स्मृतिशेष राहत इंदौरीः अल्लाह ने फरिश्तों को शायरी का हुनर अता नहीं किया

कौन जानता था जिस महामारी के लिए राहत इंदौरी का मिसरा काम आया, एक दिन वही महामारी उन्हें अपने साथ ले जाएगी। दुनिया की तरफ जाने की मनाही करते रहे, और दुनिया को छोड़कर चले गए।

नहीं रहे राहत इंदौरी
नहीं रहे राहत इंदौरी

हर एक हर्फ़ से चिंगारियां निकलती हैं,
कलेजा चाहिए अख़बार देखने के लिए

ये अख़बारनवीसी भी क्या पेशा है कि आप दो पल ठहरकर फ़र्सत से रो भी नहीं सकते। रोने के लिए वक़्त चाहिये, और इस पेशे के पेशेवरों के पास वक़्त की कमी है।

मेरे पास भी यही कमी थी, इसलिए मैं तुम्हें ख़बर की तरह देखता रहा, ख़बर लिखी भी गई, लेकिन सच कहूं तो मेरे पास वो कलेजा नहीं जिसके साथ मैं सुबह का ये अख़बार देख सकूं।

सुबह का अख़बार आज चिंगारी लिए हुए दहक नहीं रहा होगा, उसका हर हर्फ़ नम होगा, पन्ने सीले होंगे तुम्हारे चाहने वालों के आंसुओं से।

जब तुम्हारे अलविदा की ख़बर मिली तो वक़्त नहीं था कि मैं कुछ लिख पाता, और लिख भी देता तो क्या, आख़िर दिल सम्हले भी तो कुछ लिखने के लिए।

ऐसा लगा ही नहीं कि तुम चले गए, कैसे लिख देता किसी की तरह कि राहत बड़ा शायर था। सवाल ही नहीं उठता। राहत तो हमेशा बड़ा शायर रहेगा। हर कोई तुम्हारे शेर गुनगुना रहा है। हर कोई सोशल मीडिया पर तुम्हें ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश कर रहा है। मैं कहां से शुरू करूं समझ नहीं पा रहा हूं।

क्या मुशायरों के मंचों का शायर, या फ़िल्मों का गीतकार, या अदब का एक नाम जिसके अशआर न जाने कितने दर्शन समेटे हुए हैं।

मेरी बातें जब तक तुम्हारे चाहने वालों के बीच पहुंचेंगी, तब तक तुम कहीं आसमान से इस ज़मीन को निहार रहे होंगे और मैं नींद की आगोश में होऊंगा। तब जब सब कुछ पुराना हो चुका होगा, तुम्हारा सफ़र, तुम्हारी यादें, तुमसे जुड़े किस्से।

दुनिया इस अंतरजाल पर न जाने कितनी साइटों पर ढूंढ-ढूंढकर तुम्हारे कलाम पढ़ चुकी होगी। लेकिन फिर भी मैं तुम्हें याद करूंगा, अगल नज़र से, अलहदा क़िस्म से, मुख़्तलिफ़ अंदाज़ से, क्योंकि तुम वहां हो जहां कोई नहीं।

तो जनाब आइए, मैं शुरू करता हूं उस शख़्स का सफ़र जिसके पिटारे में न जाने क्या-क्या था। मायूसी थी, महब्बत थी, ख़लिश थी, एक टूटा दिल था, चंद यादें थीं, एक मय थी, इश़्क की कुछ कतरनें थीं, चाहने वालों का प्यार था, न चाहने वालों की नफ़रतें थीं, कुछ अशआर थे और एक दिल था, जो रुक चुका था।

सफ़र भी क्या अजीब सफ़र था, पेट के लिए रंगों की कूची उठा ली, जिसकी ज़िंदगी बेरंग थी, वो रंग भर रहा था, कभी दीवारों पर, कभी साइन बोर्ड में।

इंदौर के न जाने कितने साइनबोर्ड आज भी तुम्हारी कूची के भरे रंगों से सजे हुए हैं। लेकिन उन रंगों से तुम्हें क्या मिला। मतलब कुछ भी नहीं मिला। हर रंग तो था तुम्हारे ही पास। लेकिन भूख नहीं मिट रही थी।

