मैथिली सिनेमाः मैथिली की पहली प्रदर्शित फिल्म थी ‛कन्यादान’

मैथिल समाज में कन्या शिक्षा को लेकर जागरूकता के लिए बनी फिल्म कन्यादान की आज एक भी प्रति उपलब्ध नहीं है

स्रोतः कन्यादानक नेपथ्य कथा
पहली मैथिली फिल्म कन्यादान के कलाकार

एक कहावत है कि शादी-विवाह बराबर वालों में होनी चाहिए. लेकिन समाज ने इस कहावत को केवल आर्थिक संपन्नता से जोड़कर दहेज जैसी कुप्रथा को बढ़ावा दिया है। कहावत का मूल अर्थ अगर जानना है तो मैथिली भाषा में प्रदर्शित पहली फिल्म ‛कन्यादान’ के बारे में जानकारी जरूरी हो जाता है।

शिक्षित लड़का और अशिक्षित लड़की की शादी के बाद क्या-क्या चुनौतियां आती है, फिल्म की कहानी इसी पर आधारित है। इस तरह के रिश्ते का क्या परिणाम होता है , इसे बखूबी दिखाया गया है।

साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कथाकार हरिमोहन झा की पुस्तक पर आधारित इस फिल्म कि पटकथा नवेंदु घोष ने लिखा था।

इंटरवल के बाद फिल्म में ज्यादातर हिंदी-संवाद का प्रयोग किया गया। प्रसिद्ध साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु ने फिल्म के संवाद लिख थे। जिसे मैथिली भाषा में चन्द्रनाथ मिश्र ‛अमर’ ने अनुवाद किया था।

फिल्म के निर्माता एच.एम. मुंशी, निर्देशक फणि मजूमदर और सहायक निर्देशक महीधर थे। जबकि गोपाल, तरुण बोस, चाँद उस्मानी, पद्मा चटर्जी, टुनटुन, दुलारी दाई, खुर्शीद एवं ब्रज किशोर सिंह ने अभिनय किया था।

कन्यादान फिल्म का क्रू और कास्ट.
कन्यादान फिल्म का क्रू और कास्ट.

मैथिली भाषा के बड़े कवि व साहित्यकार चन्द्रनाथ मिश्र ‛अमर’ ने ‛लालकक्का’ का किरदार निभाया था। हालांकि, चन्द्रनाथ मिश्र केवल ‛कन्यादान’ फिल्म के किरदारों को मैथिली सिखाने के लिए हरिमोहन झा के आग्रह पर मुंबई गए थे, क्योंकि फिल्म के सभी कलाकार गैर-मैथिली भाषी ही थे।

साहित्य अकादमी से पुरस्कृत चन्द्रनाथ झा ‛अमर’ ‛कन्यादान फिल्मक नेपथ्य कथा’ पुस्तक में अपनी भूमिका के विषय में एक रोचक घटना का जिक्र करते हुए चन्द्रनाथ मिश्र लिखते हैं, “लालकक्का की भूमिका रामायण तिवारी निभा रहे थे। उन्हें उच्चारण शुद्ध करवाने का भार चन्द्रनाथ मिश्र को दिया गया था। फिल्म में एक संवाद था, ‛की भेल! किइएक चिकरैत छी?’

रिहर्सल के समय रामायण तिवारी सही तरह से मैथिली में बोल पा रहे थे लेकिन कैमरा के सामने जाते ही बोलती बंद हो जाती थी। तिवारी कांपने लगते थे। दोबारा रिहर्सल शुरू होता, चन्द्रनाथ मिश्र रामायण तिवारी को फिर उच्चारण दोष दूर करवाने लगते। लेकिन कैमरा के सामने रामायण तिवारी मैथिली बोलने में असफल हो रहे थे। ऐसा जब तीन बार हुआ तो रामायण तिवारी ने खुद कहा कि ये किरदार हमसे नहीं होगा! मुझे माफ कर दें!

