शख्सियतः मीना कुमारी रील लाइफ में ट्रेजिडी क्वीन के साथ रीयल लाइफ में बेहतरीन शायरा भी थीं

मीना कुमारी ने अपनी निजी ज़िंदगी में दौलत और शोहरत तो खूब हासिल की, लेकिन शायद कभी भी उन्हें सच्ची मुहब्बत या हमदर्दी हासिल नहीं हुई.

मीना कुमारी बेहतरीन शायरा भी थीं
मीना कुमारी बेहतरीन शायरा भी थीं

1963 में बॉलीवुड के प्रतिष्ठित फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में एक इतिहास रचा गया था, जिसकी मिसाल आज तक बॉलीवुड में दूसरी नहीं मिलती. दसवें फिल्मफेयर अवॉर्ड्स के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री कैटेगरी में तीन फिल्मों की दावेदारी थी- ‘साहिब बीबी और गुलाम’, ‘आरती’ और ‘मैं चुप रहूंगी’.

खास बात ये थी कि इन तीनों ही फिल्मों में मुख्य अभिनेत्री थीं मीना कुमारी, और अंत में उन्हें अवॉर्ड मिला ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में निभाए छोटी बहू के किरदार के लिए.

लेकिन बाकी दोनों फिल्मों, ‘आरती’ और ‘मैं चुप रहूंगी’ में मीना कुमारी के निभाए गए किरदारों में किसी की भी अहमियत कम नहीं थी.

अगर आप इन तीनों फिल्मों के शीर्षक देखें तो एक चीज़ नज़र आएगी कि या तो इनमें महिला किरदारों को प्रधानता दी गई है या कम से कम महिला का किरदार बराबरी का ज़रूर है.

और मीना कुमारी ने अपने पूरे करियर में 92 फिल्मों में काम किया और उनमें से एक बड़ी तादाद वैसी फिल्मों की रही, जिनमें महिला किरदार प्रमुखता से उभरकर सामने आती थीं.

बॉलीवुड में मीना कुमारी की अहमियत और शख्सियत को याद करने वाले भले ही आज ना मिलें, लेकिन 1952 से लेकर 1972 में अपनी मौत तक मीना कुमारी ने एक से बढ़कर एक किरदार निभाकर उन्हें हमेशा-हमेशा के लिए यादगार बना दिया.

अगर मीना कुमारी आज ज़िंदा होतीं तो बीते 1 अगस्त को वो 87 साल की हो चुकी होतीं. लेकिन केवल 38 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह देने वाली मीना आज भी उन फैन्स और शौकीनों के दिलों में ज़िंदा हैं, जिन्हें अच्छी फिल्मों की पहचान है.

1 अगस्त, 1933 को महजबीन बानो के नाम के साथ पैदा हुईं मीना कुमारी का फिल्मी करियर केवल 4 साल की उम्र में बाल कलाकार के रूप में शुरू हो गया था, जब वो बेबी मीना के नाम से पर्दे पर दिखती थीं.

33 साल लंबे अपने करियर में उन्होंने अशोक कुमार, दिलीप कुमार, प्रदीप कुमार, शम्मी कपूर, राज कपूर, गुरुदत्त और राजकुमार जैसे सभी नामी अभिनेताओं के साथ काम किया.

मीना कुमारी ने अपने करियर के शुरुआती दौर में पौराणिक कथाओं या फैंटेसी पर आधारित ढेरों फिल्में कीं, जिनमें ‘वीर घटोत्कच’, ‘श्री गणेश महिमा’, ‘हनुमान पाताल विजय’ और ‘अलादीन और जादुई चिराग’ जैसी फिल्में शामिल थीं. लेकिन उन्हें पहली बार बड़ी कामयाबी मिली- 1952 में आई फिल्म ‘बैजू बावरा’ से.

इस फिल्म में गौरी का किरदार निभाकर उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी जीता और लोगों की नज़रों में भी आईं. और, जब अगले ही साल बिमल रॉय की ‘परिणीता’ में उन्होंने ललिता बनकर लगातार दूसरा फिल्मफेयर अवॉर्ड हासिल किया, तब लोगों को मीना कुमारी के अभिनय के अलग-अलग रंगों का अंदाज़ा लगा.

उसके बाद से तो उन्होंने ‘शारदा’, ‘यहूदी’, ‘दिल अपना और प्रीत पराई’, ‘साहिब बीबी और गुलाम’, ‘आरती’, ‘दिल एक मंदिर’, ‘चित्रलेखा’, ‘काजल’, ‘मेरे अपने’, ‘मझली दीदी’ और ‘पाकीज़ा’ जैसी फिल्मों में अपने अभिनय के ना जाने कितने रंग बिखेरे.

