जन्मदिन विशेष: ‘जय जवान जय किसान’ से प्रेरित होकर मनोज कुमार ने बनायी थी उपकार

“है प्रीत जहां की रीत सदा

मैं गीत वहां के गाता हूं

भारत का रहने वाला हूं

भारत की बात सुनाता हूं”

1970 में आई सुपरहिट फ़िल्म ‘ पूरब और पश्चिम’ का देशभक्ति से भरा मशहूर गीत है. इसको आवाज़ दिया है महेंद्र कपूर ने. इसमें अभिनय किया है मशहूर अभिनेता, लेखक और निर्देशक मनोज कुमार ने.

हिंदी सिनेमा में जब भी देशभक्ति की बात होगी या फिर देशभक्ति से जुड़ी फ़िल्मों का नाम आएगा, हमेशा मनोज कुमार का नाम शिखर पर क़ाबिज़ नज़र आएगा.

उनकी अदाकारी ने हर किसी के दिल में अपनी खास जगह बनाई है. उन्होंने अपने फ़िल्मों के जरिए लोगों के दिलों में देशभक्ति का रंग घोल दिया है.

वो बचपन से ही फ़िल्मों के शौक़ीन थे. दीवाने थे. इस कदर दीवानगी थी कि एक फिल्म के किरदार के नाम पर ही अपना नाम मनोज कुमार रख लिया.

ये नाम बदलने का दिलचस्प क़िस्सा है. साल 1949 में अभिनेता दिलीप कुमार की फ़िल्म ‘ शबनम’ सिनेमा घर में लगी थी. मनोज कुमार अपने स्कूल के दोस्तों के साथ इस फ़िल्म को देखने गए थे. मनोज कुमार, दिलीप कुमार के किरदार से इतने प्रभावित हुए कि अपना नाम बदल लिया. मूल नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी से बदलकर मनोज कुमार रख लिया.

‘मनोज कुमार’ से ‘भारत कुमार’ बनने की कहानी

पाकिस्तान में एक शहर है एबटाबाद. इसी शहर में आज यानी 24 जुलाई 1937 को मनोज कुमार का जन्म हुआ था. भारत-पाकिस्तान विभाजन के वक़्त उनका परिवार राजस्थान के हनमुनगढ़ जिले में आकर बस गया. बाद में दिल्ली में रहने लगे. फिर अभिनेता बनने का सपना लेकर मुंबई आ गए.

मनोज कुमार को हिंदी सिनेमा में पहला ब्रेक 1957 में आई निर्देशक लेखराज भाकरी की फ़िल्म ‘फैशन’ से मिला. इस फ़िल्म में उन्नीस साल के मनोज कुमार ने नब्बे साल के बुजुर्ग का किरदार निभाया. फिल्‍म में प्रदीप कुमार और माला सिन्‍हा ने मुख्‍य भूमिका निभाई थी. वहीं मनोज कुमार भिखारी बने थे. भिखारी के रोल में देखकर उनके घरवाले और दोस्‍त भी मनोज कुमार को नहीं पहचान पाए.

मनोज कुमार को बतौर अभिनेता काम पाने के लिए तीन साल तक संघर्ष करना पड़ा. मनोज कुमार ने साल 1960 में आई फ़िल्म ‘कांच की गुड़िया’ में बतौर अभिनेता अभिनय किया. दर्शक ने उनके अभिनय की प्रशंसा किया. फ़िल्म को बहुत प्यार दिया. बस फिर क्या था, बॉलीवुड में एक नए सूरज के उगने की शुरुआत हो चुकी थी. इस फिल्म के बाद मनोज कुमार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

1962 में आई, निर्माता-निर्देशक विजय भटृ की क्लासिक फिल्म ‘हरियाली और रास्ता’ में मनोज कुमार ने अपने अभिनय से लोगों का दिल जीत लिया. मनोज और माला सिन्हा की जोड़ी को दर्शकों ने बेहद पसंद किया.

उन्होंने बॉलीवुड के अपने लंबे करियर में ज़्यादातर देशभक्ति वाली काफी फिल्में कीं. साल 1965 में आई फिल्म ‘शहीद’ उनकी पहली देशभक्ति पर आधारित फिल्म थी. यह फिल्म स्वत्रंतत्रा सेनानी भगत सिंह के जीवन पर आधारित थी. इस फ़िल्म में मनोज कुमार ने भगत सिंह का किरदार निभाया है. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई.

