फिल्म इतिहासः पहली बोलती फिल्म आलमआरा की हीरोईन जुबैदा की कहानी

भारत की पहली बोलती फिल्म आलमआरा की हीरोईन जुबैदा अपने वक्त की सुपरस्टार हो गई थीं

सवाक फिल्म में अवाक हीरो
सवाक में अवाकः मास्टर विट्ठल पहली बोलती फिल्म आलमआरा के हीरो थे पर उनके हिस्से कोई संवाद न था

भारत की पहली बोलती फिल्म आलमआरा के नायक मास्टर विट्ठल का करियर इस फिल्म के बाद उतना अच्छा नहीं रहा. लेकिन मास्टर विट्ठल की तुलना में ‘जुबैदा’ का जीवन बहुत भव्य रहा.

मास्टर विट्ठल को हमेशा यह बात परेशान करती होगी। क्योंकि फिल्म की नायिका की तुलना में उनकी तकदीर एक अजीब दास्तान हो चली थी. परिवार से लेकर सिनेमा और आगे जीवनपर्यंत जुबेदा बहुत भाग्यशाली रहीं.

जुबेदा का जन्म सूरत के एक राजशाही खानदान में हुआ था. उन्होंने अपनी अम्मी फातिमा बेगम की प्रेरणा से फ़िल्मों का रुख किया. कहा जाता है कि वह बाल कलाकार के रूप में ही फ़िल्मों में दिखाई देने लगी थीं.

जुबैदा ने ‘कोहिनूर स्टूडियो’ से सफ़र का आग़ाज़ किया था. यहां रहते हुए मूक युग के फ़िल्मकार मणिलाल जोशी साथ बेहतरीन काम किया.

जुबेदा के सर्वकालिक किरदार कोहिनूर, लक्ष्मी तथा एक्सेल स्टुडियो की फ़िल्मों में नोटिस किए गए. वह मूक दौर की शीर्ष अभिनेत्रियों में से एक थीं. जुबेदा ने दर्द भरे किरदारों से छवि बनाई, इस संदर्भ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी से प्रेरित ‘बलिदान’ उल्लेखनीय है.

नवल गांधी ने यह फ़िल्म पशुबलि विरोध में जनसमर्थन जुटाने के लिए बनाई थी.

तीस से अधिक मूक फ़िल्मों में काम करने के साथ जुबेदा सवाक फ़िल्मों में भी नजर आईं. पर असली धूम तो आर्देशिर ईरानी की ‘आलमआरा’ में शीर्षक भूमिका निभाकर मचाई थी.

दमदार कथा-पटकथा की कमी पहली सवाक फ़िल्म की जादूगरी को रोक न सकी. दीवानगी का आलम तो देखें कि ‘आने’ के जमाने में रूपयों में टिकट बिके थे।

तीस के दशक में जुबेदा-जल मर्चेंट जोड़ी की खूब सराहना हुई. इस समय वो ज्यादातर धार्मिक-मिथकीय किरदारों को निभा रही थी.

परदे पर सुभद्रा और द्रौपदी जैसे किरदारों को पहली बार जीवंत करने का श्रेय जुबेदा को जाता है. बीच-बीच में उन्होंने ‘ज़रीना’ जैसे ऐतिहासिक पात्रों का रुख भी किया.

अपनी अम्मी फातिमा बेगम की प्रोडक्शन की फिल्म ‘बुलबुल-ए-परीस्तान’, ‘हीर-रांझा’ एवं ‘मिलन’ में भी नजर आईं थी.

एज़रा मीर की चर्चित ‘ज़रीना’ अपने समय से बहुत आगे थी. फ़िल्म का निर्माण ‘सागर स्टूडियो’ ने किया था.

टाकी युग में जुबेदा ने बडे पैमाने की फ़िल्मों में काम किया.  यह फीचर फ़िल्मों में राजशाही कहानियों व जुबेदा का दौर था।

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