जगदीप: संघर्ष की कोख से जन्मा कॉमेडी स्टार

जगदीप को अधिकतर फिल्मों में एक जैसे किरदार मिले
जगदीप को अधिकतर फिल्मों में एक जैसे किरदार मिले

”वो मंजिल क्या जो आसानी से तय हो
वो राही क्या जो थक कर बैठ जाए”

ये पंक्तियाँ साढ़े आठ साल के जगदीप ने अपनी माँ से सीखी थी। एक दिन जगदीप जब अपनी माँ के साथ कहीं जा रहे थे और अचानक तूफान आने कि वजह से उनकी माँ के पैर में चोट लग गयी। जगदीप चाहते थे वो रुक जाए क्योंकि उनके पैर से खून निकाल रहा था लेकिन उनकी माँ नहीं रुकीं और अपनी साड़ी का एक टुकड़ा बांध अपने बेटे से ये पंक्तियाँ कह कर उन्हें उनके जीवन में संघर्ष का मूल मंत्र दे गईं। जिसे उन्होंने कभी नहीं भुलाया और 2012 के अपने एक इंटरव्यू में अपनी माँ को याद करते हुए नम आँखों से इस बात का ज़िक्र किया।

29 मार्च 1939 में मध्यप्रदेश के दतिया जिले में जन्में सैयद इश्तियाक़ अहमद जाफ़री उर्फ़ जगदीप, विभाजन में सब तितर-बितर होने के बाद मुंबई आ गए। बहुत कम उम्र में पिता का इंतकाल हो गया और घर की सारी ज़िम्मेदारी माँ पर आ गयी। अपनी माँ को काम करता देख जाफ़री को पढ़ाई से ज़्यादा उनकी मदद करना ज़रूरी लगा और उन्होनें बचपन से ही काम करने की ठान ली। उन्होंने पतंग बनाने से ले कर साबुन बेचने का काम किया लेकिन किस्मत नें उन्हें कॉमेडी स्टार बना दिया। उनका कहना था जीवन में जो भी काम आता गया उसे करता गया।

जगदीप एक कलाकार और अभिनेता बाद में थे वो सबसे पहले एक अच्छे इंसान थे। एक अच्छे पिता थे जिन्होंने अपने बच्चों को कभी किसी काम के लिया माना नहीं किया। जगदीप जाफ़री ने फिल्मों में अपना करियर एक्टिंग या किसी शौक के नहीं की बल्कि अपने परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूर करने के लिए शुरू किया।

बाल कलाकार का किरदार उन्होंने बी आर चोपड़ा की फिल्म ‘अफसाना’ में निभाया। यह फिल्म 1951 में रिलीज हुई थी। जिसमें उन्हें 3 रुपए पर लाया गया था लेकिन एक उर्दू का डायलॉग बोल कर वो अपनी जेब में दुगनी क़ीमत यानि 6 रुपए ले कर गए थे। उनका फिल्मों का सफर यहीं से शुरू हुआ और तीन पीढ़ियों तक चला।

जगदीप ने ताउम्र अपनी अदाकारी से लोगों को हँसाया। और ऐसे हँसाया जैसे आज कोई नहीं हंसा सकता। आज हमें हंसने के लिए डबल मीनिंग कॉमेडी की ज़रूरत पड़ती है। उनका काम हमारे सामने ऐसी कॉमेडी पेश करता है जो सिर्फ़ साफ सुथरी कॉमेडी है। किसी को नीचा दिखाना या किसी का मज़ाक कर हंसाना जैसी वाहियात कॉमेडी नहीं है।

जगदीप ने 400 के करीब फिल्में की। जिसमें शोले, स्वर्ग नर्क, खिलौना, फूल और कांटे, सास भी कभी बहू थी, बॉम्बे टू गोवा जैसी फिल्में शामिल है। अपने इस यादगार और हंसी के सफर के लिए उन्हें ”लाइफ टाइम अचिवमेंट अवार्ड” (2001) भी दिया गया।

आज जगदीप हमारी बीच नहीं रहे लेकिन हम भारतीय सिनेमा के इतिहास को देखेंगे तो हमें जगदीप जाफ़री का किरदार हमेशा हंसा देगा। वरिष्ठ अभिनेता जगदीप जाफ़री का 8 जुलाई को उनका निधन हो गया। हमारी तरफ से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।