मैथिली बोलनेवालों की बड़ी संख्या के बाद भी ठिठका रहा है मैथिली फिल्मों का सफर

करोड़ो मैथिली बोलने वालों के बावजूद जम नहीं पाया मैथिली फिल्मोद्योग

मैथिली सिनेमा में बहुत संभावनाएं हैं
मैथिली सिनेमा में बहुत संभावनाएं हैं

मैथिली भाषा की फिल्में जरूर कम बनी हैं लेकिन इन फिल्मों में मिथिला के समृद्ध साहित्य, व्यवहार और संस्कार की छौंक हमेशा दिखती रही है.

यह बात और है कि मैथिली फिल्मों को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान नहीं मिल पाई है, लेकिन इसका इतिहास गौरवशाली रहा है जिसकी शुरुआत महान साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु के ‛कन्यादान’ फिल्म में संवाद लेखन से होती है।

यह पहली मैथिली फिल्म मैथिली साहित्य के बड़े कथाकार हरिमोहन झा की किताब पर आधारित थी. इस फिल्म की पटकथा नवेंदु घोष ने लिखी थी।

फिल्म के निर्माता-निर्देशक फणि मजूमदार थे। इस फिल्म में तरुण बोस (नायक), चाँद उस्मानी, पद्मा चटर्जी, टुनटुन, दुलारी दाई और ब्रज किशोर सिंह ने अभिनय किया था।

मैथिली के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं कवि चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ भी इस फिल्म में महत्वपूर्ण भूमिका में दिखाई दिए थे।

फिल्म में दुलाल सेन और विंध्यवासिनी देवी के संगीत निर्देशन में विद्यापति के दो गीतों को चन्द्राणी मुखर्जी, ऊषा मंगेशकर और कमोल बरोट ने स्वर दिया था। जबकि एक गीत प्रसिद्ध गायक मन्ना डे ने गाया था।

फिल्म कन्यादान 1965 में प्रदर्शित हुई हालांकि इससे तीन वर्ष पहले ही ‘ममता गाबय गीत ‘ फिल्म से मैथिली सिनेमा का निर्माण शुरू हो चुका था।

ममता गायब गीत मैथिली भाषा में बनने वाली यह पहली फ़िल्म थी जिसमें प्यारे लाल सहाय, कमलनाथ सिंह ठाकुर, त्रिदीप कुमार और अजरा मुख्य कलाकार थे।

सन् 1962 में ममता गायब गीत फिल्म का मुहूर्त रखा गया। फिल्म जब 80 फीसद बनकर तैयार हो गई तो निर्माताओं के बीच मतभेद हो गया और ममता गायब गीत ठप हो गई.

कुछ वर्षों बाद गीतकार रवीन्द्र नाथ ठाकुर (गुरुदेव टैगोर नहीं) ने निर्माताओं और भागीदारों के बीच सुलह कराया. फिर भी इस फिल्म को पर्दे तक आने में 19 साल लग गए। हालांकि, इस फिल्म का नाम पहले ‘नैहर मोर भेल सासुर’ रखा गया था।

फिल्म के निर्माता महंत मदन मोहन दास और केदार नाथ चौधरी थे. लेकिन बाद में उदय भानु सिंह और निर्देशक सी. परमानंद इसके निर्माता हुए. ये वही परमानंद थे जिनका राज कपूर की क्लासिक फिल्म ‘तीसरी कसम’ में चाय की दूकान पर मैथिली में संवाद था।

त्रिदीप कुमार और अजरा अभिनीत ‘ममता गाबय गीत’ के ‘भरि नगरी में सोर, बउआ मामी तोहर गोर’, ‘कनी बाजू अमोल मोर भउजी कहू लेब कोन गहना’ जैसे गाने पहले ही सुपरहिट होकर मिथिलांचल के घरों में गूंजने लगे थे।

फिल्म की शूटिंग राजनगर में हुई. राजेन्द्र कुमार के डिंपल स्टूडियो और सुनील दत्त के अजन्ता स्टूडियो में भी इसके कई हिस्सों की शूटिंग हुई थी।