इस बार कूची की जगह क़लम उठा ली और शुरू किया रंगों की जगह लफ़्ज़ों के सहारे ज़िंदगी को रंगना।

कौन जानता था तुमसे पहले कि सीधे शेर अंदाज-ए-बयां अलहदा करके कैसे पढ़े जाते हैं, तुम जानते थे। कलाकार जो थे, जानते थे रंगों को रंगों में मिलाकर शेड बनाना। जानते थे, लफ़्जों को लफ़्ज़ों में पिरोकर नया रंग बनाना। कहां से शुरू करूं समझ नहीं आता।

लेकिन, चलो जब शुरू करना ही है तो यहां से शुरू करता हूं जहां से तुम लोगों से अलहदा होते हो। जो शायरी में शायरों को ही आईना दिखा रहा था, उस शख़्स का नाम ‘राहत’ हो रहा था।

जब राहत मंच पर उतरते हैं तो वो इधर-उधर से लफ़्ज़ जोड़ने वाले शायरों को हक़ीक़त से वाबस्ता करा रहे थे –

हमने दो सौ साल से घर में तोते पाल के रक्खे हैं
मीर तक़ी के शे’र सुनाना कौन बड़ी फ़नकारी है

इस शेर से ही तुम्हारा मिज़ाज़ दुनिया को समझ आ गया था। अब जब दुनिया को मिज़ाज़ समझाने के लिए ये शेर लिख ही दिया है तो मैं तुम्हें आराम करने का वक़्त दिये देता हूं। अब इस दुनिया से ही मुख़ातिब हो लेता हूं।

यूं भी तुम्हारी याद में रात के आखिरी पहर में लिख रहा हूं। ये वही पहर है जब तुम मंच पर होते थे और तुम्हें सुनने के लिए सामईन इस पहर तक रुके रहते थे। फिर मंच पर लड़खड़ाए कदमों से आकर तुम अंदाज़ के साथ हाथ हिलाकर दुनिया को अपना दीवाना बना देते थे।

आह, फिर भूल गया, तुम आराम करो, मैं अब दुनिया से बात कर रहा हूं, तुम्हारे बारे में। तो जनाब ये शख़्स है राहत इंदौरी।

मेरी इनकी पहली मुलाक़ात जब हुई तब मैं कोई 18 बरस का था। बीए के दूसरे साल में मेरा दाखिला हुआ था। अपनी आदतों की वजह से मैं खबर की दुनिया में कदम रख चुका था। 2009 दिसंबर, हां मुझे ठीक याद है। मुरादाबाद के नगर आयुक्त लालजी राय ने मुशायरा कराया था।

मैं सिर्फ राहत साहब को सुनने गया था। मुशायरा खत्म होते हुए मैंने उनसे बातचीत की। उन्होंने कार्ड निकालकर दिया। काला विजिटिंग कार्ड, जिस पर सुनहरे अक्षरों में छपा थाः डाॅ. राहत इंदौरी। मैं उसी वक़्त समझ गया था, ये अक्षर सुनहरी सियाही से नहीं छपे हैं, ये उस प्यार से छपे है जो लोगों के दिलों में उनके लिए था।

राहत इंदौरी मुक़ामी मुशायरों का हिस्सा कभी नहीं रहे। उन्होंने कोई बड़ा मुशायरा नहीं पढ़ा। लेकिन हां, उन्होंने जिस मुशायरे में भी पढ़ा, उसका एक मुक़ाम हुआ। उन्होंने जिस मुशायरे में पढ़ा, वो बड़ा मुशायरा हुआ। आप उनके कौन से कलाम को कमतर करके आंक सकते हैं। हर कलाम एक से बेहतर एक।

पिछले कुछ सालों में उनको एक विशेष तबके का शायर माना जाने लगा। दरअसल, मंचों की ज़रूरत ने या सामईनों के गिरते मयार ने उनको हल्की शायरी मंच पर लाने के लिए मजबूर किया।