निर्देशक फणि मजूमदर को गुस्सा आ गया, वह झल्लाकर बोलें ‘पद्मा चटर्जी, दुलारीबाई बोल सकती है, आप बिहार के हैं, आप क्यों नहीं मैथिली बोल सकते हैं? रामायण तिवारी ने साफ-साफ कह दिया कि बिहार का हूँ इसलिए मैथिली शुद्ध-शुद्ध बोल नहीं पाता हूँ। उसके बाद कुछ लोगों की नजर चन्द्रनाथ मिश्र पर पड़ी।

फणि मजूमदर व अन्य लोगों की उपस्थिति में रामायण तिवारी ने कहा कि आपमें अभिनय कौशल है, हाव-भाव भी है, लाल कक्का का चरित्र आप करें!

झारखंडी नाथ की भूमिका में ब्रजकिशोर
झारखंडी नाथ की भूमिका में ब्रजकिशोर

फणि मजूमदार ने भी पूछा, मैथिली सिनेमा में भूमिका करिएगा। चन्द्रनाथ मिश्र ‛अमर’ ने जवाब दिया कि सिनेमा में भाग लेने को अच्छा नहीं माना जाता है, मेरे हजारों छात्र हैं वह क्या सोचेंगे? यह सुनकर फणि मजूमदार को गुस्सा आ गया, वह उठे और टेबुल पर रखे पटकथा की कॉपी नीचे फेंकते हुए बोले, ‛सब बन्द कीजिये! जब लोग इसे अच्छा ही नहीं मानते हैं तो मैथिली में फिल्म की क्या जरुरत है?’

इसके बाद चन्द्रनाथ मिश्र उधेड़बुन में पड़ गए कि फिल्म करें या न करें। अगर फिल्म कर ली तो लोग क्या सोचेंगे? इसी बीच एकांत में रामायण तिवारी ने चन्द्रनाथ मिश्र को कहा कि क्या सोचते हो? फिल्म नगरी में लोहे की दीवारें है। जल्दी किसी को प्रवेश नहीं मिलता है, आज मौका मिला है। कैमरे की चुनौती को झेलने का दोबारा अवसर नहीं मिलेगा।

मुझे पहले से ही पता था कि ये फिल्म मेरे से नहीं हो पाएगा, लेकिन तब मना करता तो किसी भी कलाकार को ले आते, मैं चाहता था कि इस फिल्म में एक मैथिली भाषी कलाकार भी हो।

कन्यादान फिल्म के कलाकार
कन्यादान फिल्म के कलाकार

तिवारी की बात सुनकर चन्द्रनाथ मिश्र तैयार हो गए और मन ही मन सोच लिया जो भी होगा, देखा जाएगा।

दो बार रिहर्सल हुआ फिर कैमरा ऑन और शूटिंग शुरू।

चन्द्रनाथ मिश्र ‛लाल कक्का’ के रोल में… वही डायलॉग, ‛की भेल ? किएक चिकरैत छी ?’ एक बार में सीन शूट हो गया।

पूरी टीम में खुशी थी , रसगुल्ला मंगाया गया और चन्द्रनाथ मिश्र के आगे रख दिया गया, सब बेहद प्रसन्न थे।

फिल्म में लता बोस ने बुच्ची दाई का किरदार निभाया था, गोपाल ने सी.सी. मिश्रा, चांद उस्मानी ने विधिकरी (बड़का गांववाली/ बुच्ची दाई की भाभी), टुनटुन ने झुनियां माय, पंजाब की मिस रत्ना ने बुच्ची दाय की सखी, दुलारी दाई ने फुचुकरानी, पद्मा चटर्जी ने लालकाकी (बुच्ची दाई की माय), चन्द्रनाथ मिश्र ने लालकक्का (बुच्ची दाई के पिता), खुर्शीद ने मिस बिजली (सी.सी. मिश्र की सहपाठी), ब्रज किशोर ने झारखंडीनाथ (ग्रामीण) का रोल निभाया था।

फिल्म का संगीत दुलाल सेन और विंध्यवासिनी देवी ने दिया था जबकि चन्द्राणी मुखर्जी, उषा मंगेशकर, कमल बरोट और मन्ना डे ने गीत को स्वर दिया था।

