गीतों का राजकुमार शैलेंद्र, दिनकर और नागार्जुन भी जिनकी कविताओं के मुरीद थे

Shailendra Lyricist Biography
गीतकार शैलेंद्र को हिन्दी फिल्मों में राज कपूर ने ब्रेक दिया था।

वो ढफली बजाता था। हवाओं, सड़कों और जूतों पर गीत लिखता था। पढ़ने में अव्वल था। हॉकी खेलता था, लेकिन सामाजिक व्यवस्था और ऊंची जाति के लोगोें के तानों से अजीज आकर एक दिन उसने हॉकी तोड़ दी और कलम पकड़ ली। कलम से निकले तरानों ने उसे शंकरदास केसरीलाल से कवि राज शैलेंद्र बना दिया। जो बाद में बॉलीवुड में गीतकार शैलेंद्र के नाम से लोकप्रिय हुए।

गीतकार शैलेंद्र के जीवन की कहानी, हिंदी फिल्मों की तरह ही तमाम उतार चढ़ाव से भरी रही है। शैलेंद्र का जन्म पाकिस्तान के रावलपिंडी में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार बिहार के आरा जिले के एक छोटे से गांव धूसपुर में आकर रहने लगा। मुफलिसी, दुश्वरियां और बीमारियों के बीच बचपन गुजारने के कारण शैलेंद्र को कम उम्र में ही जिंदगी की हकीकत का पता चल गया था।

शैलेंद्र ने अपना पहला गीत 17 साल की उम्र में लिखा था। भारतीय रेलवे से शैलेंद्र का गहरा नाता था। इसकी वजह थी कि शैलेंद्र के शुरूआती जीवन का एक बड़ा हिस्सा रेलवे की नौकरी और रेलवे के सरकारी आवासों में गुजरा। इसके साथ ही शैलेंद्र के जीवन का एक बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश के मथुरा में बीता।

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गीतकार शैलेंद्र (बायें) के साथ संगीतकार रोशन। रोशन के पोते ऋतिक रोशन अभिनेता हैं।

शैलेंद्र पिता की बीमारी के बाद अपने चाचा के साथ मथुरा आ गए। मथुरा के किशोरीरमण विद्यालय से शैलेंद्र ने मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की, लेकिन पढ़ाई के दौरान ही शैलेंद्र को जीवन के एक और, कड़वे अनुभव का सामना करना पड़ा। शैलेंद्र को हॉकी खेलना बहुत पसंद था। पढ़ाई से जब भी उन्हें फुरसत मिलती है वे स्टिक उठाते और हॉकी खेलने के मैदान में पहुंच जाते। लेकिन एक बार हॉकी के एक मैच में ऐसी घटित हुई कि उस घटना ने शैलेंद्र का जीवन ही बदल कर रख। कोमल और सरल मन वाले शैलेंद्र इस घटना को जीवन भर नहीं भूल पाए।

शैलेंद्र एक बार जब हॉकी खेल रहे थे, तो ऊंची जाति के कुछ युवकों ने उन्हें खेलने से यह कर रोक दिया कि उनके साथ छोटी जाति के लोग नहीं खेल सकते। इस बात का शैलेंद्र के मन-मस्तिष्क पर बहुत गहरा असर पड़ा। इस बात को सुनकर शैलेंद्र ने हॉकी की स्टिक को वहीं तोड़ दिया और फिर कभी हॉकी नहीं उठाई, लेकिन ये बात शैलेंद्र के कवि मन में कील की तरह धंसी रही।

कवि और कलाकर का मन बहुत ही कोमल और नाजुक होता है। इस घटना ने शैलेंद्र के मन मस्तिष्क को बुरी तरह से झकझोर दिया था। इस घटना से मिले अनुभव को उन्होंने वक्त के साथ रह-रह कर गीतों की शक्ल में बयां किया। तभी वे कहते हैं- ‘होंगे राजे राजकुंवर, हम बिगड़े दिल शहजादे। सिंहासन पर जा बैठे जब जब करें इरादे।’

Lyricist Shailendraएक्टर और शोमैन राजकपूर ने शैलेंद्र के सीने में दबी इस आग को सबसे पहले पहचाना, और पहली बार उन्हें अपनी फिल्मों में गीत लिखने के लिए ऑफर दिया। बाद में इस जोड़ी ने हिंदी सिनेमा की दिशा और दशा ही बदल दी। हिंदी गीतों को हर आम ओ खास भारतीय और सात संमदर पार तक पहुंचाने का शैर्य इसी जोड़ी को जाता है। ‘मेरा जूता है जापानी’ को पहला भारतीय ग्लोबल गीत कह सकते हैं। इस गीत ने भारत और रूस कूटनीति रिश्तों को एक नई रोशनी दी, जिसकी तासीर आज भी महसूस होती है। इतने बरस बीत जाने के बाद, आज भी यह गीत रुस में लोकप्रिय है।

