शैलेंद्र की मौत पर राज कपूर ने कहा, दिल का सितारा डूब गया

राज कपूर के सिनेमाई भावनाओं को जिस शख्स ने अपने लफ्ज गीतों के रूप में दिए, जब वह न रहा तो राज कपूर ने क्या लिखा था उनके बारे में. फिल्मफेयर में छपे उस ओपन लेटर का हिंदी अनुवाद पढ़ें

राज कपूर की टीम के अन्य सदस्यो के साथ गीतकार शैलेंद्र (सबसे दाएं)
राज कपूर की टीम के अन्य सदस्यो के साथ गीतकार शैलेंद्र (सबसे दाएं)

शैलेन्द्र के निधन पर शो मैन राजकपूर के उद्गारः

(अंग्रेजी से अनुवादः सैयद एस. तौहीद)

दिल का एक सितारा चला गया है। ठीक नहीं हुआ। आपके बगिया के खूबसूरत गुलाबों में से कोई एक भी जाए, तकलीफ होती है। अजीज के लिए यह आंसू भी कम पड़ रहें हैं।

किस कदर सादा सच्चा बेखुदगर्ज़ इंसान था। इस शख्सियत का एक अहम हिस्सा। अब जबकि वो नहीं रहा… हमेशा के लिए चला गया, याद में आंसू आएंगे। गुजरे जमाने को मुड़कर देखता हूं तो चालीस का दशक आंखों में तारी हो जाता है।

ख्वाबों की दुनिया… ख्वाब जिन्हें पूरा करना था। इरादे की बुलंदियों से ताकत मिल रही थी।

उस जमाने में ‘आग’ पर काम कर रहा था। पृथ्वी थियेटर से थोड़ा ही आगे इप्टा का कार्यालय था। एक बेबाक आदर्श युवा कवि से मिलना शायद लिखा था। मुलाकात के उस दिन को भुला नहीं सकता। मिलकर जल्द ही समझ गया कि मेरी फिल्म के थीम गाने के साथ केवल यही व्यक्ति न्याय कर सकेगा।

मैंने फिल्म के लिए लिखने को कहा। वह कविताओं की कीमत पाने के लिए लिखा नहीं करता था। फिल्मवालों में खासी दिलचस्पी भी नहीं देखी थी। एक समझ से ठीक भी लगा… क्योंकि रेलवे में काम करके ठीक-ठाक तनख्वाह मिल जाती थी। मुंबई के परेल में एक ठिकाना भी बना लिया था।

वह मुल्क के मुस्तकबिल के बारे सोचने वाला – क्रांतिकारी विचारों का शख्स था।

उसने गांधी जी के आह्वान पर सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया था। नेहरू के समाजवादी चिंतन- मार्क्सवादी विचारों का प्रवक्ता बन क्रांति की ज्योति जलाई।

लेखन में मार्क्सवादी प्रगतिशील विचारों का तेवर था। कवि के इंकार को स्वीकार कर लिया। लेकिन मुलाकात का प्रभाव अब भी साथ था।

मेरी मुलाकात शंकरदास केसरीलाल उर्फ शैलेन्द्र से हुई थी। उस वक्त थोड़ा निराश जरूर हुआ… फिर भी उस लेखक का मुरीद था। हमारे प्रोडक्शन ने आगे ‘बरसात’ पर काम शुरू किया।

उस जमाने में महालक्ष्मी में हमारी एक सिनेलेब हुआ करती थी। शैलेन्द्र एक रोज़ वहां किसी जरूरत पड़ने पर पहुंचे। रूपए की सख्त जरूरत थी। उन्होंने कहा कि मुझे अभी आपकी सहायता चाहिए, बदले में कोई काम ले लेना।

उस वक्त मेरे मन में बरसात का मुखड़ा ‘बरसात में हमसे मिले तुम साजन तुम से मिले हम’ था। हमने उस फिल्म पर साथ काम किया। वह एक मधुर रिश्ते की शुरुआत थी, तब से आज इस मोड़ तक हम साथ रहे।

मृत्यु ने मुझसे मेरे अजीज को हमेशा के लिए दूर कर दिया है। अब वो नहीं रहा…

उस शख्स की महान धरोहर आंखों के सामने है। क्या लोगों ने कभी रुककर सोचा कि सोवियत रूस व दुनिया में राजकपूर को मिली शोहरत में शैलेन्द्र का योगदान क्या था? उन गीतों जिसे दुनियावालों ने गुनगुनाया ‘आवारा हूं’ लेकर ‘मेरा जूता है जापानी’ या ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के गीत ‘मेरे नाम राजू घराना अनाम’ अथवा ‘होठों पे सच्चाई रहती है’ सरीखे गीतों को किसने लिखा?

