मैथिली सिनेमाः भक्ति की शक्ति और दृढ़निश्चयी सशक्त महिला की कहानी थी मैथिली की दूसरी फिल्म ‛जय बाबा बैद्यनाथ’

जय बाबा बैद्यनाथ दूसरी मैथिली फिल्म थी और इस भाषा की पहली रंगीन फिल्म भी

दूसरी मैथिली फिल्म जय बाबा बैद्यनाथ का पोस्टर
दूसरी मैथिली फिल्म जय बाबा बैद्यनाथ का पोस्टर

द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथधाम की महिमा और चमत्कार का बखान करती हुई फिल्म है ‘जय बाबा बैद्यनाथ’। मैथिली सिनेमा के इतिहास में पहली रंगीन फिल्म ‛जय बाबा बैद्यनाथ’ 1979 में प्रदर्शित हुई थी।

मैथिली भाषा की पहली धार्मिक फिल्म होने का गौरव प्राप्त करने वाली इस फिल्म का नाम पहले “मधुश्रावणी” था. मधुश्रावणी मिथिला का प्रसिद्ध व्रत है जिसमें सुहागन स्त्रियां प्रकृति, नागों और शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं।

चूंकि यह व्रत-पूजन मिथिलांचल तक सीमित है इसलिए नाम बदलकर ‛जय बाबा बैद्यनाथ’ किया गया ताकि फिल्म अधिक से अधिक लोगों तक पहुंच सके।

फिल्म में मैथिली के साथ-साथ हिंदी भाषा के संवाद का भी प्रयोग किया गया था।

फिल्म जय बाबा बैद्यनाथ का पोस्टर
फिल्म जय बाबा बैद्यनाथ का पोस्टर

विश्वजीत चटर्जी, सोमा सालकर, विपिन गुप्ता, त्रिलोचन झा, ईशानी, पंकज, महादेव सिंह, बकुल, सुभद्रा, बीना, सपना, ठाकुर जदुनाथ, ठाकुर कौशल किशोर, बाल अभिनेता पिंकू इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे जबकि डी.वी. राणा, महादेव सिंह और बॉलीवुड के स्थापित गीतकार, निर्माता और निर्देशक दरभंगा निवासी प्रह्लाद शर्मा इस फ़िल्म के निर्माता थे।

प्रह्लाद शर्मा ने ही फिल्म का निर्देशन भी किया था और प्रसिद्ध संगीतकार वी. बलसारा ने फिल्म का संगीत दिया था।

फिल्म की कहानी राजपुर के निरसू झा (चौधरी यदुनाथ ठाकुर) के घर से शुरू होती है जिन्हें शादी के लंबे अरसे बाद भी संतान सुख नहीं मिलता। संतानहीन उनकी पत्नी को एक साधु ‛बाबा बैद्यनाथ’ से संतान की कामना करने की सलाह देता है।

फिल्म में निरसू झा का किरदार निभाने वाले ठाकुर यदुनाथ चौधरी
फिल्म में निरसू झा का किरदार निभाने वाले ठाकुर यदुनाथ चौधरी

ऐसा करने पर भगवान शिव की कृपा से निरसू झा के घर एक सुंदर बालिका का जन्म होता है। बालिका का नाम माधवी (सोमा सालकर) रखा जाता है। कुछ ही वर्ष बाद माधवी की मां का देहांत हो जाता है। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण माधवी शिक्षा से वंचित रह जाती है। जब वह बड़ी होती है तब पिता निरसू झा उसकी शादी चंदनपुर निवासी अमरनाथ (विश्वजीत चटर्जी) से करवा देते हैं।

अमरनाथ कलकत्ता में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा है और शादी के समय वह कॉलेज के अंतिम वर्ष में था। कॉलेज में अमरनाथ की एक प्रेमिका थी जिसका किरदार निभाया अभिनेत्री ईशानी ने।

अमरनाथ की मां बीमार थी और मां की इच्छा से मजबूर होकर उसे माधवी से विवाह करना पड़ा। शादी के चौथे दिन (चतुर्थी) से पहले ही उसकी मां की मृत्यु हो जाती है जिस कारण अमरनाथ घर वापस आ जाता है।

यहां बताते चले कि मिथिला के ब्राह्मणों में विवाह की एक परंपरा है जिसमें चतुर्थी से पूर्व लड़का-लड़की एक-दूसरे के निकट नहीं आते हैं, दोनों अलग-अलग कमरे में रहते हैं। लेकिन मेडिकल का छात्र अमरनाथ इन चीजों को कहां मानने वाला था, पति का मान रखने के लिए माधवी उसके सम्पर्क में आई और वह गर्भवती हो जाती है।

अमरनाथ मां के अंत्योष्टि और क्रियाकर्म के बाद लौटकर ससुराल नहीं आता है। कुछ ही दिन बाद राजपुर के लोग माधवी के चरित्र पर संदेह करने लगे थे, लोगों के मन में ये बात थी कि चतुर्थी से पहले ही अमरनाथ घर वापस जा चुका था तो माधवी गर्भवती कैसे हुई?

