गुरु दत्त की बेचैनी उनकी सर्जनात्मकता की आत्मा थी और वही उनकी मौत का सबब भी

ताउम्र छाई बेचैनी गुरु दत्त की रचनात्मकता और मौत दोनों की वजह थी

गुरुदत्त हिंदी सिनेमा के लिए बहुमूल्य हैं
गुरु दत्त के बेचैन हाव-भाव ने त्रासद नायक को एक अलग पहचान दी

बात सन 2007 की है. पुणे में फिल्म ऐंड टेलिविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआइआइ). इतवार के दिन कक्षाएं नहीं थीं. मैं पुणे में हफ्ते भर पुराना ही था. मई के महीने में बारिश के बाद सुहानी हुई एक शाम में हम कुछ दोस्त लॉ कॉलेज रोड से डेक्कन जिमखाना की तरफ चल पड़े थे.

सिर्फ चाय पीने के वास्ते करीब पांचेक किलोमीटर का सफर पैदल तय करने की वजह भी गजब ही थी. पुणे में मुझसे कुछ हफ्ते पुराने एक दोस्त ने कहा था, डेक्कन जिमखाना के पास चाय की एक मशहूर दुकान है. जहां प्रभात फिल्म कंपनी से देव आनंद और गुरु दत्त दोनों पैदल ही चाय पीने जाया करते थे.

इस बात की तस्दीक एफटीआइआइ परिसर में बरगद के पेड़ के नीचे इस्तिरी की दुकान लगाने वाला गायकवाड़ ने भी की थी.

गायकवाड़ ने तब हमें बताया था कि उसी गुडलक चाय की दुकान में गुरु दत्त और देव आनंद ने एक-दूसरे से वादा किया था कि दोनों में से जिसने भी पहले बैनर बनाया, वह अपने साथी को अपनी पहली फिल्म में काम देगा.

देव आनंद ने अपना वादा निभाया.

उन्होंने जब नवकेतन बैनर्स को लॉन्च किया तो इसकी पहली फिल्म ‘बाज़ी’ (1951) में गुरु दत्त को निर्देशक बनाया. इस फिल्म पर अमेरिकी नॉयर फिल्मों का असर था. इसने देव आनंद के चॉकलेटी रोमांटिक नायक की छवि के उलट उन्हें धूसर किरदार के रूप में दिखाया.
देव आनंद ने अपना वचन निभाया पर गुरु दत्त ने अपना वादा पूरी तरह नहीं निभाया. बतौर निर्माता उनकी पहली फिल्म सीआइडी थी, जिसमें उन्होंने बतौर हीरो तो देव साहब को ही लिया. पर, निर्देशन का भार दिया गया गुरु दत्त के पूर्व असिस्टेंट राज खोसला को.

बहरहाल, इस किस्से को सुनकर हम जैसे सिनेमा के छात्र तो अचंभे में पड़ गए. लिहाजा, हम पांच सहपाठी चाय की उसी दुकान में बैठे, जहां देव साहब और गुरु दत्त की तस्वीर लगी थी. जाहिर है, यह तस्वीर उनके सितारा बनने के बाद ही लगी होगी.

वह चाय की दुकान प्रतीक है संघर्ष करने वाले एक ऐसे इंसान की, जिसने जब अपने ही किस्म के त्रासद अंदाज में दुनिया को अलविदा कहा, उससे पहले ही कागज के फूलों के बीच प्यासा रहे उस शख्स के पदचिह्न कद्दावर हो चुके थे.

गुरु दत्त की फिल्में, उनकी फिल्मों का कथानक, उनके कैमरे की भाषा, उनके हर फ्रेम की शै, इस बात की ओर इशारा करते हैं कि उनकी तमाम जिंदगी में एक अजीब-सी बेचैनी का साया था. न जाने किस चीज की तलाश थी उन्हें.

यह बेचैनी कुछ अकथ-सा रचने की होती है. कुछ अद्वितीय-सी संवेदनशीलता, सृजनात्मकता का अनहद नाद.
उनकी फिल्मों के संवाद लेखक अबरार अल्वी ने गुरु दत्त की मौत के बाद फिल्म फेयर में लिखा था, “समय, दृष्टि और ध्वनियों ने उन्हें सार्वकालिक महान निर्देशकों में शामिल कर दिया है. प्यासा और चौदहवीं का चांद दुनिया भर के फिल्म स्कूलों में बतौर सौ सर्वश्रेष्ठ वैश्विक फिल्मों के रूप में पढ़ाई जाती हैं.”

वैसे उस निर्देशक गुरु दत्त को देखिए, जिसने आर-पार (1954) या मिस्टर ऐंड मिसेज 55 (1955) जैसी उस जमाने की बड़ी हिट फिल्में बनाई थी, पर उनके अंदर का सर्जक अपने दिल के नजदीक रहने वाले विषयों पर फिल्म गढ़ना चाहता था. स्टारडम उनके लिए व्यक्तिपूजा जैसा था और एक तरह से उन्हें यह बेहूदगी लगती थी.

