फ्लैश बैकः मधुमती अपने जमाने के सबसे प्रतिभावान लोगों के रचनात्मकता से बनी फिल्म है

मधुमती के निर्माण से उस वक्त के सिनेमा इंडस्ट्री की सबसे उत्कृष्ट प्रतिभाएं जुड़ी थीं

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मधुमती से हिन्दी सिनेमा में पुनर्जन्म की कहानियों की शुरुआत हुई

मैंने तय किया था कि नामी-गिरामी हिंदी फिल्में देखूंगा. इस कड़ी में मैंने पहली फिल्म हिंदी सिनेमा की पहली ब्लॉक बस्टर ‘किस्मत’ देखी थी. उसके बाद मैं राज कपूर की बरसात या आवारा दोबारा देखना चाहता था. लेकिन, मेरी नजर जाकर टिक गई दिलीप कुमार की ‘मधुमती’ पर.

शुरू से शुरू करते हैं. अगर आप हिंदी फिल्मों के शौकीन हैं तो ‘मधुमती’ शुरू होते ही आपकी नजर पहले इससे जुड़े नामों पर जरूर अटकेगी. बस आप लिस्ट देखते जाइए.

1958 में रिलीज़ हुई इस फिल्म के निर्देशक थे बिमल रॉय. बाकी नामों की फेहरिस्त देखिए जरा, ऋत्विक घटक, राजिंदर सिंह बेदी, ऋषिकेश मुखर्जी, दिलीप गुप्ता, सोहन लाल, शैलेंद्र, सलिल चौधरी, दिलीप कुमार, वैजयंती माला, जॉनी वाकर…

…और प्राण.

मधुमती ने प्रेमी के रूप में दिलीप कुमार को त्रासदी भरी कहानियों से राहत दी
मधुमती ने प्रेमी के रूप में दिलीप कुमार को त्रासदी भरी कहानियों से राहत दी

भारतीय सिनेमा के इतिहास में ये नाम मील के पत्थर हैं. जरा सोचिए तो फिल्म की कहानी पर बात करते समय क्या होता होगा… या संगीत रचते समय सिटिंग में कैसी बहस होती होगी! गानों की रिकॉर्डिंग में क्या होता होगा… शूटिंग के दौरान क्या जादू रचा जाता होगा. क्या हुआ होगा जब अपने-अपने क्षेत्र के आला प्रतिभाएं इस फिल्म से जुड़ी होंगी.

तभी तो ‘मधुमती’ जैसी फिल्म बनी, जिसको आप हिंदी सिनेमा में पुनर्जन्म से जुड़ी हर फिल्म की जननी मान सकते हैं.

मौका लगे तो जरा यूट्यूब पर इस फिल्म मधुमती को सर्च करिए. (यूट्यूब पर फिल्म को यहां देखें) ब्लैक ऐंड व्हाइट फिल्म में अभी भी एक पहाड़न मेले में गाती दिखेगी, जुल्मी संग आंख लड़ी…और गांव में आए लकड़ी कंपनी के हैंडसम मैनेजर अपने आसपास की हरियाली को देखकर खुद ब खुद गाने लगते हैं, सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं…

और उस कुटिल खलनायक राजा उग्रनारायण सिंह (प्राण) की तिरछी मुस्कुराहट को मत भूलिए, जहां से पैंतरा बदलते हुए वह अपने नौकर को डांटते हैं, ‘जूता खोल जानवर कहीं का.’

इस फिल्म में मधुमती (वैजयन्ती माला) को लॉन्ग शॉट में इंट्रोड्यूस करवाया गया है और रहस्य को बरकरार रखने के लिए आप चीड़ के जंगल में धुंध के बादल घिरते देखते हैं.

मधुमती में सलिल चौधरी के संगीत को सुनकर आप गदगद हो जाएंगे.

हालांकि, बिमल रॉय की मधुमती उनकी सबसे बड़ी व्यावसायिक सफल फिल्म थी. पर उन्हें ‘दो बीघा जमीन’ के बाद ऐसी व्यावसायिक फिल्म बनाने के लिए आलोचकों ने दम भर कोसा था.

मधुमती में सिनेमैटोग्राफी बेहद उम्दा रही है और लोग इसके फ्रेमों से सीखते रहे हैं
मधुमती में सिनेमैटोग्राफी बेहद उम्दा रही है और लोग इसके फ्रेमों से सीखते रहे हैं

अपने एक इंटरव्यू में दिलीप कुमार ने कहा था कि इस फिल्म को बनाने के लिए बहुत से लोगों ने रॉय को मना किया था क्योंकि लोगों को लगता था कि इस फिल्म की अलग ढंग की पुनर्जन्म वाली कहानी को दर्शक मंजूर नहीं करेंगे. (इस फिल्म में मधुमती का आत्मा भी दिखती है)

इस फिल्म का आइडिया बिमल रॉय को आया जब उन्होंने एक आदिवासी लड़की के जंगल में खो जाने की कल्पना की थी. उनके सहायक निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने उनसे इस पर आगे काम करने के लिए कहा और फिर ऋत्विक घटक इस पर आधारित एक कहानी बाकायदा पटकथा के रूप में तैयार कर ले आए.

