पिता के रूतबे से नहीं, अपने हुनर से ‘राज कपूर’ ने बॉलीवुड में बनाई थी पहचान, जानें संघर्ष से सफलता की कहानी

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राज कपूर की फ़िल्म श्री 420 का एक दृश्य।

दुनिया के सबसे बड़े फिल्मी खानदान के रोशन चिराग राज कपूर के पिता पृथ्वी राज कपूर का थियेटर से बहुत लगाव था. पृथ्वी राज कपूर का संबंध देश के पारसी थियेटर से था. भारत में जब सिनेमा की नींव तैयार की जा रही थी तब पृथ्वी राज कपूर को भी इस बात का अंदाजा नहीं होगा कि जिस नींव में वे अपने हुनर की ईंट लगा रहे हैं, उस पर आने वाले सालों में बॉलीवुड की एक भव्य इमारत खड़ी होने वाली है.

राज कपूर के पिता ने भारत की पहली बोलती फिल्म आलमआरा में 8 अलग अलग मेकअप में रोल निभाए थे. तब उनकी उम्र महज 24 वर्ष की थे. भारत में इस तरह से सिनेमा की शुरूआत हुई. हिंदी सिनेमा और थियेटर की दुनिया का पृथ्वी राज कपूर बहुत बड़ा नाम बन चुके थे. ऐसे में पिता की समृद्ध परंपरा की दीवार को लांघ कर राज कपूर के लिए खुद को स्थापित और साबित करना इतना आसान नहीं था.

राज कपूर के भीतर का शो मैन पिता पृथ्वी राज कपूर ने बहुत पहले ही भांप लिया था. लेकिन पृथ्वी राज कपूर उनके लिए बैशाखी नहीं बने. राज कपूर ने भी तय कर लिया था कि वे पिता के नाम का सहारा नहीं लेंगे. वे खुद अपनी पहचान बनाएंगे. डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठकर एक्शन, कैमरा कहने की सीने में धधक रही आग की लपटों की तापिश को आकार देने के लिए पृथ्वी राज कपूर ने एक प्रशिक्षक की तरह ही राज कपूर को शिक्षित और प्रशिक्षित किया.

जब पिता को राज कपूर ने फिल्में बनाने की अपनी इच्छा बताई तो उन्होंने राज कपूर से कहा कि ये काम इतना आसान नहीं है. फिर भी यदि तुम करना ही चाहते हैं तो सबसे निचले पायदान से शुरू करो.

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राज कपूर अपनी पत्नी कृष्णा कपूर के साथ।

राज कपूर ने पिता की इस बात का बुरा नहीं माना. इतने बड़े एक्टर के पुत्र ने बतौर अस्टिेंट डायरेक्टर अपना फिल्मी सफर शुरू किया. खास बात ये थी कि पृथ्वी राज कपूर ने राज कपूर को अस्टिेंट डायरेक्टर तो बनाया लेकिन वे अस्टिेंट निर्देशकों की फेहरिस्त में सबसे आखिरी यानि दसवें नंबर पर थे. लेकिन राज कपूर को इस बात का अफसोस नहीं था.

राज कपूर ने पिता के इस फैसले का कभी विरोध नहीं किया. वे रोज आम लोगों की तरह ही स्टूडियो जाते, यहां तक की उन्हें कभी कभी खुद ही स्टूडियो में झाडू भी लगानी पड़ती. लेकिन राज कपूर ने कभी इस बात की शर्म नहीं की. न ही रंज किया. क्योंकि पिता और पुत्र दोनों ही इस बात को जानते थे कि अगर जीवन में बड़ा बनना है तो छोटा बनना ही पड़ेगा.

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राज कपूर अपनी पत्नी कृष्णा कपूर एवं ऋषि कपूर इत्यादि बच्चों के साथ।

राज कपूर के शो मैन बनने का सिलसिला यहीं से आरंभ होता है. राज कपूर की फिल्मी मनोरंजन के साथ साथ एक तस्वीर भी पेश करती हैं, जो दुनिया में भारत की छवि को मजबूती प्रदान करती हैं. ये वो दौर था जब भारत को अंग्रेजों से आजादी मिली ही मिली थी. भारत अपने पैरा पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था. दुनिया भर में एक अजीब ही तरह की उथल पुथल थी. नक्शों पर भूगोल बदल रहा था.

सोवियत रूस के टूटने की पटकथा तैयार हो रही थी. बर्लिन की दीवार कमजोर पड़ रही थी और इधर भारत आजादी का जश्न मना रहा था. यह वही दौर था जब दुनिया तेजी से बदल रही थी. आजादी के इस जश्न में राज कपूर सिल्वर स्क्रीन पर राजू बनकर भारत की जनता को तरक्की के सपने दिखा रहे थे, उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे थे. निराशा के दौर में राजू उस समय के नौजवानों के लिए रोशनी की किरण बनकर पर्दे पर अवतरित हुआ था. राज कपूर सिनेमा के माध्यम से आम आदमी के सपने, शिकस्तों और सफलताओं की कहानी कह रहे थे.

