स्मृतिशेष राहत इंदौरीः तू शब्दों का दास रे जोगी!

राहत इंदौरी मुहब्बत, खिलंदड़ेपन के गीतकार और संजीदगी के शायर थे

नहीं रहे राहत इंदौरी
नहीं रहे राहत इंदौरी

वह नवंबर की एक सर्द शाम थी. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, जहां राजपथ और जनपथ एक दूसरे को काटते हैं. साहित्य के मेले साहित्य आजतक में इंडिया टुडे की साहित्य वार्षिकी का मंच. यह मंच अमूमन छोटा होता है. पर राहत इंदौरी आने वाले थे, तो लोग घंटा-डेढ़ घंटा पहले से आकर कुरसियों पर जम गए थे. राहत साहब आए, जादू हुआ और फिर वह बड़े मंच की ओर चले गए.

राहत साहब चले गए.

पहले कोरोना पॉजिटिव होने की ख़बर दी, फिर दोपहर में उनके जाने की ख़बर आई. यह कहना क़त्तई बहुत कमज़ोर बात होगी कि उनके जाने से एक शून्य पैदा हुआ है, जिसे भरा नहीं जा सकेगा.

एक शायर में क्या होना चाहिए? मुहब्बत? पर साथ में बग़ावत भी. तो मुहब्बत और बग़ावत, दोनों अगर एक जगह देखना हो, तो वह शायर थे राहत इंदौरी. राहत साहब तो आसमान के उस बड़े मंच की ओर प्रस्थान कर गए, पर नौजवान दिलों को अपने शेरों पर तालियों के जरिए अपना दिल सामने रख देने वाला शायर, कहां से लाएगा हिंदुस्तान!

राहत साहब ने फिल्मी दुनिया में रहते हुए ऐसे गहराई भरे गाने लिखे, जिसको आप साहित्यिक शायरी की कोटि में भी रख लें, तो भी बात बन जाएगी. उनके फिल्मी गाने उन फिल्मों से क़द में बड़े हैं जिनमें वे इस्तेमाल हुए. इनमें नब्बे के दशक के वैसे गाने भी हैं, जो हमारी-आपकी उम्र के लोग गुनगुनाते हुए पाए जाते हैं.

आपको नसीरुद्दीन शाह, अतुल अग्निहोत्री, पूजा भट्ट वाली फिल्म ‘सर’ याद है? पर उसका गाना ज़रूर याद होगाः आज हमने दिल का हर क़िस्सा तमाम कर दिया…

गोविंदा और करिश्मा कपूर की फिल्म थी ‘खुद्दार’. अनु मलिक का संगीत था, याद तो होगा ही, तुमसा कोई प्यारा कोई मासूम नहीं है, तुम चीज़ हो क्या खुद तुम्हें मालूम नहीं है.

याद आया? न आया हो तो यूट्यूब पर सुन लीजिए.

इसी तरह 2003 में आई थी फिल्म ‘मर्डर’. इस फिल्म को इमरान हाशमी और मल्लिका सहरावत की उद्दाम कामक्रीड़ाओं के लिए जाना जाता है. पर क्या आप कश्मीरा शाह पर फिल्माए गए गाने को कभी भुला पाए? राहत साहब का लिखा हैः

दिल को हज़ार बार रोका रोका रोका

दिल को हज़ार बार टोका टोका टोका

दिल है हवाओं का झोंका झोंका झोंका

धोखा है प्यार यार, प्यार है धोखा

इस गाने में जितनी मादकता अलीशा चिनॉय के शब्दों में है राहत साहब के अल्फ़ाज की जादूगरी भी उतनी ही है.

उर्दू साहित्य के इस जहीन शायर का बेबाक लहजा उनके शेरों और ग़ज़लों के साथ उनकी नज़्मों और नग़्मों से भी झलकता रहा.

आप एक शेर याद करिए,

ये ज़िंदगी जो मुझे क़र्ज़-दार करती रही

कहीं अकेले में मिल जाए तो हिसाब करूँ

या फिर ऐसा ही एक और शेर है,

एक ही नदी के हैं ये दो किनारे दोस्तों

दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो

और अब जरा मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस में शब्दों की अय्यारी देखिए,

बैयाँ साँसों की खुद पे डाले बैयाँ

जीवन है बर्फ की नैया

नैया पिघले हौले हौले

चाहे हंस ले चाहे रोले

मरने से पहले जीना सीख ले

एक कवि या शायर अगर लोगों की दिलों की आवाज़ बन जाए, तो यही उसकी सबसे बड़ी कामयाबी होती है. पिछले साल नबंवर दिसंबर में, जब चिल्ला जाड़ा पड़ रहा था, राहत इंदौरी की लिखी पंक्तियों ने नागरिकता संशोधन कानून और भारतीय नागरिक रजिस्टर का विरोध करने वाले आंदोलनकारियों के विरोध को एक नारा मुहैया करा दिया था.

‘किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है’, राहत इंदौरी की इन पंक्तियों को दोहराकर हर प्रदर्शनकारी खुद को इस मिट्टी का बता रहा था.

असल में, सीएए-एनआरसी के मुद्दे पर राहत इंदौरी ने अपनी राय रखते हुए कहा था कि यह देश किसी व्यक्ति विशेष, पार्टी या धर्म की संपत्ति नहीं है. उन्होंने तब कहा, ‘सभी का खून है शामिल यहां की मिट्टी में, किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है.’

राहत इंदौरी का जाना इस बुरे साल को बदतर बना गया है.

उनके जाने का ग़म उस नौजवान शख्स को सालेगा, जिसके दिल में मुहब्बत अंगड़ाई ले रही हो, हर उस किशोर को खलेगा जिसके मन में खिलंदड़ापन जाग रहा हो, हर उस संजीदा शख्स उनकी कमी महसूस करेगा, जिसे अपनी बात कहने के लिए एक बौद्धिक तरीका चाहिए होगा.