खुद को तलाशने की यह कोशिश फिल्म ‘प्यासा’ (1957) में पूरी हुई थी. उस वक्त फिल्मफेयर पत्रिका ने रिपोर्ट की थी कि प्यासा की पटकथा लेकर गुरु दत्त दिलीप साहब के पास गए थे. दिलीप कुमार ने पटकथा देखकर खारिज कर दी कि प्यासा का यह किरदार उनके देवदास वाले किरदार से मेल खाता है.

“समय, दृष्टि और ध्वनियों ने उन्हें सार्वकालिक महान निर्देशकों में शामिल कर दिया है. प्यासा और चौदहवीं का चांद दुनिया भर के फिल्म स्कूलों में बतौर सौ सर्वश्रेष्ठ वैश्विक फिल्मों के रूप में पढ़ाई जाती हैं.” अबरार अल्वी, गुरुदत्त की फिल्मों के संवाद लेखक

कुछ लोग कहते हैं कि गुरु दत्त की खुद की शख्सियत ऐसी थी कि वह किसी से न सुनना पसंद नहीं करते थे, और एक हद तक कहें तो बहुत पजेसिव भी थे.

और शायद इसलिए अपनी निजी जिंदगी में वह लोगों से घिरे रहने के बावजूद हर बार अकेले पड़ते चले गए. बहरहाल, प्यासा के दिलीप कुमार के इनकार के बाद शायद गुरु दत्त के अहं को ठेस लगी थी और उन्होंने नायक के किरदार में खुद उतरने का फैसला किया था. पर इस तलाश ने भारतीय फिल्मों का भला ही किया.

गुरु दत्त के बारे में जब भी बात की जाएगी, उनके बारे में लिखते वक़्त हमेशा एक त्रिकोण लिखा जाएगा. इस त्रिकोण के तीन सिरों पर गुरु दत्त, गीता दत्त और वहीदा रहमान हैं.

मशहूर अफसानानिगार इस्मत चुग़ताई का एक उपन्यास है, अजीब आदमी. इस किताब को आप गुरु दत्त की जीवनी मान लीजिए. इसमें धर्म देव नाम का किरदार है, उसकी गायिका-अभिनेत्री पत्नी मंगला है और साथ में प्रेम के त्रिकोण का तीसरा कोण हैः जरीना का. जरीना असल में वहीदा थीं.

गुरु दत्त की फिल्मों में कैमरे की आंख बड़ी शातिर हुआ करती थी. उनके लेंसों का जबर इस्तेमाल, ब्लैक ऐंड व्हाईट फिल्मों में उनकी लाइटिंग की कलाकारी. वह सेल्यूलॉयड पर जादू रचते थे, लेंसों की रोशनी में उस पर चित्रकारी करते थे.

खुद गुरु दत्त के माथे पर पड़ती शिकनों पर आप कभी लहालोट नहीं हुए, तो इसका अर्थ है किसी शायरनुमा शख्स से आपको कभी मुहब्बत नहीं हुई. प्यासा के हर फ्रेम में गुरु दत्त कविता लिखते हैं. और अपनी फिल्मों में ही जिस कदर मुहब्बत की चाशनी में उनने वहीदा रहमान को उतारा है, वह शायद उस बेचैन रूह की घोर इश्क की तपिश का नतीजा ही थी.

प्यासा से लेकर कागज के फूल तक, आप ट्रैक शॉट पर कैमरे को जाकर वहीदा रहमान के क्लोज पर जाकर खत्म होते देखिए. और इस शॉट को रचने वाले की तारीफ करिए.

प्रभात स्टूडियो वाले (जो आज का एफटीआइआइ है) बड़े फख्र के साथ आज भी वह हॉल दिखाते हैं जिसमें गुरु दत्त फिल्म कागज के फूल के एक दृश्य में खुद चलकर सीढ़ियों से नीचे उतरते हैं और वह फिल्म में भी स्टूडियो ही होता है.

एफटीआइआइ के जानकार वहां आपको समझाते हैं कि गुरु दत्त ने इस दृश्य के लिए में आईना लगाकर बीम लाइट के लिए कैसे इंतजाम किया था. आपको याद तो होगा, स्टूडियो में कुरसी पर बैठा वह बुजुर्ग निर्देशक (गुरु दत्त) और उसके सिर पर 45 डिग्री के कोण पर पड़ती हुई रोशनी! जाहिर है इसमें उनके कैमरामैन वी.के. मूर्ति का साथ मिला होगा.

गुरु दत्त क्या थे जानने से अधिक अहम यह होगा कि हम यह पूछें कि वह क्या नहीं थे. वह नर्तक, लेखक और कोरियोग्राफर से लेकर निर्देशक, लेखक और अभिनेता तक…सब कुछ तो थे.

एक भावुक इंसान ने अपने जज्बातों में आकर अपनी जिंदगी दे दी. पर यह भी सच है कि वह सर्जक अगर भावुक न होता तो भारतीय सिनेमा को उम्दा पटकथाएं, कुछेक बेहद उम्दा कलाकार, शानदार फिल्में और उनके अमर संगीत नहीं मिलते.

गुरु दत्त अपने हिस्से शायद इतनी ही मियाद लेकर आए थे.