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राज कपूर और नर्गिस की फाइल फोटो।

आजादी के बाद अंग्रेज देश में कई समस्याओं को विरासत में छोड़कर गए थे. भुखमरी, बेरोजगारी, अमीर गरीब का फर्क जैसी कई समस्याएं देश की तरक्की में सबसे बड़ा बाधा दी थी. इसके साथ ही देश एक और समस्या से जूझ रहा था वो थी डाकूओं की बढ़ती ताकत. उस समय देश के 100 से अधिक जनपदों में अलग अलग खूंखार डाकूओं की दहशत कायम थी. सूरज ढ़लते ही इन जनपदों में प्रभावित इलाकों में लोग घरो में दुबक जाते थे.

देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए यह डाकू और दस्यु एक नई मुसीबत के तौर पर उभर चुके थे. तब राजकपूर ही थे जो इन्हें आत्मसमर्पण के लिये प्रेरित कर रहे थे और बता रहे थे कि हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है और आ अब लौट चलें नैन बिछाए, बाँहें पसारे तुझको पुकारे देश तेरा. राज कपूर का कैमरा अंध विश्वास पर गहरी चोट करता था. अंध विश्वास के नाम पर महिलाओं के शोषण के खिलाफ उनका प्रेमरोग खुलकर दिखायी देता है.

अमिताभ बच्चन को लेकर की थी ये भविष्यवाणी

जिस आवाज को लेकर कभी अमिताभ बच्चन की हंसी उड़ाई गई थी उसी आवाज को सुनकर राज कपूर ने उनके भीतर छिपे सदी के महानायक को बहुत पहले ही भांप लिया था.

राज कपूर सही मायने में कला के जोहरी थे. एक बार आरके स्टूडियो में अमिताभ बच्चन की किसी फिल्म की शूटिंग चल रही थी. तब अमिताभ बच्चन हिट नहीं हुए थे. वे सफल होने के लिए संघर्ष कर रहे थे. स्टूडियो से गुजरते हुए राजकपूर के कानों में अमिताभ बच्चन की आवाज सुनाई पड़ी तो उन्होने अपने असिस्टेंट से पूछा कि यह कौन कलाकार है? असिस्टेंट ने कहा कि नया कलाकर है. अमिताभ बच्चन नाम है. तब राजकपूर ने जवाब दिया कि ये कलाकार एक दिन बहुत बडा कलाकार बनेगा. महज आवाज सुनकर ही राजकपूर ने अमिताभ के मिलेनियर स्टार बनने की भविष्यवाणी कर चुके थे. जो बाद में सच साबित हुई.

ऋषि कपूर की शादी में उस्ताद नुसरत फतेह अली खान को बुलाया था

राज कपूर संगीत के मर्मज्ञ थे. उन्हें हर तरह के संगीत की गहरी समझ थी. साहित्य और ऊर्दू अदब के भी जानकार थे. महान सूफ़ी गायक उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान को राज कपूर ने भी भारत में बुलाया था. राज कपूर ने पुत्र ऋषि कपूर की शादी में उन्हें अपने यहां आने का न्यौता दिया था.

शैलेंद्र और शंकर जयकिशन से दोस्ती

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राज कपूर, शैलेंद्र और मुकेश की फाइल फोटो।

राज कपूर की गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार शंकर जयकिशन से गहरी दोस्ती थी. बॉलीवुड में टीम कल्चर की शुरूआत राज कपूर ने ही की थी. उनके टीम में गायक मुकेश और हसरत जयपुरी भी शामिल थे. राज कपूर बहुत प्रयोगधर्मी थे. वे नए लोगों को बहुत अवसर दिया करते थे. सुरेश वाडेकर. रवीन्द्र जैन जैसे कई कलाकारों को उन्होंने मौक़ा दिया.

देश ही नहीं विदेशों में भी लोकप्रिय थे राज कपूर

राज कपूर देश के पहले ग्लोबल अभिनेता थे. यह कहना गलत नहीं होगा. उनके चाहने वाले सात समंदर पार भी थे. अमेरिका, मध्य एशिया और यूरोप सहित कई देशों में उनकी लोकप्रियता का परचम लहराता था. दो जून 1988 में यह महान शो मैन इस धरती का अलविदा कह गया. लेकिन यह शो मैन इतना तो बताने और समझाने में सफल रहा है कि छोटी सा बात न मिर्च मसाला कहता रहेगा कहने वाला…दिल का हाल सुने दिल वाला.