मुबारक बेगम : कभी तन्हाइओं में हमारी याद आएगी

 

“कभी तन्हाइयों में

हमारी याद आएगी

अंधेरे छा रहे होंगे

के बिजली कौंध जाएगी”

1961 में आई फ़िल्म ‘हमारी याद आएगी’ का मशहूर गीत है. इसे गाया है 50-60 के दशक में अपनी सुरमयी आवाज़ से लोगों का दिल जीतने वाली मुबारक बेगम ने.

मुबारक बेगम का जन्‍म राजस्थान के चुरु जिले के सुजानगढ़ क़स्बे में हुआ था. बचपन से ही संगीत की शौक़ीन थीं. बेगम को 1950 से 70 के दशक में हिंदी फिल्मों के लिए गाए सदाबहार गीतों और गजलों के लिए जाना जाता है. मुबारक ने अपने करियर में 115 फिल्मों में 175 गाने गाए.
गाने का मौक़ा मिला तो आवाज़ नहीं निकली
मुबारक बेगम का जीवन अनेक विचित्रताओं और विडंबनाओं से भरा था. उनका बचपन और अंतिम वक्त काफी बदहाली में गुजरा. जन्म के कुछ साल बाद ही उनके पिता पूरा परिवार लेकर गुजरात के अहमदाबाद रहने चले गए. बाद में मुंबई. इसी शहर में मुबारक बेगम पली-बढ़ी.

मुबारक बेगम को गाने का शौक बचपन से था. गरीबी परिवार में जन्मी बेगम को स्कूली शिक्षा भी नहीं मिल सका. अनपढ़ और निरक्षर होते हुए भी वह पार्श्वगायन के क्षेत्र में बुलंदी तक पहुंचीं. संगीत की प्रारंभिक तालीम किराना घराने के उस्तादों से सीखीं. गायन की विशिष्ट शैली के कारण उन्हें ऑल इण्डिया रेडियो में भी बुलाया जाने लगा.

धीरे-धीरे जान पहचान बढ़ने लगी. फिर पहली बार संगीतकार रफीक गजनवी ने अपनी फिल्म में गाने का अवसर दिया. इस मौक़े पर देख बेगम बहुत ख़ुश हुईं. अगले दिन सुबह गीत गाने के लिए स्टुडिओ पहुंची. वहां बड़ी तादाद में कलाकार मौजूद थे. भीड़भाड़ देखकर वह घबरा गईं. कैसे तो हिम्मत जटाकर स्टूडियो में गईं. लेकिन घबराहट से उनके मुंह से आवाज़ ही नहीं निकली. बिना गाए घर लौटी आईं.

इस प्रसंग के कुछ दिनों बाद राम दरयानी ने उन्हें अपनी फिल्म में गाने का अवसर दिया. इस बार भी वे ‘फ्लॉप’ रहीं.

दो अवसर चूकने के बाद तीसरा अवसर फिल्म अभिनेता याकूब ने दिया. फिल्म में उन्होंने गाया ‘मोहे आने लगी अंगड़ाई.’ साल 1949 में फ़िल्म ‘आइए’ प्रदर्शित हुई और फिर ‘अंगड़ाई’ के साथ मुबारक बेगम ने ऊंचाई तक पहुंचने वाली सीढ़ियों पर कदम रखा. उस साल का सबसे सुपरहिट गाना था. इसके बाद 1951 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘फूलों का हार’ में भी गीत गाए.

इसके बाद मुबारक बेगम को गाने के लगातार मौक़े मिलने गले. ‘फूलों का हार’, ‘कुंदन’, ‘दायरा’, ‘शबाब’, ‘मां के आंसू’, ‘औलाद’, ‘शीशा’, ‘मधुमती’, ‘देवदास’, ‘रिश्ता’ जैसे कई फ़िल्मों के ज़रिये मुबारक की आवाज़ ने अपना जादू बिखेरा.

