‘ममता गाबय गीत’ के कलाकारों ने याद किये फ़िल्म से जुड़े यादगार लम्हे

ममता गाबय गीत के कलाकारों से उस फिल्म का किस्सा सुनना दिलचस्प है

कहां है ममता गाबय गीत के कलाकार
कहां है ममता गाबय गीत के कलाकार

‘ममता गाबय गीत’ बिला शक मैथिली की पहली शुरू हुई फिल्म थी. पर तकनीकी तौर पर देखा जाए तो यह तीसरी फिल्म है। फिल्म के कलाकारों ने फिल्म निर्माण से जुड़ी दिलचस्प बातें फिल्मबीबो से साझा की हैं.

गीतकार रवींद्रनाथ ठाकुर की बेटी और फिल्म में सुखिया (अजरा) को डब करने वाली वैदेही मिश्रा बताती हैं, “तकरीबन 18-19 वर्ष पुरानी नेगेटिव थी, बिना पूरी शूटिंग के फिल्म का पैकअप हो गया था। बम्बई लैब में फिल्म की निगेटिव सुरक्षित थी, पहले उसे देखा गया, फिल्म पूरी नहीं थी इसलिए कहानी को पूरा करने के लिए अथवा कहा जाए कहानी को कहानी का रूप देने के लिए उसमें बहुत सारा पैच वर्क किया गया, जमींदार की बहन और उसके बेटे के साथ-साथ कुछ और स्टोरी को जोड़ा गया, फिल्म के सेंटिमेंट को उभारने के लिए कई जगह नए डायलॉग लिखे गए।”

कलाकारों की ड्रेस महंथ मदन मोहन दास के पास दरभंगा में सुरक्षित थी। काफी मशक्कत के बाद  फिल्म को पूरा किया जा सका।

1980-81 में अजरा, त्रिदीप कुमार और लता बोस की उम्र अधिक हो गयी थी, इनके डुप्लीकेट का इस्तेमाल किया गया जिसमें उनका चेहरा नहीं दिखाया गया।

वैदेही मिश्रा बताती हैं, “डबिंग के अलावे फिल्म में अनऑफिसियल प्रोडक्शन असिस्टेंट का काम संभाल लेती थी जिससे पिताजी की मदद हो जाती थी। 20 वर्ष की आयु में वैदेही मिश्रा ने फिल्म की गीत ‛देवकी परोछे गेली, यशोदा बेकल भेली’ भी गाया था जिसमें रेखा झा ने उनका साथ दिया।

सुखिया(अजरा) के किरदार को डब करने वाली वैदेही ठाकुर, 20 वर्षीय वैदेही ठाकुर ने फिल्म के एक गीत को भी स्वरबद्ध किया था।
सुखिया(अजरा) के किरदार को डब करने वाली वैदेही मिश्रा, 20 वर्षीय वैदेही ठाकुर ने फिल्म के एक गीत को भी स्वरबद्ध किया था।

लता बोस के किरदार शनिचरी को डब करने वाली वरिष्ठ पत्रकार सारिका ठाकुर बताती हैं, “कहानी में कई जगह सीन जोड़ा गया। एक मुजरा ‛गोरे इजोरिया पर तारा के तिलबा, कमाल गोदना..’  की शूटिंग हुई जिसे बन्दनी मिश्रा पर फिल्माया गया था।

अंधेरी में डॉ. मणिकांत मिश्रा के छत पर इस गाने की शूटिंग हुई थी। फिल्म के कुछ हिस्से की शूटिंग मुम्बई के कल्याण में हुई थी, कल्याण में मिथिला के लोग रहते थे जिससे मिथिलांचल के गांव की फील आती है।

फिल्म में लाला का किरदार निभाने वाले कमलनाथ सिंह ठाकुर का एक तकियाकलाम ‛ताहि तोSर सँ पुनि जे से’ था. कमलनाथ शूटिंग के दौरान इसे इतनी तेजी से बोलते थे कि डबिंग के समय इसे समझने के लिए घण्टों लग गए थे। उन्हें  रतिनाथ ठाकुर ने डब किया थे, जो कि उन दिनों आकाशवाणी में थे।