माध्यम को लेकर शैलेन्द्र की समझ में बदलाव एक स्वागतमय मोड़ था। सिनेमा में भी आम आदमी की तड़प शायद उन्हें नजर आई थी।

कविता लिखने वाले शख्स ने फिल्मों को भी एक सशक्त माध्यम के रूप में स्वीकार कर लिया और खूबसूरत अंदाज में… एक सितारा आसमान पर बुलंद हुआ।

आम आदमी को एक सिनेमाई अभिवयक्ति देने का सराहनीय काम किया था। मिसाल के लिए ‘जिस देश में गंगा बहती है’ का गीत ‘कुछ लोग ज्यादा जानते हैं, इंसान को कम पहचानते हैं’ को याद करें। शाट्स व दृश्यों के मुताबिक से गीतों के बोल सटीक थे।

राजकपूर की छवि में शैलेन्द्र का निर्णायक हिस्सा था। आम आदमी का राजकपूर उनकी कविताई के अक्स से बना था।

आर.के. स्टुडियो के लोगों की समझ में फिल्म निर्माण में कदम रखने की बड़ी भूल ने गीतकार की जान ली। हुआ यही था… ‘तीसरी कसम’ के साथ जो हुआ उसने शैलेन्द्र की असमय मौत तक पहुंचा दिया था।

फिल्म व्यवसाय की बारीकियों को ठीक से समझे बिना वह निर्माण में डूब गए। रूपया डूब गया… फिल्म फिर भी अधूरी थी। मुकेश-शंकर जयकिशन के सहयोग से फिल्म किसी तरह पूरी होकर रिलीज हुई।

यह हमारी टीम की एकता को एक महान श्रद्धांजलि थी। मुश्किलों के बावजूद शैलेन्द्र ने फिल्म को पूरा किया। आज भी जुबान पर दर्ज गीत ‘तीसरी कसम’ को महानता की पंक्ति में ला खड़ा करता है।

मुझे याद आ रहा है कि एक रात आर.के. स्टुडियो में फिल्म की प्राईवेट स्क्रीनिंग थी। उपस्थित लोगों से फिल्म के ऊपर मत देने को कहा गया। ज्यादातर लोगों ने महसूस किया कि फिल्म को बाक्स-ऑफिस की थोडी फिक्र करनी चाहिए।

सभी मतों को पढ़कर भी गीतकार ने अपने काम में बदलाव से मना कर दिया। मेरी डायरी में शैलेन्द्र ने लिखा ‘मेरे पास वो दो पंक्तियां अब भी शेष बची—फिल्म अपने हिसाब से बनाऊंगा’।

फिल्म से जुडे व्यावसायिक रिश्ते ने शैलेन्द्र को बड़ी पीड़ा दी थी। शरीर व आत्मा गहरे रूप से दुखित हुए थे। फिर भी दिल को छू जाने वाले गीत लिखे. फिर मेरे अगली फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के लिए भी गीत लिखे। उसकी गहरी भावपूर्ण थीम पंक्तियों को रचा।

यह पंक्तियां बहुत दिनों से मेरे मन में थी… लेकिन शैलेन्द्र मिल नहीं रहे थे। एक रात मकान पर वो खुद आ पहुंचे। थीम लाइन को लिपिबद्ध करके नीचे अपना दस्तखत कर दिया। संकेत मिला कि ‘जीना यहां मरना यहां, इसके सिवा जाना कहां’ की अमर पंक्तियां लिखी जा चुकी थीं।

खुदा के सामने झोली फैलाए खड़ा अपने अजीज के जाने का मातम कर रहा हूं। वापसी की दुआएं कर रहा हूं… न सुनने वाले को आवाज दे रहा हूं। मेरा अजीज मुझे अधूरा छोड़ गया है। मेरा दिल तड़प रहा… उसे ढूंढ रहा है.

सौजन्यः फिल्मफेयर आर्काइव

(राजकपूर ने शैलेन्द्र के निधन पर यह बातें अपने ओपन लेटर में कही थी. इसे फिल्मफेयर पत्रिका ने प्रकाशित किया था. )