नहीं तो उस शख़्स के पास इतने कलाम हैं कि आप उनमें से सबसे बेहतर छांटने में उलझते जाएंगे, लेकिन बेहतर का पैमाना तय नहीं कर पाएंगे।

सितारो आओ मेरी राह में बिखर जाओ,
ये मेरा हुक़्म है, हालांकि कुछ नहीं हूं मैं

या फिर

हम फक़ीरों के लिए तो सारी दुनिया एक है
हम जहां जाएंगे अपना घर उठा ले जाएंगे

या फिर,

दोस्ती जब किसी से की जाये
दुश्मनों की भी राय ली जाये
—-
समन्दरों में मुआफिक हवा चलाता है
जहाज़ खुद नहीं चलते ख़ुदा चलाता है

हम अपने बूढे चिरागों पे खूब इतराए
और उसको भूल गए जो हवा चलाता है
—–
वो मेरी पीठ में खंज़र उतार सकता है
के जंग में तो सभी कुछ मुआफ है, जानी

सर पर बोझ अँधियारों का है मौला खैर
और सफ़र कोहसारों का है मौला खैर

दुशमन से तो टक्कर ली है सौ-सौ बार
सामना अबके यारों का है मौला खैर

तहज़ीब में बांधकर रखते हुए भी मर्दाना बांकपन को कह देने का हुनर समेटे ये शे’र –

अब अपने बीच मरासिम नहीं अदावत है
मगर ये बात हमारे ही दरमियान रहे

अबके बारिश में नहाने का मज़ा आएगा
बेलिबासी की तरह घर की खुली छत होगी।

और कितने शे’र कहे जाएं जो अदबी हल्कों में तो मशहूर हुए, लेकिन मंच से सुनाने का उन्हें मौका ही नहीं मिला, जैसे –

सारी बस्ती क़दमों में है, ये भी इक फ़नकारी है
वरना बदन को छोड़ के अपना जो कुछ है सरकारी है

कालेज के सब लड़के चुप हैं काग़ज़ की इक नाव लिये
चारों तरफ़ दरिया की सूरत फैली हुई बेकारी है

फूलों की ख़ुश्बू लूटी है, तितली के पर नोचे हैं
ये रहजन का काम नहीं है, रहबर की मक़्क़ारी है

2013 में चंदौसी के गणेश मेले में मैं उनके मुशायरे के संयोजन की टीम का हिस्सा था। वसीम बरेलवी को सदारत करनी थी। बीच मुशायरे में उनकी तबीयत कुछ भारी हुई और वसीम साहब ने इच्छा ज़ाहिर की कि मुझे जल्दी जाना है। राहत बाद में पढ़ दें, मैं कुछ शेर सुनाकर निकलूंगा। राहत तैयार नहीं थे। और भी कई शायर बच रहे थे।

इत्तेफ़ाक से मुझे उसमें कलाम भी पढ़ना है, पता नहीं था। मंसूर उस्मानी जी निज़ामत कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वसीम साहब को जाना है, उनके जाने से पहले मैं अपने शहर के एक शायर को सुनवाना चाहता हूँ।

मैंने बहुत मुख़्तसर से कलाम के साथ खुद को रखा। राहत साहब के साथ वो मेरा पहला मंच हुआ। मुशायरा खत्म हुआ और उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया, गहरा कह रहे हो, बस ज़मीन और भारी रखो।

इसके बाद बदायूं महोत्सव में उनके साथ मंच पर बैठने का मौका मिला। फिर अख़बार की दुनिया ने ऐसा जकड़ा कि मंच छूटते गए। लेकिन जब भी मौका मिला, मैंने उनके साक्षात्कार किए, वक़्त मिला तो फोन से ही उनका हालचाल लिया।

उनकी अच्छी और बुरी चीज़ों से वाकिफ़ हूं, लेकिन जाने के बाद बुरा क्या रह जाता है।

और यूं भी अगर उनमें बुराई न होती तो वो इंसान कहां रह जाते, फरिश्ता हो जाते। और अल्लाह ने फरिश्तों को शायरी का हुनर अता नहीं किया।

