सिर्फ खलनायक ही नहीं , ज़िंदादिल इंसान भी थे ‘प्राण’

हिंदी सिनेमा के खलनायक प्राण सिर्फ़ अभिनेता ही नहीं बल्कि अपनी असल ज़िन्दगी में ज़िंदादिल इंसान भी थे। प्राण ने अपने पेशे को परिवार से छुपाया था,उनका परिवार उनके अभिनय को लेकर कभी खुश नहीं था।

प्राण की पढ़ाई में रुचि कभी नहीं थी इसी कारण उन्होंने फोटोग्राफर बनने का सोचा और एक स्टूडियो में नौकरी भी की  थी। सन् 1945 में प्राण ने शुक्ला अहलूवालिया से शादी की और भारत की आज़ादी से ठीक एक दिन पहले, 14 अगस्त 1947, को अपनी पत्नी और एक साल के बेटे अरविंद के साथ लाहौर से मुंबई आए। ऐसा कहा जाता है कि विभाजन में प्राण ने अपना पालतू कुत्ता को दिया था। मुंबई में उनके पास बुलेट, व्हिस्की और सोडा नाम के कुत्ते थे। यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि प्राण का पहला अभिनय भूमिका एक स्थानीय रामलीला में शिमला में मदन पुरी की राम के लिए सीता बनी थीं।

इन्हीं दिनों मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक मोहम्मद वली अपनी फिल्म ‘यमला जट’ के लिए हीरो की तलाश में थे। एक रोज किसी पान की दूकान पर उनकी नजर प्राण पर पड़ी। ये वो दौर था जब फिल्म निर्माताओं के पास एक बार में प्रतिभा को पहचानने वाली पारदर्शी आंखें होती थीं। उन्होंने एक ही नजर में प्राण साहब को ‘यमला जट’ में लेने का मन बना लिया। 1940 में यह फिल्म आई और खासी सफल भी रही। इसके बाद प्राण साहब का सिनेमा में जो सफर शुरू हुआ, तो फिर उन्होंने सफलता मिले या विफलता पीछे मुड़कर नहीं देखा।

pran filmbibo
प्राण का पसंदीदा खेल हॉकी था।
मुंबई में अपने करियर को अच्छे मुकाम पर पहुँचाने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। फिल्म पत्रकार फजले गुफरान ने अपनी किताब ‘ मैं हूं खलनायक ‘ में लिखा कि मुंबई में प्राण के शुरुआती कुछ महीनों तक परेशानी उठानी पड़ी जिस कारण उन्होंने होटल में काम करना पड़ा ओर पत्नी के गहने भी बेचने पड़े थे।

लेकिन देखते ही देखते प्राण को हिंदी सिनेमा में नया मुकाम हासिल हुआ और बॉम्बे टॉकीज की फिल्म जिद्दी में उन्हें देवानंद और कामिनी कौशल के साथ एक काम करने का मौका मिला। इसके बाद सिनेमा में प्राण का अभिनय करने का अंदाज़ ऐसा मशहूर हुआ कि फिल्म आज़ाद, मधुमति, देवदास , राम और श्याम, अमरदीप, जॉनी मेरा नाम, देस परदेस , जैसी फिल्मों में खलनायक के रूप में नजर आते रहे।

हिंदी सिनेमा में 80 दशक की शुरुआत तक प्राण का नाम इतना बड़ा बना चुका था कि हर कोई प्राण को अपनी फिल्म में एक विलन ओर खलनायक के किरदार के लिए प्राण को याद किया जाने लगा। प्राण का “अरे.. बरखुरदार..!” बोलने के अंदाज़ को हर कोई पसंद करने लगा।

जंजीर फिल्म में मिले थे प्राण और अमिताभ बच्चन
‘जबतक बैठने को ना कहा जाए , शराफत से खड़े रहो… ‘ वाला वो सदाबहार  सीन जिसमें पहली बार थाने में प्राण ओर बच्चन का सामना होता है। फिल्म ‘ ज़ंजीर ‘ में दोनों मिले और फिल्म की तरह असल जीवन में भी अच्छे दोस्त बन गए। 1978 में आई अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फिल्म डॉन के लिए ,अमिताभ को जहां ढाई लाख मिले तो वहीं प्राण ने पांच लाख फीस ली थी। इन्हीं बातों से अंदाज़ लगाया जा सकता है की उस टाइम पर उनका क्या स्टारडम रहा होगा।

खलनायक से बदलकर मलंग चाचा भी बने
प्राण खलनायक के लिए तो प्रसिद्ध थे लेकिन एक विलन को अच्छे आदमी के किरदार में बदलने के लिए भी कोशिश की गई थी। फिल्म ओर भारतीय सिनेमा में सबसे मशहूर खलनायक को एक अच्छे आदमी के किरदार के लिए प्रयास सफल रहा था, जिसका श्रेय मनोज कुमार को जाता था। फिल्म उपकार 1967 में मनोज कुमार ने प्राण को शारीरिक रूप से अक्षम मलंग चाचा के सकारात्मक किरदार के लिए तैयार किया और इस फिल्म ने हिंदी सिनेमा के महान खलनायक को एक नई छवि और नई पहचान दी।

इसी तरह मेहमूद किशोर कुमार कॉमेडी जिसमें प्राण ने सरदार जुनैद सिंह , दिलावर सिंह और शेर खान की तिहरी भूमिका निभाई और बाद में ‘ जॉनी मेरा नाम ‘ फिल्म में भी दोहरी भूमिका निभाई थी।

प्राण साहब लगभग सात दशक तक सिनेमा जगत में सुपरहिट रहे। साढ़े तीन सौ के करीब फिल्मों में काम किया। हिंदी सिनेमा को एक महान खलनायक का किरदार और ख़ास अंदाज़ में बोले जाने वाले अपने डायलॉग्स और चेहरे पर वो हसीं के साथ सिगरेट पीने का अंदाज़ के ज़रिए लोगों के दिलों में एक खास जगह बनाकर 2013 में 12 जुलाई को हिंदी सिनेमा और अपने सभी फैंस को अलविदा कह गए।