विद्यापति के दो गीत ‛सखी रे हमर दुखक नहिं ओर’ और ‘ब्याह चलल शिवशंकर’ के अलावे ‛हो रामा पिया रे बिनु’, और  ‛लागले हिंडोंलवा अमवा के डार’ के गीतकार विंध्यवासिनी देवी थे जबकि ‛जिन्दगी हम सटा हुआ एक गीत है’ और ‛सुरमा बास बरेलीबाला’ को गौहर कानपुरी ने लिखा था।

फिल्म के ज्यादातर हिस्सें की शूटिंग मुंबई के प्रकाश स्टूडियो में हुई थी जबकि सकरी, राजनगर व मिथिलांचल के कई इलाकों में भी शूटिंग हुई। केरल के श्रीबासु कैमेरामैन थे।

फिल्म में सामाजिक व्यवस्था व कुरीतियों पर लोगों को एक नई दिशा देने का प्रयास किया गया क्योंकि मिथिलांचल की विवाह परंपरा व व्यवस्था ऐसी रही है जहां शादी अभिभावकों द्वारा तय होती थी। विवाह के चौथे दिन ही लड़का-लड़की एक-दूसरे से मिलते थे। ऐसे में शिक्षा व उम्र के आधार पर बेमेल शादी का प्रचलन सर्वाधिक था।

फिल्म ‛कन्यादान’ के मुख्य नायक बीएचयू में पढ़ने वाले सी.सी. मिश्रा (गोपाल) की कल्पना थी कि उसकी शादी पढ़ी-लिखी लड़की से होगी। लेकिन इसके विपरीत उसकी शादी बुच्ची दाई से हो जाती है।

शादी के समय दुल्हन के साथ बैठी विधिकरी जो कि बुच्ची दाई की भाभी थी और वह अंग्रेजी बोलना जानती थी. सी.सी. मिश्रा को लगा कि वही दुल्हन है। लेकिन शादी के चौथे (चतुर्थी/ चौठारी) दिन पहली मुलाकात में अपनी पत्नी से कई तरह का सवाल पूछता है, उचित उत्तर नहीं मिलने पर वह अत्यंत दुखी हो जाता है।

उसे लगता है कि उसके साथ धोखा हुआ है.

वह दुखी होकर बुच्ची दाई को कहता है कि ‛मैंने विवाह कर लिया है इसलिए छोड़ तो नहीं सकता लेकिन अगर आपको मेरे संग रहना है तो मेरी कल्पना के अनुसार बनना पड़ेगा. फिर वह कमरे की खिड़की से कूदकर ससुराल से भाग जाता है।

बुच्ची दाई अशिक्षा के कारण एकाकी जीवन व्यतीत करने को मजबूर हो जाती है।

इंटरवल के बाद फ़िल्म की कहानी हरिमोहन झा की कहानी ‛दुरागमन’ पर आधारित है जिसमें बीएचयू की सहपाठी मिस बिजली (खुर्शीद) सी.सी. मिश्र को धिक्कारते हुए कहती है कि लड़की अशिक्षित है और तुम्हारे साथ विवाह में धोखा हुआ इसमें बुच्ची दाई का क्या दोष है।

इस बात का सी०सी० मिश्रा पर गहरा असर पड़ता है और तार भेजकर बुच्ची दाई को बनारस बुलवा लेता है।

बनारस में सी.सी. मिश्र बुच्ची दाई को रूढ़िवादी मैथिल व्यवस्था से निकालकर पढ़ाई, टेनिस खेलना, साइकिल चलाना, तैराकी और अन्य जीवन कौशल से जोड़ने का प्रयास करता है।

इन चीजों में कुशल होकर बुच्ची दाई, बी. दाई (अंग्रेजी नाम) बन जाती है। बी. दाई अपने पति सी.सी. मिश्र की गलतियों में टोकने व सलाह देने लगती है। इस सीन के माध्यम सेलोगों को यह भी बताने का प्रयास किया गया कि शिक्षा क्यों जरूरी है!