1964 में सीतामढ़ी से प्रकाशित वैदेही पत्रिका में छपे लेख के अनुसार ‛ममता गाबय गीत’ उस समय बन रही मैथिली की तीसरी फिल्म थी. हालांकि अन्य दो फिल्में ‛गोनू झा’ और ‘अपराजिता’ आज तक रिलीज नहीं हुई हैं।

मैथिली  सिनेमा के इतिहास में प्रदर्शित होने वाली पहली रंगीन फिल्म ‘जय बाबा बैद्यनाथ’ थी. जिसमें विश्वजीत, सोमा सालकर, विपिन गुप्ता एवं त्रिलोचन झा कलाकार थे।

दरभंगा के प्रह्लाद शर्मा इस फिल्म के निर्माता-निर्देशक एवं गीतकार थे।

1979 में प्रदर्शित इस फ़िल्म में देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथधाम की महिमा को दिखाया गया था. भक्ति आधारित होने के बावजूद फिल्म ज्यादा कमाल नहीं दिखा सकी।

इसके बाद अगले 24 वर्षों तक एक भी मैथिली फिल्म नहीं बनी और ना ही किसी ने इस दिशा में प्रयास किया।

कुछ लोग यह मानने लगे थे कि मैथिली फिल्में शायद अब कभी नहीं बन पाएंगी. लेकिन 1999 में ‛मिस्टर इंडिया’ और बीआर चोपड़ा के ‘महाभारत’ में काम कर चुके चर्चित अभिनेता मुरलीधर ने दहेज प्रथा से समाज पर पड़ने वाले असर की कहानी पर आधारित एक फिल्म ‘सस्ता जिनगी महग सेनुर’ बनाई.

इस फिल्म के निर्माता मुरलीधर और बालकृष्ण झा थे। इस फिल्म के मुख्य कलाकार ललितेश झा, रीना और रूबी अरुण थे.

दहेज प्रथा जैसी कुरीति पर बनी इस फ़िल्म को दर्शकों ने खूब सराहा। हालांकि, फिल्म के एक संवाद (जेनऊ के साथ-साथ कंधा पर हल भी उठेबाक चाही) पर ब्राह्मणों के एक बड़े समूह ने आपत्ति भी जताई थी। इसके बावजूद, 34 लाख लागत की इस फ़िल्म ने 3.5 करोड़ की कमाई की थी! सन् 2000 में प्रदर्शित इस फ़िल्म की पूरी शूटिंग मिथिला में ही हुई।

इसके बाद आऊ पिया हमर नगरी (2001), सेनुरक लाज (2004), कखन हरब दुख मोर (2005), दुलरुआ बाबू (2006), सिंदूरदान (2008), पिया संग प्रीत कोना हम करबै (2010), संजना के अंगना में सोलह सिंगार (2011) जैसी फिल्में आई।

इनमें ज्यादातर फिल्में खराब निर्देशन और धीमी कहानी की वजह से पिट गईं।

‛कखन हरब दुख मोर’ मैथिली भाषा के आदिकवि विद्यापति पर आधारित फिल्म थी जिसमें फूल सिंह ने विद्यापति का दमदार किरदार निभाया था। फ़िल्म को लोगों ने काफी पसन्द भी किया। लेकिन थियेटर नहीं मिलने के कारण यह फिल्म ज्यादा कमाई नहीं कर पाई।

हालांकि बाद में टी सीरीज ने ऑडियो और वीडियो कैसेट जारी किए, जिसे लोगों ने हाथों-हाथ लिया।

2011 में ही आई फ़िल्म ‛संजना के अंगना में सोलह सिंगार’ के अभिनेता राहुल सिन्हा बताते हैं कि मैथिली फिल्म को इंडस्ट्री के रूप में स्थापित करने के लिए पेशेवर प्रोड्यूसर और निर्देशक की आवश्यकता है। इसकी कमी के कारण मैथिली की कई अच्छी फिल्में सही तरह से लोगों तक नहीं पहुंच पाईं।

