निशिकांत कामत (1970-2020): फ़िल्म इंडस्ट्री मेरा जीवन नहीं है, मेरे जीवन का एक हिस्सा है

निशिकांत कामत महज 50 साल की उम्र में हमारे बीच से चले गये। अपनी पहली डायरेक्टरोलियल फ़िल्म डोम्बीवली फास्ट के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ मराठी फ़िल्म का राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला था।

Nishikant Kamat film director filmbibo
निशिकांत कामत की पहली हिन्दी फ़िल्म 'मुंबई मेरी जान' (2008) थी।

फ़िल्म निर्देशक निशिकांत कामत का 17 अगस्त को निधन हो गया। 17 जून 1970 को मुंबई में जन्मे कामत को भारतीय सिनेमा के सबसे काबिल निर्देशकों में शुमार किया जाता है। करीब बीस सालों के अपने बॉलीवुड करियर में कामत ने कुल आठ फ़िल्मों का निर्देशन किया। इनमें दो मराठी, पाँच हिन्दी और एक तमिल फ़िल्म है। उनकी मराठी फ़िल्म डोम्बीवली फास्ट को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और हिन्दी फिल्म ‘मुंबई मेरी जान’ को फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। इसे विडंबना ही कह सकते हैं कि बेहद काबिल माने जाने के बावजूद निशिकांत कामत की फ़िल्मोग्राफ़ी बहुत छोटी दिखती है। फ़िल्मबीबो ने कामत के निधन के बाद उनके पुराने वीडियो और प्रिंट इंटरव्यू के सहारे उनकी शख्सियत और कामकाज के बारे में जानने की कोशिश की। खुद कामत के लफ़्ज़ों में उनकी कहानी सुनने से पहले पढ़िए एक्टर इरफ़ान ख़ान ने मदारी फ़िल्म रिलीज होते समय कामत के बारे में क्या कहा था-

निशिकांत कामत पर इरफ़ान ख़ान

एक्टिंग तो इनकी बहुत अच्छी है। मराठी एक्टर के कमाल के हैं। थिएटर इनके कल्चर में हैं। मैं बहुत ज़्यादा इनकी एक्टिंग की तारीफ़ नहीं करना चाहता क्योंकि मैं नहीं चाहता कि हम एक अच्छा डायरेक्टर लूज़ कर दें। डायरेक्टर के तौर पर हमने हमेशा इन के साथ एंजॉय किया है।

निशिकांत कामत की कहानी उन्हीं की ज़बानी

मैं महाराष्ट्र का हूँ। मुंबई में पला बढ़ा हूँ। साधारण मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि है मेरी। मेरी पिता प्राइवेट कॉलेज में गणित पढ़ाते थे और मेरी माता संस्कृत टीचर थीं। मुझे पता नहीं था कि मुझे जीवन में क्या करना है इसलिए दोस्तों के साथ-साथ मैंने भी होटल मैनेजमेंट का फॉर्म भर दिया। टेस्ट में मेरा हो गया और गोवा से मैंने मैनेजमेंट किया।

गोवा में ही मेरी थिएटर में रुचि पैदा हुई। मैं अपने कॉलेज का कल्चरल सेक्रेटरी था।मुंबई लौटने पर मैंने एक साधारण फ़िल्ममेकर को असिस्ट किया। फिर तीन साल मैंने फिल्म एडिटर के तौर पर काम किया। फिर सात साल टीवी डायरेक्टर के तौर पर काम किया। फिर चार सालों तक लेखक के तौर पर काम किया। इन सबके बाद साल 2005 में मैंने अपनी पहली फ़िल्म ‘डोम्बीवली फास्ट’ बनायी।

मेरी माँ चाहती थीं कि मैं फ़िल्ममेकर बनूँ लेकिन मेरी उनके 2003 में निधन के बाद मेरी पहली फ़िल्म आयी।

