कानन देवी: बॉलीवुड की पहली अभिनेत्री, जिनकी वजह से रवींद्रनाथ टैगोर के ख़िलाफ़ हुआ पूरा समाज

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1942 में आई सुपरहिट फ़िल्म ‘जवाब’ का मशहूर गीत है. हर किसी की ज़ुबान पर गुनगुनाता था. इस गीत को गाया है मशहूर कलाकार और संगीतकार कानन देवी ने. भारतीय सिनेमा जगत में कानन देवी का नाम एक ऐसी शख्सियत के तौर पर याद किया जाता है जिन्होंने न सिर्फ फिल्म निर्माण की विद्या से बल्कि अभिनय और संगीत से भी दर्शकों के बीच अपनी खास पहचान बनाई. लोग उनकी कला को देखकर और संगीत सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं.
22 अप्रैल 1916 में कोलकाता के हावड़ा में जन्‍मी बांग्‍ला फिल्‍मों की पहली महिला स्‍टार के नाम से प्रसिद्ध कानन देवी का मूल नाम ‘कानन बाला’ है. इनके जीवन की कहानी खुद किसी फिल्‍म से कम नहीं है. अमीरी से गरीबी का सफर, जीविका के लिए काम करने की मजबूरी और शादी के लिए समाज के खिलाफ लड़ने और हारने का दर्द. कानन देवी को बहुत कष्ट सहना पड़ा, संघर्ष करना पड़ा, लेकिन उनकी शख्‍सियत इससे खत्‍म नहीं हुई बल्‍कि और अधिक निखरी.

महज दस साल की उम्र में देवी की उपाधि मिली

गरीबी, बेबसी और जिंदा रहने के लिए मां की कड़ी मेहनत के बीच वह बच्ची बड़ी हो रही थी. अभी वह बड़ी भी नहीं हो पाई थी कि जीवन का बोझ खींचने के लिए उसे मां के साथ जुटना पड़ा. छोटी-सी बच्ची इतनी लगन से काम करती थी, जैसे किसी कला की रचना कर रही हो. यह किसे पता था कि इसी नन्हीं बच्ची की उपलब्धियां इतनी व्यापक हो जाएगी कि भारतीय सिनेमा का इतिहास उसके नाम के बिना अधूरा रहेगा.

कानन के जन्म के कुछ साल बाद उसके पिता की मृत्यु हो गई. अब मां और बेटी का कोई सहारा नहीं रहा, इसलिए मां को दूसरों घरों में काम करना पड़ा. छोटी – सी बच्ची कानन भी दूसरों के घर काम करने जाने लगी. कुछ पैसे कमाकर मां-बेटी घर चला लेती थी.

कानन की मां ने अपनी बेटी के लिए अलग ही सपना देख रखा था. एक पहचान के व्यक्ति तुलसी बनर्जी जिन्हें काका बाबू कहा जाता था, उन्होंने कानन को फ़िल्म में काम करने का सुझाव दिया. कानन की मां ने भी उसे फिल्मों में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया. 1926 में ‘ज्योति’ स्टूडिओ की बांग्ला फिल्म ‘जयदेव’ से जब उन्होंने फिल्मी दुनिया में कदम रखा तब उनकी उम्र महज दस साल थी.

कानन को नायिका के रूप में चार साल बाद फिल्म ऋषिर प्रेम में पहली बार मौका मिला. 1931 में जब फिल्म रिलीज हुई तब तक फिल्मों ने बोलना सीख लिया था. ऐसे में आवाज का महत्व बहुत बढ़ गया. कानन देवी को कहीं संगीत की शिक्षा तो नहीं मिली थी लेकिन उनकी आवाज में खास तरह का आकर्षण था. या यूं कहें कि सरस्वती देवी का आशीर्वाद था. फिल्म से जुड़े कुछ लोगों ने उनकी आवाज की विशेषता के बारे में उनका ध्यान खींचा और उन्हें संगीत की शिक्षा के लिए प्रेरित किया.

उसके बाद कानन देवी की रुचि संगीत के तरफ़ बढ़ने लगा. ललक पैदा हो गई. फिर कुछ समय के लिए लखनऊ के उस्ताद अल्लारक्खा खां से संगीत की तालीम ली. बाद में उन्होंने मेगाफोन कंपनी के प्रशिक्षक भीष्म देव चटर्जी से विशिष्ट शैली के बांग्ला गीतों की शिक्षा ली. इस बीच परदे पर कानन देवी की पहचान मजबूत होती जा रही थी. उनके सौंदर्य में विशेष प्रकार की मासूमियत थी, इसी से प्रभावित हो कर उनके प्रशंसक उन्हें कानन बाला के स्थान पर कानन देवी बुलाने लगे.

