जन्मदिन विशेष: आनंद बक्शी के लिखे गीतों की पूरी दुनिया दीवानी है

“चांद सी महबूबा हो मेरी कब

ऐसा मैंने सोचा था

हां तुम बिलकुल वैसी हो

जैसा मैंने सोचा था “

1965 में आई फ़िल्म ‘ हिमालय की गोद में’ का मशहूर गीत है. सत्तर के दशक के मशहूर गीतों में से एक था. इसके आवाज़ दिया है मशहूर गायक मुकेश ने. इस गीत को, करीब चार दशकों तक सिनेमा जगत पर संगीत का जादू बिखेरने वाले जादूगर, संगीतकार आनंद बक्शी ने अपनी कलम से लिखा है. वो संगीत की दुनिया में सुनहरा इतिहास बनकर दर्ज हो गए हैं. शमशाद बेगम, अलका याग्निक, मन्ना डे और कुमार सानू जैसे गायक आते- जाते रहे लेकिन शब्दों को संगीत में पिरोने वाले बख्शी हमेशा मैदान में खड़े रहे.

आनंद बक्शी ने अपने फिल्मी कॅरियर में 550 से अधिक फ़िल्मों में 4000 से अधिक गीत लिखे. उनकी खासियत थी कि इतने गीतों की रचना करने के बावजूद वह हर नए गीत में नया रंग भर देते थे.


छोटी-सी उम्र में अपने घर से भागकर, मुंबई आ गए
पाकिस्तान में एक शहर है रावलपिंडी. इसी शहर में 21 जुलाई 1930 को संगीतकार आनंद बक्शी का जन्म हुआ था. उनका मूल नाम आनंद प्रकाश था. आनंद बख्शी उपनाम था. लेकिन फ़िल्मी दुनिया में आनंद बक्शी के नाम से ही पहचान बनी.

जब वह महज दस साल के थे तभी उनकी मां का निधन हो गया. विभाजन के बाद उनका परिवार भारत चला आया. भारत में उनका परिवार लखनऊ में आकर रहने लगा,लेकिन लखनऊ में आनंद जी का मन नहीं लग रहा था. उन्हें बचपन से ही संगीत का शौक़ था. वह फिल्मी दुनिया में गायक के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते थे.

वह अपने सपने को पूरा करने के लिये घर से भागकर फिल्म नगरी मुंबई आ गए.

मुंबई पहुंच कर उन्होंने रॉयल इंडियन नेवी में कैडेट के पद पर दो वर्षों तक काम किया. बाद में एक विवाद के कारण उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी. इसके बाद 1947 से 1956 तक उन्होंने सेना में भी नौकरी की.

सेना में नौकरी करते वक़्त वो हर समय गाना लिखते थे. गीतों को गुनगुनाया करते थे. उनके दोस्त भी उन्हें प्रोत्साहित करते थे. कुछ साल सेना में नौकरी करने के बाद उन्होंने तय किया कि उनकी जिंदगी का मकसद बंदूक चलाना नहीं है. गीत लिखना और गाना है.

मुंबई में उनकी मुलाकात उस जमाने के मशहूर अभिनेता भगवान दादा से हुई. भगवान दादा की मदद से आनंद बक्शी को फ़िल्मों में पहला ब्रेक मिला. पहली गीत 1958 में आई बृज मोहन की फिल्म ‘भला आदमी’ के लिए लिखी.

पहला काम मिलने का क़िस्सा भी बड़ा दिलचस्प है. फ़िल्म ‘भला आदमी’ की शूटिंग चल रही थी. भगवान दादा इस फ़िल्म में अभिनेता थे. इस फ़िल्म का गीतकार कहीं चला गया तो वे परेशान अपने ऑफिस में बैठे थे. आनंद बख्शी भी उसी ऑफिस में बैठे थे, काम की तलाश में थे. उन्हें देखकर भगवान दादा ने उनसे पूछा कि क्या करते हो? आनंद बक्शी ने बताया कि वे गीतकार हैं और गीत लिखते हैं. इस पर उन्होंने कहा कि गीत लिखकर दिखाओ. आनंद बक्शी जल्दी से क़लम उठाई और वहीं बैठे बैठे एक नहीं चार गीत लिख दिए. भगवान दादा इन गीतों को पढ़कर काफ़ी प्रसन्न हुए और उनकी तारीफ़ किया.


चंद मिनटों में गीत लिखने के लिए मशहूर थे

बचपन से ही मजबूत इरादे वाले आनंद बक्शी को अपने सपनों को साकार करने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा. फ़िल्म ‘ बड़ा आदमी’ से उन्हें कुछ ख़ास सफलता नहीं मिली. लेकिन वो पीछे हटने वालों में से नहीं थे. पांच साल इंतज़ार के बाद 1963 में आई फ़िल्म ‘ मेहंदी लगी मेरे हाथ’ के लिए उन्होंने गीत लिखा.