बुच्ची दाई के दुरागमन के साथ फिल्म खत्म होती है।

फिल्म में मिथिलांचल के घर, गांव, समाज, महिलाओं के बीच गप्प (बातचीत), भाषा, कला, संस्कृति और परंपरा को बहुत ही उम्दा ढंग से प्रस्तुत किया गया है। फिल्म में बुच्ची दाई के माध्यम से महिला शिक्षा का महत्व बताया गया, अगर बुच्ची दाय पढ़ी-लिखी होती तो उसे इतनी उपेक्षा नहीं झेलनी पड़ती।

फिल्म में जहां हास्य और करुणा को सलीके से प्रस्तुत किया गया है वहीं अंग्रेजी शिक्षा के महत्व को भी रेखांकित करते हुए एक प्रसंग प्रस्तुत किया गया जहां अंग्रेजी के एक तार को पढ़वाने के लिए झारखंडीनाथ (ब्रजकिशोर) पूरे गांव घूमते हैं लेकिन पढ़ने वाला नहीं मिलता है।

फिल्म मिथिलांचल के विकास का संदेश भी देता है जहां रूढ़िवादी विचार व परंपरा के नाम पर वर्षों से कई कुरीतियां व कुव्यवस्थाएँ जड़े जमा चुकी है।

मैथिली भाषा की प्रदर्शित पहली फिल्म में हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक के कलाकारों ने काम किया जिससे शूटिंग के दौरान एक-दूसरे से बात करने में भाषा सम्बंधित बहुत सी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

निर्देशक फणि मजूमदार केवल अंग्रेजी और बांग्ला बोलते थे, जबकि कैमरामैन श्रीबासु को हिंदी नहीं आती थी।

कथाकार हरिमोहन झा इस फिल्म को लेकर इतने संवेदनशील थे कि कहानी की मुख्य नायिका बुच्ची दाई के किरदार को नयापन देने पर निर्देशक फणि मजूमदार से बहस कर ली थी। उन्होंने कहा कि मैंने बुच्ची दाई को आदर्श मैथिली कन्या के रूप में प्रस्तुत किया था जिसे आपने नट्टिन बना दिया, यह मैथिली संस्कृति के खिलाफ है।

इस पर फणि मजूमदर थोड़े नाराज भी हुए और गुस्से में आकर बोल पड़े कि अगर ऐसी स्थिति रही तो फिल्म बनाना असम्भव है।

हरिमोहन झा व अन्य लोगों का यही समर्पण व भावनात्मक जुड़ाव रहा जिस वजह से संख्या कम होने के बावजूद अब भी मैथिली फिल्मों में संस्कार व स्तर से समझौता नहीं हुआ है।

कन्यादान बेशक मैथिली भाषा की पहली फिल्म थी लेकिन अपनी इस विरासत को सहेजने की वहां कोई कोशिश नहीं हुई. मैथिली भाषी लोगों की अपनी थाती के प्रति उदासनीता की वजह से मैथिली भाषा की प्रदर्शित पहली फिल्म ‛कन्यादान’ की एक भी कॉपी आज उपलब्ध नहीं है।

चन्द्रनाथ मिश्र ‛अमर’ के दामाद डॉ. रामदेव झा बताते हैं कि पटना, दरभंगा व समूचे मिथिला के सिनेमाघरों में फिल्म प्रदर्शित की गई थी, दर्शकों ने पूरे उत्साह के साथ इस फिल्म को देखा था।

लालकक्का की भूमिका निभाने वाले 98वें वर्षीय चन्द्रनाथ मिश्र ‛अमर’ कहते हैं, “कन्यादान’ फिल्म के निर्माण का कारण मैथिली भाषा का विकास करना था। उस दौर के फिल्मकार का उद्देश्य ऐसी विषय-वस्तु को चुनना था जो समाज के लिए प्रेरक बने जिसके लिए हरिमोहन झा की प्रसिद्ध दोनों कथा ‛कन्यादान’ और ‛दुरागमन’ को चुना गया।

फणीश्वरनाथ रेणु, हरिमोहन झा, चन्द्रनाथ मिश्र अमर जैसे कथाकारों ने भाषा के प्रति जिस समर्पण के साथ मैथिली फिल्म की नींव डाली थी, आने वाली पीढ़ी में उस भाव की कमी ने मिथिला को फिल्म निर्माण क्षेत्र में पीछे कर दिया।