हमने जगदीप को टाइपकास्ट क्यों किया?

जगदीप बतौर बाल कलाकार फ़िल्मों में काम करना शुरू किया। व्यस्क भूमिकाओं में आने पर जगदीप को जीवनभर एक जैसी भूमिकाएं ही मिलती रहीं।

जगदीप को अधिकतर फिल्मों में एक जैसे किरदार मिले
जगदीप को अधिकतर फिल्मों में एक जैसे किरदार मिले

सैयद इश्तियाक़ अहमद जाफरी, ये नाम हमारे और आपके दिलों में कोई हलचल पैदा नहीं करता। लेकिन यही नाम जब जगदीप बन जाता है, तो हमारे सामने एक ऐसा चुलबुला किरदार सामने आ जाता है, जिसने 400 से ज़्यादा फिल्मों में करीब 6 दशकों तक भारतीय दर्शकों का मनोरंजन किया.

यही जगदीप साहब अब इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। 12 साल की उम्र में एक बाल कलाकार के रूप में अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाले जगदीप 2012 तक फिल्मों में सक्रिय रहे. हालांकि उनका अंतिम यादगार किरदार 1998 की फिल्म चाइना गेट में था, जिसमें वो सूबेदार रामैया बने थे.

लेकिन जगदीप के पूरे करियर की सबसे यादगार भूमिका रही 1975 की ब्लॉकबस्टर शोले में सूरमा भोपाली की. और इस किरदार ने जहां एक तरफ जगदीप को लोगों के दिलों में जगह दी, तो साथ ही बॉलीवुड में इसी तरह के रोल करते रहने के लिए टाइपकास्ट भी कर दिया.

खिलौना में जगदीप का किरदार

पिछले हफ्ते ही मैं 1970 की सुपर हिट मूवी खिलौना देख रहा था, जिसमें मुख्य भूमिकाएं संजीव कुमार, मुमताज, शत्रुघ्न सिन्हा और जीतेंद्र की थीं. लेकिन जगदीप को भी इस फिल्म में एक किरदार निभाने को मिला था, और मुझे ये देखकर अच्छा लगा था कि उनके कॉमिक किरदार ‘महेश’ को डायरेक्टर ने अच्छी-खासी जगह दी थी. और मेरे मन में ये सवाल भी आया था कि जगदीप को कोई सीरियस रोल देने की कभी किसी प्रोड्यूसर-डायरेक्टर ने क्यों नहीं सोची।

वैसे जगदीप के सूरमा भोपाली बनने के पहले के दौर की कुछ फिल्मों में वो लीड एक्टर के रूप में भी दिखे थे, जिसमें सबसे मशहूर है 1957 की भाभी, जिसमें उनके साथ नंदा ने भी काम किया था. इस फिल्म का एक गाना बहुत मशहूर हुआ था, चली-चली रे पतंग मेरी चली रे…जिसे आवाज़ दी थी मोहम्मद रफ़ी ने.

भाभी के अलावा जगदीप की यादगार भूमिकाओं वाली फिल्में हैं- दो बीघा ज़मीन, आर पार और हम पंछी एक डाल के। हम पंछी एक डाल के- इस मूवी में तो उनका काम काफी सराहा गया था और इस फिल्म को नेशनल अवॉर्ड भी मिला था.

1968 की फिल्म ब्रह्मचारी से उन्होंने हास्य भूमिकाएं करनी शुरू कर दी थीं, और फिर अपने पूरे फिल्मी करियर में वो एक हास्य कलाकार ही बने रहे.

सूरमा भोपाली और अंदाज अपना-अपना वाले जगदीप

ये हिंदी फिल्मों का ऐसा दौर था, जिसमें हास्य कलाकारों के जिम्मे ज्यादातर ऊल-जुलूल हरकतें करके या चुटकुलों की तरह डायलॉग्स बोलकर दर्शकों को हंसाने का काम होता था. जगदीप ने अपने फिल्मी करियर के दौरान रामसे ब्रदर्स की हॉरर फिल्मों में भी काम किया, जिनमें पुराना मंदिर और सामरी जैसी फिल्में शामिल थीं.

जगदीप ने सूरमा भोपाली की अपनी छवि को भुनाने के लिए इसी नाम से 1988 में एक फिल्म भी बनाई, जिसमें उन्होंने अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र और रेखा जैसे बड़े नामों को स्पेशल भूमिकाओं के लिए राज़ी भी कर लिया, लेकिन ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर पिट गई.

इसके बाद जगदीप की एक यादगार भूमिका रही राजकुमार संतोषी की 1994 की कल्ट मूवी अंदाज़ अपना अपना में, जिसमें वो सलमान खान के पिता के किरदार में थे. दिलचस्प बात ये है कि इस मूवी में भी उनका नाम बांकेलाल भोपाली रखा गया था. लेकिन जितनी लोकप्रियता सूरमा को मिली, बांकेलाल लोगों के बीच वैसी जगह नहीं बना सका.

बहरहाल, ये सूरमा यानी जगदीप साहब अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यादें और हंसाने-गुदगुदाने वाले उनके किरदार हमारे साथ और हमारे बीच हमेशा रहेंगे. भाभी फिल्म के उनके लोकप्रिय गीत- चली चली रे पतंग में बोल हैं– चली बादलों के पार, होके डोर पर सवार…ये सूरमा भोपाली भी वक़्त की डोर पर सवार होकर बादलों के पार जा चुका है। अलविदा जगदीप साहब।