इसके बाद ‘पूरब और पश्चिम’, ‘रोटी कपडा और मकान’, ‘क्रांति’ सहित कई फिल्मों में वह देशभक्ति के रंग में डूबे हुए नजर आए. ‘क्रांति’ में उन्हें अपने आदर्श दिलीप कुमार के साथ काम करने का मौका मिला. इन्हीं फ़िल्मों के बाद से मनोज कुमार को ‘ भारत कुमार’ के नाम से जाना जाने लगा.

प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कहने पर मनोज कुमार ने फ़िल्म ‘उपकार’ बनाई

साल था 1965. भारत- पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ. भारत ने जीत हासिल किया. उस वक़्त भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे. उन्होंने युद्ध में किसान और जवान की महत्वपूर्ण भूमिका देखते हुए ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया.

इसी साल मनोज कुमार की फ़िल्म ‘शहीद’ आई थी. लाल बहादुर शास्त्री जी को फ़िल्म और मनोज कुमार का अभिनय बेहद पसंद आया. उन्होंने मनोज को मुलाक़ात के लिए दिल्ली बुलाया. इस मुलाक़ात में उन्होंने मनोज कुमार से किसानों और जवानों पर फ़िल्म बनाने का सुझाव दिया.

शास्त्री जी के सुझाव से मनोज इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने दिल्ली से मुंबई लौटते वक्त ही फिल्म की कहानी तैयार कर ली.

इसके बाद 1967 में मनोज कुमार ने शास्त्री जी के दिए सुझाव पर फिल्म ‘उपकार’ बनाई.
इस फ़िल्म में मनोज ने किसान की भूमिका के साथ ही जवान की भूमिका में भी दिखाई दिए. फ़िल्म सुपरहिट हुई. अभिनय की तारीफ़ हुई.

एक कलाकार के अहसान तले ज़िंदगी भर दबे रहे

बात है 1972 की, मनोज कुमार की फ़िल्म ‘शोर’ की शूटिंग चल रही थी. इस फ़िल्म में अभिनेत्री के रूप में जया भादुड़ी को लिया गया था. इस फ़िल्म में एक छोटा-सा किरदार निभाना था. किरदार में फ़िल्म शुरू होने के कुछ देर बाद ही मौत होनी थी. इस रोल के लिए कोई भी अभिनेत्री तैयार नहीं थी.

मनोज को परेशान देख अभिनेत्री नंदा ने मदद की. उन्होंने उस किरदार को निभाने के लिए हामी भरी. उन्होंने ना केवल इस किरदार के लिए हामी भरी बल्कि मनोज कुमार के सामने एक शर्त भी रखी कि वह इस किरदार के लिए एक पैसा भी नहीं लेंगी. इस तरह मनोज कुमार अभिनेत्री नंदा के अहसान तले ज़िंदगी भर के लिए दब गए.

देशभक्ति के साथ ही रोमांस में भी रहे हिट

मनोज कुमारी सत्तर के दशक में अपने फ़िल्मी करियर के बुलंदियों पर थे. उन्होंने ने देशभक्ति के साथ-साथ रोमांटिक और सामाजिक सरोकार की फ़िल्में भी की थीं.

उनके रोमांटिक फ़िल्मों में ‘हरियाली और रास्ता’, ‘दो बदन’, ‘हनीमून’, ‘अपना बना के देखो’, ‘नकली नवाब’, ‘पत्थर के सनम’, ‘साजन’, ‘सावन की घटा’ शामिल हैं.

इनके अलावा सामाजिक सरोकार से जुड़ी फ़िल्मों में ‘अपने हुए पराये’, ‘पहचान’ ‘आदमी’, ‘शादी’, ‘गृहस्थी’ और ‘गुमनाम’, ‘वो कौन थी?’ फ़िल्में शामिल हैं.

मनोज कुमार पर फिल्माए गए कई गाने आज भी लोकप्रिय हैं. इनमें ‘नसीब में जिसके जो लिखा था’, ‘चांद-सी महबूबा हो मेरी’, ‘पत्थर के सनम’, ‘गोरे गोरे चांद-से मुख पे’, ‘दीवानों से ये मत पूछो’, ‘इकतारा बोले’, ‘इक प्यार का नगमा है’, ‘जिंदगी की न टूटे लड़ी’ शामिल हैं.

मनोज कुमार को फिल्मों में उनके बेहतरीन अभिनय के लिए 2016 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इससे पहले 1992 में पद्मश्री और सात फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है.