साहित्य की भाषा में कहूं तो उनके अभिनय में साहित्य के सभी रस थे, लेकिन जिस एक रस की प्रमुखता थी- वो था करुण रस.

मीना कुमारी ने ढेरों ऐसी भूमिकाएं निभाईं, जिनमें उनके किरदार का दुखद अंत होता था या फिर उसे पूरी फिल्म में दुख झेलने के बाद अंत में ख़ुशी मिल पाती थी. बैजू बावरा की गौरी, परिणीता की ललिता, साहिब बीबी और गुलाम की छोटी बहू, मैं चुप रहूंगी की गायत्री और पाकीज़ा की साहिबजान ऐसी ही कुछ मिसालें हैं.

आज भी मीना कुमारी पर फिल्माए गीतों की बात चलती है तो ‘ना जाओ सैंया, छुड़ा के बैयां…’, ‘अजीब दास्तां है ये…’, ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना…’जैसे गीत सबसे पहले याद आते हैं.

मशहूर पत्रकार और लेखक विनोद मेहता ने मीना कुमारी की बायोग्राफी में लिखा है, “मुझे लगता है कि मीना कुमारी की जो तस्वीर आसानी से दिमाग में आती है, वो गुरु दत्त की साहिब बीबी और गुलाम से है। फिल्म के उन दृश्यों को कभी भुलाया नहीं जा सकता, जहां वो अपने अय्याश और व्यभिचारी पति के सामने गिड़गिड़ाती नज़र आती है. पति उन्हें शराब पिलाने की कोशिश कर रहा है, जिस चीज़ से वो नफ़रत करती है, लेकिन इस उम्मीद में पी लेती है कि शायद उसकी मदहोशी उसके पति को कोठे पर जाने के बजाय उस रात घर पर रोक ले. ‘बेचारी’ शब्द मीना कुमारी के साथ जुड़ा नज़र आता है.”

मीना कुमारी के साथ ट्रेजडी क्वीन की ये इमेज सिर्फ रूपहले पर्दे पर नहीं, उनकी असली ज़िंदगी में भी बरकरार रही.

अपनी निजी ज़िंदगी में दौलत और शोहरत उन्होंने खूब हासिल की, लेकिन शायद कभी भी उन्हें लंबे समय तक सच्ची मुहब्बत या हमदर्दी हासिल नहीं हुई. लेखक, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर कमाल अमरोही के साथ उन्होंने निकाह भी किया था, लेकिन ये रिश्ता भी 1952 में शुरू होकर 1964 में ख़त्म हो गया था.

इसके बाद मीना कुमारी ने सुकून की तलाश में ख़ुद को शराब में डुबो लिया, जो आख़िरकार उनकी मौत की वजह भी बना. लेकिन अपनी मौत से पहले उन्होंने अपने शौहर रह चुके कमाल अमरोही की फिल्म पाकीज़ा पूरी की, और साहिबजान को सबके दिलों में ज़िंदा कर गईं.

कम लोग ही जानते हैं कि मीना कुमारी ख़ुद एक अच्छी शायर थीं. एक बार उन्होंने अपनी ज़िंदगी के बारे में एक शेर कहा था-

तुम क्या करोगे सुन कर, मुझ से मेरी कहानी

बेलुत्फ ज़िंदगी के किस्से हैं फीके-फीके…

मीना कुमारी ने साल 1971 में अपनी नज़्मों का एक एलबम भी जारी किया था जिसका नाम है- आई राइट, आई रिसाइट. इन नज़्मों को मीना कुमारी ने ख़ुद लिखा और गाया है. उन्होंने पहले ही तय कर दिया था कि उनकी कब्र पर क्या लिखा जाएगा… मीना कुमारी की कब्र पर लिखा है- वो अपनी ज़िंदगी को, एक अधूरे साज़, एक अधूरे गीत, एक टूटे दिल के साथ, बिना किसी अफसोस के ख़त्म कर गई”. 

इन अल्फाज़ के जरिए शायद वो दुनिया को बताना और याद दिलाना चाहती थीं कि उनकी ज़िंदगी में कमियां ज़रूर रह गईं, लेकिन मौत के वक़्त कोई अफ़सोस नहीं था. और शायद वो सही भी थीं क्योंकि अगर मैं फिल्म ‘आनंद’ के एक डायलॉग को उधार लूं तो यही कहना चाहूंगा कि ज़िंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए, और मौत के समय भले ही मीना कुमारी की उम्र छोटी थी, उनकी ज़िंदगी बड़ी, नहीं-नहीं, बहुत बड़ी थी.

शुक्रिया महजबीन साहिबा, हमारी फिल्मों को अपनी अदाकारी से चमकाने के लिए.

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