मैथिली फिल्मों के विकास में न तो सरकार ने सहयोग किया और न ही मैथिलीभाषी दर्शकों ने। इसके बावजूद फिल्मकारों ने हौसला नहीं खोया। नतीजतन, निर्देशक विकास कुमार झा ने मिथिलांचल की सामाजिक व्यवस्था पर हास्य एवं कटाक्ष करती हुई पहली डिजिटल फ़िल्म ‛मुखिया जी’ बनाई।

मुखियाजी को दर्शकों ने खूब सराहा था।

2011 में प्रदर्शित इस फ़िल्म के निर्माता रुपेश कुमार झा थे। सुभाष चन्द्र मिश्र, रोशनी झा, रामसेवक ठाकुर, विक्की चौधरी और ललन झा फिल्म के मुख्य कलाकार थे। फिल्म में हास्य व्यंग्य के साथ समाज में फैली हुई कुरीति, भ्रष्टाचार, प्रौढ़ शिक्षा, साफ़-सफाई, स्वास्थ्य, प्रतियोगी भावना, ऐतिहासिक दृष्टिकोण, औद्योगीकरण, सामाजिक विकास जैसे मुद्दे एक साथ समेटे गए थे.

घोघ में चाँद, हाफ मर्डर, सौतनक बेटी, सौतिन, इजोत, प्रेमक बरसात, माई के ममता, प्रीत के बाजी, राखी क जैसी कई फिल्में बनी तो लेकिन कोई कमाल नहीं कर पाई।

अक्टूबर, 2019 में रिलीज हुई कुशहा बाढ़ त्रासदी पर बनी फिल्म ‛लव यू दुल्हिन’ पहली मैथिली फिल्म थी जिसे मल्टीप्लेक्स में दिखाया गया। इस फ़िल्म के अभिनेता अमिय कश्यप बताते हैं कि दरभंगा, मधुबनी सहित मिथिलांचल के ज्यादातर सिनेमाघर बन्द हो गए हैं। जिससे फिल्में बनती तो जरूर है लेकिन मुंबई, दिल्ली और एक-दो सिनेमाघरों में लग कर रह जाती हैं।

नई फिल्मों की बात करें तो सिनेमेटोग्राफी के क्षेत्र में जबरदस्त बदलाव दिख रहा हैं। हाल की कुछ फिल्में जैसे ‘ललका पाग’ और ‘मिथिला मखान’  पुरानी घिसी-पिटी हुई पटकथा से हटकर प्रयोगात्मक रूप में चल रही हैं।

नितिन चंद्रा निर्देशित ‛मिथिला मखान’ की शूटिंग मिथिलांचल के विभिन्न क्षेत्रों के अलावा टोरंटो, स्विट्जरलैंड एवं नेपाल में हुई है।

फिल्म में क्रांति प्रकाश झा तथा अनुरिता झा ने मुख्य किरदार निभाया है। फिल्म की कहानी मिथिला की संस्कृति, बिहार के पलायन तथा वापसी के सिलसिले पर आधारित है। फिल्म के सभी कलाकार मिथिला के ही है।

मैथिली में बनी इस फिल्म को 63 वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला है।

मैथिली फिल्मी इतिहास पर कई लेख लिख चुके भास्कर झा बताते हैं कि मिथिला मखान से पहले मिथिला पेंटिंग पर बनी मैथिली भाषा की लघु फिल्म नैना जोगिन (2007) को (आर्ट एंड कल्चरल फिल्म) राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। इसके निर्देशक प्रवीण कुमार को बेस्ट डायरेक्शन एवं इस फिल्म के एडिटिंग के लिए विभूति नाथ झा को नॉन फीचर फिल्म के लिए बेस्ट एडिटर का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

मैथिली भाषी फिल्म भले ही अधिक नहीं बनी हो और इंडस्ट्री के रुप में विकास ना हुआ हो लेकिन जो भी फिल्में बनी उसमें रामधारी सिंह दिनकर, फणीश्वरनाथ रेणु व बाबा नागार्जुन की साहित्यिक परंपरा स्तम्भ के रूप में रही।