गीतकारों को आखिर उनका क्रेडिट क्यों नहीं मिलता!

हिंदी फिल्म उद्योग में गीतकारों को क्रेडिट देने में कोताही बरती जाती है

लाल बहादुर शास्त्री के साथ कवि प्रदीप
लाल बहादुर शास्त्री के साथ कवि प्रदीप
बॉलीवुड के 15 जाने माने गीतकारों ने उन्हें क्रेडिट देने को बड़ा सोशल अभियान हाल में चलाया. जानी-मानी ऑडियो स्ट्रीमिंग कम्पनियों से अपने लिखे पर क्रेडिट की मांग करते हुए इनकी तरफ़ से वीडियो भी बनाया गया.
इस गाने के जरिए वो मांग कर रहे हैं कि वो उनके लिखे गाने में उनको क्रेडिट दिया जाए. इन कलाकारों का कहना है कि ‘हमारी चाहत है कि हमें हमारे काम के लिए सम्मान मिले’.
भावुक अपील करने वाले इस गाने को कौसर मुनीर, वरुण ग्रोवर और स्वानंद किरकिरे ने मिलकर लिखा.
आज के दौर के इन सुपरिचित गीतकारों का कहना है कि हर म्यूजिक कंपनी का यूट्यूब चैनल है और इन पर जो गाने डाले गए हैं उनमें से सैकड़ों गानों में गीतकारों के गलत नाम लिखे गए हैं या फिर लिखे ही नहीं गए हैं.
गीतकारों के इस मुहिम से बात निकल कर आई कि लोगों को उनकी शक्लें याद रहें या न रहें मगर नाम तो याद रहना चाहिए. क्योंकि यह सारी लड़ाई नाम की ही है. उनकी मांग में दम भी है क्योंकि हम आप जहां भी गाने सुनते हैं म्युजिक प्लेफॉर्म्स, एप्स या फिर यूट्यूब चैनल पर वहां पर गीतकार का क्रेडिट होता है.
लिखने वाले को हम उनके क्रेडिट से ही पहचान पाते हैं. हमें उनकी शक्ल याद नहीं होती. इसलिए क्रेडिट देना तो बेसिक है.
हिन्दी फ़िल्मो में गीतकारों का चलन पहली सवाक फ़िल्म ‘आलम-आरा’ से अस्तित्व में आया. आज यह परम्परा-सी बन गयी है. आर्देशिर ईरानी ने अपने साहसिक उद्यम से भारतीय सिनेमा मे ‘संगीतकारों’ एवं गीतकारों के लिए नए अवसर हमेशा के लिए खोल दिए.
गीत-संगीत की यह परम्परा उस समय से आज तक बरकरार है एवं हर सुपरहिट गीत और फ़िल्म अल्बम से मज़बूत हो रही है.
फ़िल्म की पटकथा में परिस्थितियों के प्रति पात्रों की ‘काव्यात्मक अभिव्यक्ति’ को गीतों के माध्यम से विस्तार मिला. इस तरह एक प्रकार से ‘सिनेमा’ में गीत-संगीत ‘गीतकार’ जैसे रचनाधर्मी व्यक्तित्व के श्रम का सुपरिणाम है.
उर्दू परिदृश्य से आए जानकारों का फ़िल्म गीत लेखन की ओर रुझान रहा. एक समय में यह चलन-सा हो गया कि उर्दू से संबंध रखने वाले ही इस क्षेत्र मे कामयाब होते थे. इस भाषा ने फ़िल्मों को अनेक गीतकार दिए, पर सभी उल्लेखनीय व महत्त्वपूर्ण गीतकार उर्दू से ही आए ऐसा नहीं है.
प्रगतिशील विचारधारा रखने वाले हिन्दी के जानकार गीतकार भी बेहद सफ़ल रहे. कवि प्रदीप, भरत व्यास, नीरज, योगेश, पंडित नरेन्द्र शर्मा इसके उदाहरण हैं.