शैलेंद्र के गीतों की सबसे खास बात ये है कि उनके भीतर का जनकवि, अपनी जिम्मेदारियों का अहसास गीतों के माध्यम से कहीं न कहीं करा ही देता है। शैलेंद्र इस बात को समझाने में भी सफल नजर आते हैं कि मीडियम चाहे जो हो, जो बात आपको कहनी है, वो आसानी से कही जा सकती है। बस कहने का शऊर होना चाहिए। शैलेंद्र के पास यही शऊर था।

मोहब्बत के नग्मों में भी शैलेंद्र एक आम आदमी की शिकस्त और आरजू को बहुत आसान तरीके से बयां करने की क्षमता रखते थे। गंभीर से गंभीर बात को शैलेंद्र बडे़ ही सरल और असरदार ढंग से कहने का हुनर रखते थे। यही खूबी शैलेंद्र को एक बड़ा गीतकार बनाती है।

शैलेंद्र और राज कपूर की दोस्ती

शैलेंद्र ने फणीश्वरनाथ रेणु के एक उपन्यास पर फिल्म ‘तीसरी कसम’ को बनाने का निर्णय लिया। इस फिल्म के लिए शैलेंद्र राज कपूर को लेना चाहते थे। फिल्म को लेकर जब शैलेंद्र राज कपूर से मिले तो, राज कपूर ने उन्हें इस फिल्म को बनाने का ख्याल दिमाग से निकाल देने की सलाह दी। लेकिन शैलेंद्र ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। राज कपूर फिल्म में काम करने के लिए राजी हो गए, लेकिन शैलेंद्र के सामने एक शर्त रख दी।

राज कपूर की टीम के अन्य सदस्यो के साथ गीतकार शैलेंद्र (सबसे दाएं)
राज कपूर की टीम के अन्य सदस्यो के साथ गीतकार शैलेंद्र (सबसे दाएं)

‘तीसरी कसम’ में काम करने के लिए राज कपूर ने शैलेंद्र के सामने अपने काम की फीस एडवांस में मांगी। राज कपूर उस जमाने में सुपर स्टार की श्रेष्णी के एक्टर थे, शैलेंद्र उनकी फीस अच्छे ढंग से जानते थे। शैलेंद्र ये भी जानते हैं कि राज कपूर की फीस दे पाना, उनकी क्षमताओं से बाहर है। लेकिन जब शैलेंद्र के सामने एडवांस में अपनी पूरी फीस बताई तो शैलेंद्र के मन में राज कपूर को लेकर सम्मान और भी बढ़ गया है और उन्हें अपनी दोस्ती पर बहुत नाज आया। फिल्म ‘तीसरी कसम’ के लिए राज कपूर ने एडवांस में अपनी फीस के रूप में सिर्फ एक रूपया ही शैलेंद्र से लिया था। समीक्षक मानते थे कि राज कपूर ने अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ एक्टिंग इसी फिल्म में की थी।

शैलेंद्र का ढफली से लगाव 

शैलेंद्र का ढफली से बेहद लगाव था। शैलेंद्र जब भी उदास होते थे तो वे ढफली बजाते थे। एक्टर राज कपूर ने शैलेंद्र के इस ढपली प्रेम को सिनेमा के पर्दे पर खूब प्रयोग किया। कई फिल्मों में राज कपूर ढफली बजाते नजर आए।

गुलजार’ की प्रतिभा को पहचाना

शैलेंद्र ही वो गीतकार हैं जिन्होंने ‘गुलजार’ के अंदर छिपी प्रतिभा को सबसे पहले पहचाना था। ‘गुलजार’ को मशहूर फिल्म निर्माता निर्देशक बिमल रॉय के पास भेजने वाले शैलेंद्र ही थे। उस समय बिमल रॉय फिल्म ‘बंदिनी’ बना रहे थे, शैलेंद्र की बिमल रॉय से किसी बात को लेकर अनबन हो गई थी, बिमल रॉय को एक गीतकार की तलाश थी।

उस जमाने में शैलेंद्र ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ और ‘इप्टा’ जैसी संस्थाओं में सक्रिय मेंबर तौर पर सक्रिय रहते थे, ‘गुलजार’ का भी यहां आना जाना रहता था. बातों ही बातों में शैलेंद्र ने ‘गुलजार’ को बिमल रॉय से मिलने की सलाह दी।

Shailendra with Lata Mangeshkar
शैलेंद्र का एक गीत पढ़ती हुई गायिका लता मंगेशकर।

‘गुलजार’ ने उनकी सलाह को मानते हुए बिमल रॉय से उनके ऑफिस में मुलाकात की, इस फिल्म के लिए उन्होंने ‘मोरा गोरा अंग लई ले,’ इतना पसंद आया कि ‘बिमल रॉय’ ने ‘गुलजार’ से पूछा गीत लिखने के अलावा और क्या काम करते हो?, ‘गुलजार’ ने जवाब दिया कि वे मोटर गैरेज में कारों का डेंट निकाल कर पेंट करते हैं। तब बिमल रॉय ने ‘गुलजार’ से कहा- वहां समय खराब करने की कोई जरूरत नहीं है। इसके बाद ‘गुलजार’ ने फिर कभी मुडकर नहीं देखा, सफलता के कई सोपानों पर चढ़ने के बाद भी ‘गुलजार’ शैलेंद्र की इस दरियादिली को कभी नहीं भूलते हैं।