वो बुरे थे, इसलिए शायद बड़े शेर कह पाए। हर बड़ा शायर थोड़ा बुरा होता हैं, या यूं कहें कि शोहरत आपकी अच्छाइयों से ज्यादा बुराइयों को दुनिया के सामने रख देती हैं। लेकिन उनकी अच्छाईयां देखने के लिए उनकी रुख़सती के बाद उनके चाहने वालों की नम आंखे देखिए।

2018 में जब मैंने उनकी मौजूदगी में अमर उजाला के मंच से शायरी पढ़ी तो उनकी दाद मुझे सुकून दे रही थी। मुशायरा खत्म हुआ और सब होटल की ओर निकले। मैं उन्हें छोड़ने गया। सुबह उन्हें दिल्ली निकलना था।

अगस्त का महीना था, 25 अगस्त। रात आधी हो चली थी, मैं उनके साथ कमरे में बैठा बात कर रहा था, साथ में उनके साहिबज़ादे भी थे। सुबह पांच बजे उन्हें निकलना था। साहिबज़ादे सो चुके थे। वो मुझ अकेले शख़्स के साथ खुद को साझा कर रहे थे। बोले – आज तुमने बहुत अच्छा पढ़ा। बस शायरी को गिरने मत देना। लफ़्ज़ो का ज़खीरा है तुम्हारे पास, बस उन्हें पलकों पर रखना तो लोगों के दिलों में रहोगे। शायद इस बहाने से उन्होंने अपना वो राज़ मुझे बता दिया था, जिसके सहारे वो लोगों के दिलों में हैं।

आपसे उनकी बात करते हुए मैं उनके कलाम पर ज्यादा कुछ नहीं बोल सका। न उनके ढेर से कलाम यहां पेश करना चाहता हूं।

उसके लिए अंतरजाल पर उनकी ग़ज़लें तमाम मिल जाएंगी। लेकिन उनमें आपकी ज़हनी सुकून की दवा होगी। राहत ज़हन के सुकून को जबां देने से पहले दिल को दर्द देने का हुनर रखते थे।

मैंने उन्हें आपके सामने लाने के लिए कहीं अदब और आदाब की रवायतों को तोड़ा है। जरूरी भी था। अगर ये न करता तो न तो मैं उनींदी आंखों में उनकी याद की तस्वीरें लिए इतना कुछ लिख पाता और न आप इस कशिश के साथ उन्हें पढ़ने की इच्छा रखते।

राहत को राहत की तरह समझने के लिए वही सब चाहिए जो उनके पास था।

सब कुछ अधूरा, लेकिन सब कुछ पूरा, इश़्क, नफ़रत, दोस्ती, महब्बत बस कुछ। हमारे हर पड़ाव के लिए राहत के पिटारे से कुछ निकल आता हैं। तलाश हमें करनी है।

अब राहत तो नहीं, लेकिन उनके अशआर हैं। हमेशा रहेंगे।

कौन जानता था जिस महामारी के लिए उनका मिसरा काम आया, एक दिन वही महामारी उन्हें अपने साथ ले जाएगी। दुनिया की तरफ जाने की मनाही करते रहे, और दुनिया को छोड़कर चले गए।

राहत दुनिया को मैं तुमसे रू-ब-रू करा रहा था। उस राहत से जो मंच का कलंदर नहीं था, जो अदब का ख़िदमतगार था। जिसकी शायरी आने वाले वक़्त में मानक तय करेगी, जिसके कलाम उस हद को बनाएंगे जिससे हल्की शायरी को सामईन नकारेंगे।

लेकिन आने वाली जमात के शायर इसे कहां समझेंगे, इसे समझने के लिए उन्हें राहत होना होगा। और राहत तो कोई दूसरा है ही नहीं….काश मैं इन शेरों को उलट के पढ़ सकता और ये सच हो जाते….. लेकिन ऐसा मुमकिन नहीं….

सुला चुकी थी ये दुनिया थपक थपक के मुझे
जगा दिया तेरी पाज़ेब ने खनक के मुझे

कोई बताये के मैं इसका क्या इलाज करूँ
परेशां करता है ये दिल धड़क धड़क के मुझे

(लेखक अमर उजाला में उप संपादक हैं।)