निशिकांत कामत का संघर्ष और अभिमान

फ़िल्म इंडस्ट्री मेरा जीवन नहीं है, मेरे जीवन का एक हिस्सा है।

साल 1999 से 2001 के बीच मेरे पास कोई काम नहीं था। कहीं से मुझे पैसे नहीं मिलते थे। मैं रोज़ सुबह 10 बजे घर से निकल जाता था और रात को 10 बजे घर से आता था। मैं रोज़ रुइया कॉलेज चला जाता था। मेरे दोस्तों ने मेरा खर्च चलाया।

मुझे अपनी ईमानदारी पर अभिमान है। मैंने जिस दिन सिगरेट पीना शुरू किया उसी दिन अपने पिता को इसके बारे में बता दिया था। मुझे बेईमान लोग नहीं पसंद आते, न उनके संग काम करना पसंद करता हूँ। मैं ग़लतियाँ स्वीकार कर सकता हूँ लेकिन मुझे झूठ बोलने वाले नहीं पसंद हैं।

मुझे अपना ग़ुस्सा सख्त नापसंद है। हालाँकि मुझे साल-दो साल में एकाध बार ग़ुस्सा आता है लेकिन किसी भी हाल में क्रोधित होने को मैं कमज़ोरी मानता हूँ।

अमिताभ बच्चन के फ़ैन निशिकांत कामत

मैं अमिताभ बच्चन को देखते हुए बड़ा हुआ हूँ। वो एकमात्र एक्टर हैं जिन्हें आज भी देखता हूँ तो फ्रीज हो जाता हूँ। वो हमारे बचपन से हमारे आइकन हैं जिनके साथ काम करने की मेरी दिली इच्छा है लेकिन उसके लिए मेरे पास सही स्क्रिप्ट होनी चाहिए और उन्हें मेरा चेहरा पसन्द आना चाहिए।

सलमान ख़ान और शाहरुख़ खान के संग काम करने पर निशिकांत कामत

सीनियर एक्टर के तौर पर मैं उनकी इज्जत करता हूँ और उनके लायक कोई स्क्रिप्ट हुई तो उनके संग जरूर काम करना चाहूँगा।लेकिन वो स्टार हैं इसलिए उनके संग फिल्म नहीं करना चाहता।

मैं अपने आधे से ज़्यादा प्रोड्यूसरों को अपनी स्क्रिप्ट पढ़ने ही नहीं देता। मैं उन्हें स्क्रिप्ट में कोई चेंज नहीं करने देता। मेरा लॉजिक है कि (आपको यह करना है तो) मुझे हायर ही क्यों कर रहे हो।

बॉक्स ऑफिस पर बड़े स्टार के कब्जे पर निशिकांत कामत

साल में 52 हफ्ते ही होते हैं तो कभीकभी क्लैश हो जाता है लेकिन कोई किसी का बिजनेस नहीं खाना चाहता।ऑडिएंस का एक स्पेडिंग बज़ट है। मिडिल क्लास का एक बज़ट होता है। अगर महीने में दो से ज्यादा बड़ी फिल्में आ जाएं तो मिडिल क्लास के मंथली बज़ट से ज्यादा हो जाता है। खर्च से ज्यादा होने की वजह से कई बार बहुत से दर्शक नहीं मिलते।कई बार कई हफ्तों तक बड़ी फिल्में बैक टू बैक आती रहती हैं।

मेरे ख्याल से ज्यादा से ज्यादा सिंगल स्क्रीन थिएटर होने चाहिए और टिकट का दाम इतना कम होना चाहिए कि मिडिल क्लास का निचला वर्ग भी इसे देख सके। आज टिकट का रेट कम से कम 50-100 रुपये है। अगर हमारे पास 1200-1500 सीट वाले सिंगल स्क्रीन हों जिनमें 30 रुपये टिकट हो तो पूरा शहर देखने जाएगा और टीवी पर नहीं देखेगा। लेकिन ये मेरा हाथ में नहीं है। मेरा काम तो फिल्म बनाना है।

(times of india, spotboye, bollywood now इत्यादि को दिए निशिकांत कामत के इंटरव्यू पर आधारित।)