आवारा हूँ, या गर्दिश में हूँ आसमान का तारा हूँ 

शैलेंद्र गंभीर से गंभीर विषय को भी गीत की शक्ल देने में उस्ताद थे। ये बात राज कपूर को बहुत प्रभावित करती थी। एक बार राज कपूर शैलेंद्र को लेकर अपने एक निर्माता निर्देशक मित्र ख्वाजा अहमद अब्बास के पास लेकर गए। वहां उनके मित्र ने एक फिल्म की कहानी सुनाई। कहानी सुनने के बाद राज कपूर ने शैलेंद्र से कहानी के बारे में पूछा- कवि राज शैलेंद्र कहानी कैसी लगी?, इस बार शैलेंद्र ने पूरी कहानी का निचोड़ एक लाइन में समेट दिया और कहा- ‘आवारा है, पर गर्दिश में आसमान का तारा था।’ इस बात को सुनकर  ख्वाजा अहमद अब्बास हैरान रह गए और राज कपूर से पूछा कि ये ज़नाब कौन हैं? जिन्होंने ढाई घंटे की फिल्म को एक लाइन में समेट दिया।

हर जोर जुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमार नारा है

जब भी कोई प्रदर्शन या आंदोलन होता है तो ‘हर जोर जुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमार नारा है।’ इस लाइन को तो सभी ने सुना होगा। इस नारे को शैलेंद्र ने ही लिखा था। शैलेंद्र के इस नारे ने उस दौर के मजदूर और शोषितों की लड़ाई को एक नई दिशा थी। शैलेंद्र के इस नारे को आज भी हक के लिए लड़ने वाले सबसे सशक्त टूल की तरह प्रयोग करते हैं।

जलता है पंजाब

आजादी के आंदोलन का शैलेंद्र पर गहरा प्रभाव पड़ा था। भारत के विभाजन पर शैलेंद्र बहुत रोए थे। इस पर उन्होंने एक गीत भी लिखा था। बाद में उनकी एक कविता जिसने उन्हें पहचान दिलाने का काम किया वह थी- ‘जलता है पंजाब।’ यह कविता ‘जलियांवाला कांड’ पर शैलेंद्र ने लिखी थी। ये वह कविता थी जिसे सुनकर राज कपूर शैलेंद्र की तरफ आकर्षित हुए थे। इस कविता को शैलेंद्र ने एक मुंबई के थिएटर में सुनाया था। इस कवि सम्मेलन में पृथ्वीराज कपूर और राज कपूर भी आए थे। शैलेंद्र ने जब ‘जलता है पंजाब’ कविता सुनाई तो लोगों ने इसे बहुत सराहा।

कवि सम्मेलन समाप्त होने के बाद राज कपूर ने शैलेंद्र से फिल्मों में गीत लिखने का आग्रह किया, लेकिन शैलेंद्र ने राज कपूर से यह कहर उनका प्रस्ताव ठुकरा दिया कि वे पैसों के लिए नहीं लिखते हैं। हालांकि बाद में दोनों में गहरी दोस्ती हो गई। शैलेंद्र की मृत्यु पर राज कपूर ने कहा था कि शंकर जयकिशन और शैलेंद्र मेरे दो हाथ हैं।

दिनकर, नागार्जुन और जगजीवन राम की नजर में शैलेंद्र

शैलेंद्र ने अपने फिल्मी करियर में कुल 800 के गीत लिखे। भारत के कई बड़े गीतकार शैलेंद्र को गीतों का राजकुमार भी कहते हैं। दिनकर, नागार्जुन और जगजीवन राम जैसे बड़े साहित्यकार और गीतकार शैलेंद्र को आज का ‘रैदास’ कहते थे।

अटल बिहारी वाजपेयी के पंसदीदा गीतकार थे शैलेंद्र 

‘सजन रे झूठ मत बोलो, खुदा के पास जाना है।’ फिल्म ‘तीसरी कसम’ का ये गीत भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी का पसंदीदा गीतों में से एक था। ‘तीसरी कसम’ को कई राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया था। ये महान गीतकार जिसने अपने कलम से अनगिनत गीत हिंदी सिनेमा को अता किए, आज के दिन यानि 14 दिसंबर 1966 को हमसे, हमेशा के लिए जुदा हो गया, लेकिन गीतों के माध्यम से शैलेंद्र हर दौर और हर पीढ़ी को ये बात समझाते और सुनाते रहेंगे-

होठों पे सच्चाई रहती है।
जहाँ दिल में सफ़ाई रहती है।
हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है।