शादी के ख़िलाफ़ था समाज आशीर्वाद देने पर रवींद्रनाथ टैगोर की हुई निंदा

बात है साल 1934 की. सुपरहिट फिल्म ‘मां’ परदे पर आई. बतौर अभिनेत्री कानन देवी के करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई. कुछ समय के बाद कानन देवी न्यू थियेटर में शामिल हो गई. इस बीच उनकी मुलाकात राय चंद बोराल से हुई. जिन्होंने कानन देवी को हिंदी फिल्मों में आने का प्रस्ताव दिया.

तीस और चालीस के दशक में फिल्म अभिनेता या अभिनेत्रियों को फिल्मों में अभिनय के साथ ही गायक की भूमिका भी निभानी होती थी. जिसको देखते हुए कानन देवी सटीक बैठती थी.

कानन को फ़िल्मों में अभिनय और गायन का मौक़े पर मौक़ा मिलता गया. साल 1937 में आई फ़िल्म ‘मुक्ति’ में बतौर अभिनेत्री कानन देवी सुपरहिट साबित हुई. पी.सी.बरूआ के निर्देशन में बनी इस फिल्म की जबरदस्त कामयाबी के बाद कानन देवी न्यू थियेटर की चोटी की कलाकार में शामिल हो गई.वर्ष 1941 में न्यू थियेटर छोड़ देने के बाद कानन देवी स्वतंत्र तौर पर काम करने लगी.

चालीस के दशक में फिल्मी करियर में कानन देवी सफलता के शिखर पर पहुंच चुकी थीं. साल 1940 में मशहूर शिक्षाविद् हरंबा चंद्र मैत्रा के बेटे अशोक मैत्रा से शादी कर लिया. इस शादी से आस- पड़ोस के लोग ख़ुश नहीं थे. पूरा समाज कानन देवी के खिलाफ था क्योंकि उस समय महिलाओं का फ़िल्म में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था. पूरा समाज ब्रह्म समाज के मूल्यों पर चलता था. समाज रूढ़िवादी विचारधारा में जकड़ा हुआ था.

इसके उलट इस शादी को लेकर मशहूर लेखक और कवि रवींद्रनाथ टैगोर बेहद ख़ुश थे. उन्होंने कानन देवी और अशोक को शादी का तोहफा और आशीर्वाद भी दिया. जिसके बाद ब्रह्म समाज ने टैगोर की ख़ूब आलोचना किया. बवाल रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था. जिसके चलते कानन देवी को तलाक लेना ही पड़ा. हालांकि तलाक़ के बाद भी कानन देवी ने पारिवारिक संबंध बनाए रखा.

बता दें कानन देवी ने अपने तीन दशक लंबे करियर में लगभग 60 फिल्मों में अभिनय किया. इनमें जयदेव, प्रह्ललाद, विष्णु माया, मां, हरि भक्ति, कृष्ण सुदामा, खूनी कौन, विद्यापति, साथी, स्ट्रीट भसगर, हार जीत, अभिनेत्री, परिचय, लगन कृष्ण लीला, फैसला, देवत्र, आशा फ़िल्में शामिल हैं.
कई फिल्मों में नारी के विभिन्न चरित्रों को कानन देवी ने जिस तरह से अभिनीत किया, उससे वे बांग्ला समाज में आदर्श नारी के रूप में देखी जाती थीं.

फिल्म शेष उत्तर, मनमोई गर्ल्स स्कूल, मुक्ति, परिचय, अभिनेत्री, हार-जीत जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को भुला पाना मुश्किल है. उनके निर्देशन में पहली फिल्म थी ‘अनन्या’ जो फ्लाप रही. इसके बाद कानन देवी नवविधान, देवज, आशा इंद्रवन और श्रीकांत जैसी फिल्मों के जरिए अपने प्रशंसकों के दिलों पर राज करती रहीं.

हिंदी में भी कानन देवी की मांग कम नहीं हुई. जवानी की रीत (1939), हार-जीत (1940), हॉस्पिटल (1943), बनफूल (1945), राजलक्ष्मी (1945), अरेबियन नाइट(1946), फैसला (1947), तुम और मैं (1947) जैसी फिल्मों के जरिए कानन देवी ने किसी अभिनेत्री को अपने आस पास भी नहीं पहुंचने दिया. चंद्रशेखर (1948) उनकी रोमांटिक छवि वाली अंतिम हिंदी फिल्म थी.

सिनेमा जगत में कानन के योगदान को देखते हुए 1976 में ‘दादा साहेब फाल्के पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था. इससे पहले 1968 में सरकार ने उन्हें पदमश्री से भी सम्मानित किया गया था.


आज यानी 17 जुलाई, 1992 को कानन देवी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था. उनकी पुण्यतिथि पर नमन.