशनल अवार्ड और सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट मिला। उनकी दूसरी फिल्म अनाड़ी को प्रेसीडेंट्स सिल्वर मेडल फॉर बेस्ट फीचर फिल्म इन हिन्दी मिला और उनकी तीसरी फिल्म अनुराधा को प्रेसीडेंट्स गोल्ड मेडल फॉर द ऑल इंडिया बेस्ट फीचर फिल्म मिला। उन्हें “मिडिल सिनेमा” का जन्मदाता कहा जाता है।

आम ज़िंदगी की कहानी भी बड़े पर्दे पर बताई जा सकती है ये आइडिया उनका ही था। आर्ट सिनेमा और कमर्शियल सिनेमा के बीच का ब्रिज था ऋषि दा का सिनेमा। जिस तरह से कमर्शियल सिनेमा में हीरो को दिखाया जाता है, ऋषि दा के हीरो उस तरह के थे ही नहीं। उनके हीरो के पास हर प्रोब्लम का सोल्यूशन नहीं होता था, कभी कभार तो वो खुद प्रोब्लम में फंसे हुए होते थे और हीरोइन उन्हें बचाती थी। ज़रूरी नहीं कि सामने कोई बड़ा विलेन, ग्रांड क्लामेक्स सीन हो तब ही वह फिल्म मानी जाएगी वरना नहीं। चाहे वो बावर्ची हो या खूबसूरत या चुपके-चुपके, न कोई एक्शन, ना ड्रामा, न जबर्दस्त क्लाइमैक्स सीन, न ही कोई सस्पेन्स, बस प्यारी सी आम सी कहानी।

उनका बनाया सिनेमा देखना ऐसा है जैसा फूल भरे बगीचे में टहलना। कभी पीले फूलों की क्यारी के पास से गुजरते हैं तो कभी गुलाब की क्यारी के पास उसकी खुशबू का लुत्फ उठाने वहाँ रुक जाते हैं। कोई एक हुक नहीं है जो हमें फिल्म से बांधे रखे बल्कि फिल्म का एक एक सीन इतना खूबसूरत है कि हम मिस नहीं कर सकते।

ऋषि दा हमेशा से अहेड ऑफ टाइम रहे हैं। हम आजकल वुमन ओरिएंटेड फिल्मों की बात करते हैं, उन्होंने बहुत पहले ही गुड्डी बना ली थी। उस फिल्म की हीरोइन कोई damsel इन distress नहीं थी ना ही अल्फा-वुमन। वो चुलबुली सी आम लड़की थी जिसे फिल्मी दुनिया बहुत पसंद थी। इस फिल्म के जरिये उन्होंने फिल्मी दुनिया के ग्लैमर के पीछे की सच्चाई भी बताने का प्रयास किया।

आनंद फिल्म तो कल्ट मूवी है जो गुदगुदाते हुए जीवन का सार बता देती है। जो बताती है ज़िंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए बाबूमुशाए। उनकी चुपके-चुपके मेरी favorite है, जितनी बार भी देख लें, किसी भी जमाने में देख लें, मजाल है कि वो पुरानी लगे! आर्ट मूवी की तरह कोई बहुत भारी प्लॉट के बिना और कमर्शियल मूवी की तरह ओवर द टॉप क्लाइमैक्स के बिना, ऐसी कहानी जिसमें बस रोज़मर्रा की बात हो और वो बांध कर भी रखे ऐसी फिल्म बनाना सबके वश की बात नहीं। इस तरह की फिल्म कैरिकचर की तरफ जा सकती है, या फिर generalization की तरफ। पर ऋषि का कोई भी फिल्म न कभी ओवर द टॉप हुई, न कभी कैरिकेचर। वो आम कहानी होती हुए भी खास बात कह जाती थी| साधारण चीजों में असाधारण कहानी ढूँढने की कला सिर्फ उन्ही्ं में ही थी| सरल सीधी भाषा का उपयोग कर लोगों को बांधना लच्छेदार भाषा का उपयोग करने से कहीं ज़्यादा मुश्किल होता है। बावर्ची फिल्म में एक डाइलॉग था जो ऋषि दा पर फिट और उनके सिनेमा पर फिट बैठता है,“It is so simple to be happy…but it is so difficult to be simple.”