गीतकार का सृजन–धर्म कहानी, पात्र, परिस्थिति का निरीक्षण व सूक्ष्म निरीक्षण से प्रेरित होकर अभिव्यक्त होता है. कोई गीतकार किसी बात को कितनी ‘दक्षता’ से व्यक्त करेगा, यह पूर्णतया: उसकी व्यक्तिगत क्षमता पर निर्भर करता है.  सुंदर अभिव्यक्तियों से पूर्ण गीत किसी मामूली सी फ़िल्म संगीत को यादगार बना देता है.
हिन्दी सिनेमा में दर्जनों ऐसे उदाहरण हैं जहां गीत-संगीत तो ‘सुपरहिट’ रहा, किन्तु फ़िल्मों ने निराश किया. यह उदाहरण गीत-संगीत को प्रतिष्ठा प्रदान कर यह स्थापित करते हैं कि बेहतरीन संगीत कभी निराश नहीं करता.
कोई सुपरहिट गीत सुनकर श्रोता फ़िल्म के बारे मे जानने को उन्मुख होते हैं. फ़िल्म प्रचारक भी इस बात को जानते हैं कि गीत दर्शकों को आकर्षित करेंगे. फ़िल्म प्रमोशन मेंं गीतों को महत्त्व मिला, विशेषकर रेडियो- टीवी में फ़िल्म के गीतों के साथ उसकी मार्केटिंग की गयी.
फ़िल्म वालों ने टीवी प्रमोशन में गीत की ‘प्रस्तुति’ को ‘गुणवत्ता’ से अधिक महत्त्व दे दिया. गानों में फ़ूहड़ता छाने लगी फ़िर सब कुछ ठीक न हुआ. ऐसे हालात में फ़िल्म-वालों को कल्याण की राह गुणवत्ता की शरण में मिली. गीतकारों ने अपने कलम के जादू से गीत-संगीत का बेड़ा पार कर फ़िल्म –संगीत मे लोगों की रुचि फ़िर से जगाई.
गुलज़ार, जावेद अख्तर ने टीवी युग को चुनौती देकर श्रेष्ठ गीतों की रचना की. अपनी दूसरी पारियां शुरू कर आज भी मोर्चे पर कायम हैं.
वह गुज़रा स्वर्णिम दौर फ़िर से जैसे महत्त्वपूर्ण हो गया, एक ऐसा समय जब शैलेन्द्र, शाहिर, मजरुह, हसरत, शकील बदायुनी, राज़ा मेंहदी अली खान, कैफ़ी आज़मी, नीरज, भरत व्यास, आनंद बक्शी,गुलज़ार, योगेश के गीतों ने जन्म लिया. ये अनमोल गीत आज भी उतने ही लोकप्रिय और बीते समय की पहचान हैं.
पुराने गीतों का जादू कल की तरह बरकरार है, आज भी हमें संगीत-प्रेमी मिल जाएंगे जिन्हे नए गाने से ज़्यादा वही गीत पसंद है.
तकनीकी सुविधाओं के स्तर पर बात करे तो सन 80 के आस-पास बहुत से लोगों के पास टेप या कैसेट रिकार्डर जैसे आधुनिक उपकरण नहीं थे, वह रेडियो पर फ़िल्म गीत-संगीत का आनंद लेते थे. इसके पूर्व स्थिति इस जैसी भी नहीं थी.
50-60 के दशक में रेडियो होना भी एक बड़ी बात थी. हिन्दी संगीत का ‘स्वर्णिम’ युग रेडियो पर लोकप्रिय हुआ. जिस संगीत को लोगों ने रेडियो पर सुनकर याद कर लिया हो वह कितना प्रभावी रहा होगा यह स्पष्ट है.
गीतकार कमर जलालाबादी, भरत व्यास, हसन कमाल, एस.एच. बिहारी, शहरयार, असद भोपाली, पंडित नरेन्द्र शर्मा, गौहर कानपुरी, पुरुषोत्तम पंकज, शेवान रिज़वी, अभिलाष, सरस्वती कु दीपक, रमेश शास्त्री, बशर नवाज और खुमार बाराबंकवी जैसी शख्शियतें विमर्श का विषय नही हैं. इन गीतकारों ने फ़िल्म संगीत को एक से बढ़कर एक गीतों की सौगात दी है.