शूटिंग के दिनों को याद करती हुई सारिका ठाकुर बताती हैं, “उन दिनों मैं महज 13 साल की थी, मैं शनिचरी के किरदार को डब कर रही थी. ऑपोजिट बौआ के किरदार को डब करने वाले ललितेश झा थे, जो आज मैथिली/भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के बड़े अभिनेता हैं। डबिंग के दौरान ललितेश खूब चिढ़ाया करते थे जिससे मैं कई बार रूठ जाती थी फिर पिताजी (रवींद्रनाथ ठाकुर) मुझे समझाकर डबिंग के लिए तैयार करते थे”.

सारिका ठाकुर
सारिका ठाकुर

फिल्म में ठाकुर के भांजे का किरदार निभाने वाले अभिनेता ललितेश कहते हैं, “मैं रवींद्रनाथ ठाकुर के गाने का बहुत बड़ा फैन था, उनकी लिखी एक नाटक ‛एना होय छै’ में मैंने अभिनय किया था! इससे पहले मेरी पहली भोजपुरी फिल्म  ‛बाजे शहनाई हमार अंगना’ पूरी हो कर चुकी थी, डबिंग के लिए 1980 में मुझे मुम्बई लाया गया। बाद में ‛तोहें जनु जाह विदेश’ गाना फिल्माया गया, मेरे अपोजिट प्रभा मिश्रा थी.”

ललितेश झा
ललितेश झा

फिल्म के प्रोडक्शन कंट्रोलर अविन्द्रनाथ ठाकुर बताते हैं, “फिल्म के निर्देशक चौधरी परमानन्द जी ने रवींद्रनाथ ठाकुर जी से मुलाकात कर फिल्म पूरा करने की इच्छा जताई, इस सम्बंध में 1980 में तीनों निर्माताओं से बात हुई उन्होंने सहमति दे दी। राइट खरीदने  के बाद फिल्म के प्रोड्यूसर रवींद्रनाथ ठाकुर और महेंद्र झा थे हालांकि तकनीकी तौर पर दोनों की पत्नी प्रेमलता ठाकुर और द्रौपदी झा निर्मात्री थी। गंगा-भगत फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर थे। फिल्म के सभी पुराने कलाकारों के रंग रूप बदल गए थे, स्टोरी को रिमॉडल किया गया, कहानी में इस तरह से पैच वर्क किया गया जिससे बिना सेंटीमेंट बदले फिल्म पूरी हो जाय।”

शूटिंग के दौरान घटित एक घटना का जिक्र करते हुए अविन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं, ‛एक बार कांदिवली शूटिंग के लिए गए थे, दो-तीन शूट करनी थी। गांव का सीन चाहिए था, हमने यूनिट उतारी और शूट करने लगे. वह किसी पठान का फॉर्म हाउस था। इतने में उसे खबर हो गयी। वह तलवार लेकर काट देगी, बर्बाद कर देगी…’ चिल्लाता हुआ आ गया।

शरत जी कॉमेडियन हुआ करते थे, फिल्म में बौआ (त्रिदीप कुमार) के मित्र का किरदार निभाया। उस दिन मुल्ला वाली दाढ़ी लगाए थे, हल्ला सुनकर वह दौड़ गए, कहा, ‛वालेकुम सलाम! तुम क्यों चिल्लाती? ये अपने बिरादर की फिल्म है’ साथ ही उसके पास जाकर कुछ फुसफुसाया, क्या फुसफुसाया ये तो नहीं पाया लेकिन उसके बाद चाय, समोसा और लड्डू आने लगा. पठान ने बहुत खातिरदारी की। उस रोज हमलोग बाल-बाल बचे थे’।

फिल्म की डबिंग अजंता आर्ट्स और राजेन्द्र कुमार के डिंपल स्टूडियो में हुई थी।