चमन बहार ईव टीजिंग को सचाई में उकेरने वाली सलीके से बनी फिल्म है

चमन बहार जरूरी विषय पर सलीके से बनी फिल्म है

चमन बहार भारतीय समाज की सही कहानी है
चमन बहार भारतीय समाज की सही कहानी है

बात 2001 की है। उसके पिताजी का तबादला मध्य प्रदेश की एक छोटी-सी तहसील में हुआ। पिताजी सरकारी बैंक में उच्च पद पर कार्यरत थे।

जिस तहसील में तबादला हुआ, वह उनके लिए नया नहीं था क्योंकि वही उनका ननिहाल भी था। फ़र्क बस इतना था कि यूँ हर साल नानी के घर हफ़्ते-दस दिन के लिए रहने आना और अब साल-दो साल के लिए आकर वहीं बस जाना।

लड़की का नाम मान लेते हैं, ‘नीरू’ और जगह का नाम मान लेते हैं ‘धाना’।

नीरू जब धाना पहुँची तब सोलहवें वर्ष में थी। दसवीं में दाखिला मिला कन्या माध्यमिक विद्यालय में। लड़कियों के लिए आठवीं के बाद वहाँ यही एक स्कूल था।

धाना पहुँचने के हफ़्ते-दस दिन बाद ही नीरू को सलवार सूट पहनने को कहा गया। स्कर्ट-फ़्रॉक सबकी मनाही हो गई। गाँव के हिसाब से रहना था। मन मारकर स्वीकार कर लिया गया।

धाना में जहाँ नीरू के पिताजी किराए से रहने पहुँचे, वहाँ सामने ही एक मैदान था। पहले से ही वहाँ लड़के वॉलीबॉल वगैरह खेलते थे, लेकिन नीरू जबसे उस मकान में रहने आई वहाँ नई उम्र के लड़कों का मजमा लगने लगा। घर के सामने ही एक आटा-चक्की थी। रात को वहाँ देर तक लड़के बैठने लगे।

नीरू साईकल से स्कूल जाती और अपने पीछे कई बार सायकल पर दूर तक पीछा करते लड़कों को पाती।

नीरू शाम को रोज़ मंदिर जाती थी। अपनी बहन और पड़ोसी बच्चों के साथ। घर से मंदिर जाने के लिए पूरा गाँव पार करना होता, क्योंकि घर गाँव के बाहरी इलाके में था।

एक दिन नीरू मंदिर पहुँची ही थी कि एक लड़के ने उसका रास्ता रोक लिया। उसने नीरू से कुछ कहा और वहाँ से चला गया। जब घरवालों तक बात पहुँची तो पता चला लड़का गाँव का जाना-माना गुंडा है। बीच गाँव में बन्दूक तानकर एक खून भी कर चुका है। लेकिन नेताओं के साथ उठना-बैठना है तो बच जाता है।

इस लड़के के डर से नीरू का शाम को मंदिर जाना बंद हो गया। उस लड़के ने नीरू के घर के बाहर अड्डा जमा लिया। नीरू का स्कूल जाना मुश्किल हो गया। पिताजी ने इधर-उधर नेताओं से शिकायत करके लड़के से पीछा छुड़ाया।

नीरू गणित की ट्यूशन पढ़ने जहाँ जाती, वहाँ एक लड़का चिट्टी लिए तैयार रहता, लेकिन कभी देने की हिम्मत नहीं कर पाया। एक दिन घर की बालकनी में फेंक गया। उसे लगता कि नीरू भी उसे पसंद करती है। लेकिन जब चिट्ठी फेंकने की वजह से उसे पिटाई पड़ी तो उसने पूरी ट्यूशन में नीरू को बेवफ़ा घोषित कर दिया।

एक लड़के ने अपने दोस्तों के बीच शर्त लगाई हुई थी कि नीरू को तो वही पटाएगा।

छोटी-जगहों में ये बातें परिवार जनों तक बड़ी आसानी से पहुँच जाती हैं। अंततः नीरू के पिताजी को तबादला कराना पड़ा।

यह एकदम सत्य घटना है। कहानी चमन-बहार जैसी ही लग रही है ना? क्योंकि चमनबहार जैसी अनेक कहानियाँ हमारे यहाँ की छोटी जगहों का सच भी हैं। बड़ी जगह से छोटे कस्बों में पहुँची लड़कियाँ इन जगह के लफंदरो के लिए आइटम होती हैं। उन्हें अचानक, अपनी ग्रामीण लड़कियों के बीच एक शहरी लड़की दिखने लगती है, जो हाव-भाव, बोलचाल, पहनावे में उन्हें किसी सिनेमाई परदे की लड़की जान पड़ती है।

ईव-टीज़िंग का यह ऐसा रूप है जिसे असल में ईव-टीज़िंग में गिना ही नहीं जाता। उल्टा कहनेवाले कहने लगते हैं, लड़की छोटे कपड़े पहनती ही क्यों थी? बाल खुले लेकर घूमती ही क्यों थी? अरे अकेले उसे स्कूटी/सायकल से भेजते ही क्यों थे? अब सुन्दर है तो लड़के तो पीछे पड़ेंगे ही ना।

उससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह है कि इन लड़कों को समझ ही नहीं आता कि लड़की के साथ ग़लत कर रहे हैं। उनके हिसाब से तो बस निहार ही रहे हैं। अब तो माहौल फिर भी बदला है। लेकिन छोटी जगहों में आज भी अगर कोई शहरी लड़की सड़क पर निकले, तो दुकानदार गद्दी छोड़कर बाहर आ टिकते हैं। गाँव भर को पता चल जाता है कि फलाने के घर कोई लड़की शहर से आई है।

आइटम नंबर से भरे कमरे के कौने-खोपचों में दबी-घुटी सी कहानी है चमनबहार। एक सुन्दर और ज़रूरी फिल्म।

सबसे सुन्दर बात, पूरी फिल्म में लड़की का कोई डायलॉग नहीं है, उसके बाद भी उसके हाव-भाव, उसका सीन में कहाँ आना है, कैसे आना है, कब आना है, यही उसकी उपस्थिति को इतना ज़रूरी बना देता है कि वह बिना बोले भी फ़िल्म का सबसे अहम किरदार निभा रही होती है।

सरकारी स्कूल्स में अंग्रेजी और गणित के मास्टरों का हाल भी बिलकुल वैसा ही होता है जैसा फिल्म में दिखाया है। कुछेक ही जगह होंगी जहाँ बहुत अच्छा स्तर होगा। इस रोल के लिए जीतू भी एकदम फिट है। उसका पहनावा, बाल और भाव-भंगिमा से वह क़िरदार में पूरा मिल गया।

यह सिनेजगत का एक सुन्दर आर्टपीस है। जो असल मुद्दे पर बना है।