हालांकि, बिमल दा यथार्थवादी फिल्मकार थे और उनकी फिल्मों में ग्लैमर और चमक-दमक कम होता था. अपने एक पुराने इंटरव्यू में वैजयंती माला ने कहा था कि बिमल दा अपने किरदारों को उभारना चाहते थे. और इसलिए मधुमती में धुंध छंटने के साथ ही वैजयंती माला का क्लोज-अप दिखता है. माला ने कहा था, “मेरे पूरे करियर में यह सबसे बेहतरीन शॉट था.”

सिर्फ यह क्लोज शॉट ही क्यों, मधुमती में ऐसे शानदार शॉट्स भरे हुए हैं. दिलीप गुप्ता के कैमरे ने जो फ्रेम पकड़े हैं उनके स्तर का शॉट्स हिंदी सिनेमा में बेहद कम ही हैं.

मधुमती के झाड़फानूस वाले सीक्वेंस को तो फराह खान ने जस का तस उठाकर ‘ओम शांति ओम’ में रिपीट किया है.

इस फिल्म में फिर दिलीप कुमार हैं. दाग़, अमर, मुसाफिर, देवदास, और दीदार जैसी फिल्मों में भावुकता भरे किरदार निभाने के बाद ट्रेजिडी किंग को उनके डॉक्टर ने कुछ हल्की-फुल्की भूमिकाएं निभाने को कहा था. फिर उन्होंने मधुमती चुनी क्योंकि इसकी शूटिंग नैनीताल में होनी थी.

दिलीप कुमार की हर अदा, मधुमती की तस्वीर बनाते समय खुद में लजाना, गाने में अपनी देह भाषा का इस्तेमाल…सब इतना बेहतरीन है कि उसने मधुमती को सिनेमा के महाकाव्य में बदल दिया है.

वैजयंती माला ने फिल्म में तीन किरदार निभाएं हैं. पर इस फिल्म को उनके उन्मुक्त नृत्य के लिए भी जाना जाता है.

इस फिल्म में वैजयंती माला का सौन्दर्य गजब का निखरकर आया है
इस फिल्म में वैजयंती माला का सौन्दर्य गजब का निखरकर आया है

मधुमती के बारे में बात करना अधूरा होगा अगर उसके संगीत की चर्चा न की जाए. इस फिल्म में शैलेन्द्र के लिखे गीतों को सलिल चौधरी ने धुनों में पिरोया था. या इसको ऐसे कहना उचित होगा कि सलिल चौधरी की धुनों में शैलेंद्र ने अल्फाज़ सजाए थे. पर इन दोनों के शाहकार से एक अद्भुत संगीत रचा गया.

इस फिल्म में कुल 10 गाने इस्तेमाल किए गए (रिकॉर्ड 11 किए गए थे, एक गाना जिसका फिल्म में इस्तेमाल नहीं हुआ उसे मजरूह सुल्तानपुरी ने लिखा था. यह गाना था “तन जले मन जलता रहे’, जिसे द्विजन मुखर्जी ने गाया था.)

पर ‘मधुमती’ का नाम लेते ही एक सिग्नेचर गीत जेहन में कौंधता है, वह है ‘आजा रे परदेसी…’ हालांकि इस गाने के ट्यून को सलिल दा ने राज कपूर की फिल्म ‘जागते रहो’ में इस्तेमाल किया था. पर इस धुन में थोड़ी मेलोडी मिलाकर उन्होंने इसे ‘मधुमती’ में इस्तेमाल किया.

मैंने कहीं पढ़ा कि बिमल दा इस धुन को लेकर आश्वस्त नहीं थे, पर उन्हें लता मंगेशकर ने भरोसा दिलाया कि यह उम्दा है.

सुहाना सफर…वाले गीत में बिमल रॉय बतौर गायक हेमंत कुमार को लेना चाहते थे. पर पर शैलेन्द्र ने उन्हें यह गाना मुकेश से गवाने के लिए मना लिया.

हालांकि, इस गीत में एक अंतरे पर शैलेंद्र उलझ गए थे. उन्हें ये गोरी नदियों का चलना उछलकर…इससे आगे की लाइन नहीं मिल रही थी. फिर नैनीताल के पास उन्होंने एक लड़की को नदी के किनारे चलते देखा तो इस अंतरे को पूरा कियाः कि जैसे अल्हड़ चले पी से मिलकर…

गाने

सुहाना सफर और ये मौसम हसीः मुकेश

आजा रे परदेसीः लता मंगेशकर

जुल्मी संग आंख लड़ीः लता मंगेशकर

घड़ी घड़ी मोरा दिलः लता मंगेशकर

दिल तड़प तड़पः मुकेश और लता

दैया रे दैया रे चढ़ गयो पापी बिछुआः लता, मन्ना डे

जंगल में मोर नाचाः मो. रफी

हम हाल ए दिलः मुबारक बेगम

टूटे हे ख्वाबों नेः मो. रफी

कंचा ले कंचीः आशा भोंसले, गुलाम मोहम्मद

वीडियोः शेमारू