यह फ़िल्म सुपरहिट हुई. संगीत भी लोगों को पसंद आया. आनंद बक्शी को लोकप्रियता मिलनी शुरू हो गई.
साल 1965 में आई फ़िल्म ‘जब जब फूल खिले ‘ सुपरहिट गई. इस फ़िल्म के गाने ‘परदेसियों से न अंखियां मिलाना’, ‘ये समां समां है ये प्यार का’, ‘एक था गुल और एक थी बुलबुल’ सुपरहिट रहे. इन सभी गीतों को आनंद बक्शी ने लिखा. गीतकार के रूप में उनकी पहचान बन गई.

इसी वर्ष फिल्म ‘हिमालय की गोद में’ उनके गीत ‘चांद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोंचा था’ को भी लोगो ने काफी पसंद किया. इस गीत के बाद वो अपने करियर के बुलंदियों को चूमने लगे.

वर्ष 1967 में प्रदर्शित सुनील दत्त और नूतन अभिनीत फिल्म “मिलन” के गाने ‘सावन का महीना पवन करे शोर’, ‘युग युग तक हम गीत मिलन के गाते रहेंगे’, ‘राम करे ऐसा हो जाये’जैसे सदाबहार गानों के जरिये वह गीतकार के रूप में बहुत ऊंचे उठ गए.

संगीतकार आनंद बक्शी के सुपरहिट गीतों में ‘कोरा काग़ज़ था मन मेरा’, ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना’, ‘गुनगुना रहे हैं भंवरे’, ‘ऐ वतन तेरे लिए’, ‘हमने सनम को ख़त लिखा’, ‘अच्छा तो हम चलते हैं’, ‘शीशा हो या दिल हो’, ‘ मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे’, ‘हम तुम्हें इतना प्यार करेंगे’, ‘परदेस जा कर परदेसिया भूल न जाना पिया’, ‘चिंगारी कोई भड़के’ शामिल हैं.

आनंद बक्शी का नाम उन गीतकारों में शुमार हैं, जिन्होंने साल दर साल एक से बढ़कर एक गीत फिल्म इंडस्ट्री को दिए. ‘फर्ज (1967)’, ‘दो रास्ते (1969)’, अमर प्रेम(1971), ‘बॉबी (1973’), ‘अमर अकबर एन्थॉनी (1977)’, ‘इक दूजे के लिए (1981)’, ‘सौदागर’ (1991), ‘कटी पतंग (1970)’, ‘दिल तो पागल है’ (1997), ‘लव स्टोरी’ (1981) फ़िल्मों के लिए अमर गीत लिखे.

जब एक ही गाने को 24 बार लिखना पड़ा

बात है 1995 की. इसी साल आदित्य चोपड़ा के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ आई. इस फ़िल्म में अभिनय शाहरूख खान और काजोल ने किया था. फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर आते ही धमाल मचा दिया. इस फ़िल्म का गाना ‘मेरे ख़्वाबों में जो आए, आ के मुझे छेड़ जाए’ सुपरहिट हुआ. लोगों की जुंबा पर चढ़ गया. इस गीत को संगीतकार आनंद बक्शी ने लिखा था.

इस गाने को लिखने में बहुत मुश्किलें आई थीं. निर्देशक आदित्य चोपड़ा की सिफ़ारिश पर आनंद बक्शी ने संगीत लिखकर दे दिया. मगर चोपड़ा को पसंद नहीं आया. उन्होंने कहा बक्शी जी थोड़ा गीत के बोल में बदलाव कर दो. आनंद बक्शी ने कर दिया.

फिर भी चोपड़ा के मन को नहीं भा रहा था. बक्शी ने फिर बदलाव किया. फिर भी गाना नहीं भाया. न चोपड़ा को गाना रास आ रहा था और न ही आनंद बक्शी हार मानने को तैयार थे. लिखने का सिलसिला बढ़ता चला गया. बक्शी ने एक-दो बार नहीं, कुल चौबीस बार इस गाने को लिखे. तब जा कर यह गाना चोपड़ा को पसंद आया और रिकॉर्डिंग हुई.

आनंद बक्शी ने सत्तर और अस्सी के दशक में फ़िल्मों के लिए एक से बढ़कर एक बेहतरीन और सदाबहार गाने लिखे. हिन्दी सिनेमा में इन्हीं के लिखे गानों से निर्देशक, गायक और अभिनेता आज इतने प्रसिद्ध हुए. इनके लिखे गाने गाकर ही किशोर कुमार सरीखे गायकों ने अपनी पहचान बनाई. इन्हीं के गीतों ने राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन जैसे स्टार को सुपरस्टार बनाया.

वो चालीस बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार के फिल्मफेयर पुरस्कार के लिए नामांकित हुए. इस सम्मान से उन्हें चार बार नवाजा भी गया.

इनमें से ‘आदमी मुसाफिर है’(अपनापन), ‘तेरे मेरे बीच में’ (एक दूजे के लिए), ‘तुझे देखा तो ये जाना सनम’ (दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे) और ‘इश्क बिना’(ताल) के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का पुरस्कार मिला