गीतकार कमर जलालाबादी ने अपने सिने कैरियर में बहुत सुंदर गीतो की रचना की,  ‘दोनो ने किया था प्यार मगर’ (महुआ) ‘आईए मेहरबान’ (हावडा ब्रिज), मैं तो एक ख्वाब हूं (हिमालय की गोद में) जैसे हिट गीत लिखे.
हिन्दी से फ़िल्म में आए भरत व्यास के गीतो में हिन्दी कविताई का प्रयोग देखा गया. ‘यह कौन चित्रकार है’ (बूंद जो मोती बन गई), ‘ज्योत से ज्योत जगाते चलो’ (संत ज्ञानेश्वर), ‘आ लौट के आजा मेरे मीत’ (रानी रूपमती) जैसे लोकप्रिय गीतों के रचनाकार भरत व्यास पर कम लिखा गया है.
शायर-गीतकार हसन कमाल को ‘निकाह’ के दिलकश गीतों के लिए याद किया जाता है, पर उनके ‘ऐतबार’ और ‘आज की आवाज़’ के लिए लिखे गीत भी कमतर नही हैं. हसन कमाल को फ़िल्म ‘आज की आवाज़’ के लिए फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड भी मिला.
इसी तरह गुज़रे ज़माने के एस.एच. बिहारी (शमसुल हुदा बिहारी) का नाम विमर्श से दूर है. संगीतकार ओ.पी. नैयर- एस एच बिहारी-आशा भोंसले की टीम ने यादगार गीत दिए.
शमसुल हुदा के गीत ‘कजरा मोहब्बत वाला (किस्मत), ज़रा हौले-हौले चलो मेरे बालमा (सावन की घटा) बेहद लोकप्रिय हैं.
शमसुल हुदा की तरह बीते दौर के ही पंडित नरेन्द्र शर्मा भी विमर्श से दूर हैं. गीतों से हिन्दी कविताई को प्रतिष्ठत करने वाले नरेन्द्र जी का गीत ‘यशोमती मैय्या से पूछे नंदलाला’ (सत्यम, शिवम, सुंदरम) भक्ति गीतों मे आज भी लोकप्रिय है. पर गीत के पीछे खड़े व्यक्तित्व को भुला दिया गया.
मशहूर शायर शहरयार ने मुज़फ़्फ़र अली की ‘उमराव जान’ के लिए शानदार गीत लिखे. लेकिन आगे चलकर बहुत कम फिल्मों के लिए लिखा. कहा जाता है कि उन्होने ‘अर्जुमंद’ के लिए भी गीत लिखे, अफ़सोस फ़िल्म ‘रिलीज़’ न हो सकी.
शहरयार के तरह शेवान रिज़वी और बशर नवाज़ ने सीमित गाने लिखे, पर इनका फ़न काबिले तारीफ़ था. गीतकार बशर नवाज़ का ‘करोगे याद तो हर बात याद आएगी’ (बाज़ार) और शेवान रिज़वी का ‘दिल की आवाज़ भी सुन’ (हमसाया) जैसे गाने याद आते हैं.
रमेश शास्त्री, पुरुषोत्तम पंकज, सरस्वती कु दीपक, अभिलाष, गौहर कानपुरी और खुमार बाराबंकवी जैसे गीतकारों के बारे मे संगीत-प्रेमी ‘अनजान’ से हैं. इन कलम के जादुगरों ने हालांकि कुछ ही गीत लिखे पर सुनने लायक लिखे.
‘हवा में उड़ता जाए मोरा लाल दुपट्टा मलमल का’ (रमेश शास्त्री) ‘चांद जैसे मुखड़े पे बिंदिया सितारा’ (पुरूषोत्तम पंकज), तुम्हे गीतों में ढालूंगा, सावन को आने दो (गौहर कानपुरी), ‘माटी कहे कुम्हार से’ (सरस्वती कु दीपक), ’इतनी शक्ति हमें देना दाता’ (अभिलाष), ’साज़ हो तुम आवाज़ हूं मै’ (खुमार बाराबंकवी) और बहुत से ऐसे फ़नकार जो संगीत की महफ़िल से दूर गुमनामी का जीवन जी रहे हैं.