मुबारक बेगम का एक क़िस्सा है. बहुत ही रुचिकर है. सत्तर का दशक था. बेगम संगीत की दुनिया में बुलंदियों पर थीं. बप्पी लाहिड़ी बेगम को गाने के लिया बुलाते हैं. मुबारक बेगम के हाथ में गाने के बोल लिखा काग़ज़ पकड़ा देते हैं. बेगम मुस्कुराते हुए बप्पी की तरफ़ देखती हैं. कहती हैं मुझे पढ़ना तो आता ही नहीं है. बप्पी पूछे बिना पढ़े कैसे गीत गा लेती हो? फिर बेगम मुस्कुराईं. और कहा

“ मैं अपने दिल से याद करके गाती हूं.”

इसके बाद ज़िंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए.1961 में ‘हमारी याद आएगी’ फिल्म के गीत ‘कभी तन्हाइयों में यूं हमारी याद आएगी’ ने उन्हें शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया. 1980 में बनी फ़िल्म ‘राम तो दीवाना है’ का गीत ‘आओ तुझे मैं प्यार करूं’ और ‘सांवरिया तेरी याद’ उनका अंतिम गीत था.
‘परदेसियों से न अंखियां मिलाना’ गीत को लेकर हुआ था विवाद

बात है 1965 की. सूरज प्रकाश के निर्देशन में बनी फ़िल्म  ‘जब जब फूल खिले’ परदे पर आई. इस फ़िल्म का एक गीत ‘ परदेसियों से न अंखियां मिलाना ‘ सुपरहिट हुआ. अगले ही दिन इस गीत को लेकर बवाल हो गया.

मुबारक बेगम ने दावा किया कि फिल्म ‘जब जब फूल खिले’ का गाना ‘परदेसियों से ना अंखियां मिलाना’ उनकी आवाज में रिकॉर्ड किया गया. लेकिन जब फिल्म का रिकॉर्ड बाजार में आया तो गीत में उनकी आवाज की जगह लता मंगेशकर की आवाज थी.

उन्होंने इस बात पर काफी हाय-तौबा मचायी थी लेकिन उससे उनको नुकसान ही हुआ क्योंकि उसके बाद से उन्हें फिल्मों में काम मिलना काफी कम हो गया.
आख़िरी दौर की तंगहाली ज़िंदगी

मुबारक बेगम ने जब संगीत की दुनिया में क़दम रखा था, हिंदी संगीत का ` स्वर्ण ‘ काल माना जाता है. मुबारक बेगम भी कई प्रतिभाशाली गायिकाओं की तरह लता मंगेशकर और आशा भोंसले की जोड़ी के तले पनप नहीं थीं. उन्हें कुछ अच्छे गाने तो मिले लेकिन लता जैसा स्टारडम उन्हें कभी हासिल नहीं हो सका.

आगे चलकर काम भी मिलना कम हो गया. कुछ सालों में बेगम फ़िल्मी जगत से पूरी तरह ग़ायब हो गईं. ज़िंदगी के आख़िरी समय मुंबई के जोगेश्वरी में एक बेडरूम के घर में गुज़ारीं. सरकार से उन्हें शिकायत थी, जो उस समय महज 700 रुपये पेंशन देती थी. बेटा जैसे-तैसे टैक्सी चलाकर गुजारा कर रहा था. बीमार बेटी पर हर महीने 5 से 6 हजार महीने खर्च करने पड़ते थे.

बॉलीवुड के साथ इतने साल गुजारने वाली मुबारक को वहां से भी कोई आसरा नहीं मिला. गुमनामी के अंधेरों में खोती चली गईं.

एक कहावत है उगते सूरज को हर कोई सलाम करता है, डूबते से हर कोई बचकर निकलता है.

बीमारी के चलते आज यानी 18 जलाई 2016, को मुबारक बेगम ने दुनिया को अलविदा कह दिया. पुण्यतिथि पर उनको नमन.