पहले ऐसे बनते थे फिल्म से जु़ड़े लोगों के नामों के पोस्टर
पहले ऐसे बनते थे फिल्म से जु़ड़े लोगों के नामों के पोस्टर, इसमें फिल्म जय बाबा बैद्यनाथ फिल्म से जुड़े लोगों के नाम हैं

लोगों के ताने से व्यथित होकर माधवी पति की खोज में निकल पड़ती है। बड़ी मशक्कत के बाद माधवी को अमरनाथ मिलता लेकिन वह अपनी प्रेमिका की साथ प्रेमालाप में व्यस्त था।

माधवी अपने पति से अपना अधिकार मांगती है तो उल्टे अमरनाथ उसके चरित्र पर सवाल उठा देता है. यह देखकर माधवी पर मानो पहाड़ टूट जाता है।

चूंकि माधवी शिवदात्री पुत्री थी इसलिए अपनी पुत्री के साथ अन्याय देखकर ‛बाबा बैद्यनाथ’ क्रोधित हो जाते हैं और अमरनाथ को सजा देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उसका एक्सीडेंट हो जाता है जिसमें उसके आंखों की रोशनी चली जाती है।

अमरनाथ का अस्पताल में इलाज चल रहा होता है इसी दौरान माधवी उसके पास पहुंचती है। वह अपना परिचय नर्स के रूप में देती है और पति की खूब सेवा करती है जिससे अमरनाथ उसे प्रेम करने लगता है। तमाम कोशिशों के बावजूद अमरनाथ के आंखों की रौशनी वापस नहीं आती है।

माधवी अमरनाथ को बाबा बैद्यनाथ के शरण में जाने को कहती है। कठिनाईयों को झेलते हुए उसे अपने संग देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथधाम मंदिर ले जाती है। माधवी की पतिव्रत धर्म और भक्ति से प्रसन्न होकर ‛बाबा बैद्यनाथ’ अमरनाथ के आंखों की रौशनी वापस कर देते हैं फिर माधवी और अमरनाथ सप्रेम दाम्पत्य जीवन जीने लगते हैं।

यश प्रोडक्शन्स के बैनर तले बनी इस फिल्म में 8 गीत थे जिसे मैथिली साहित्यकार आचार्य सोमदेव और पं. चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ और प्रह्लाद शर्मा ने लिखा था।

विद्यापति की प्रसिद्ध गीत ‛कखन हरब दुख मोर’ के अलावे चन्द्रनाथ मिश्र ‛अमर’ ने ‛बर के देख गे माई’, ‛लिखलहुं हं चिट्ठी’, ‛सावन आवन कहि गेल’, सोमदेव ने ‛तोहर गोर गोर अंग’ जबकि प्रह्लाद शर्मा ने ‛मोहे दर्शन दो अविनाशी’, ‛तुझे कौन कहेगा दानी’, ‛रूठकर जाते कहां सनम’ लिखा था।

प्रह्लाद शर्मा की लिखी तीनों गाने हिंदी में जबकि अन्य 5 गीत मैथिली भाषा में थी।

‛रूठकर जाते कहाँ सनम’ गीत को मोहम्मद रफी आशा भोसले ने स्वर दिया था जो कि यूट्यूब पर उपलब्ध है। फिल्म की एडिटिंग बैद्यनाथ चटर्जी ने की थी जबकि फोटोग्राफी विजय डे और शांति दत्ता ने किया था। फिल्म के डायलॉग निर्देशक प्रह्लाद शर्मा ने लिखा था।

फिल्म के ज्यादातर हिस्से की शूटिंग सिंहवाड़ा ड्योढ़ी (दरभंगा) में हुई थी जिसमें फिल्म में निरसू झा का किरदार निभाने वाले चौधरी यदुनाथ ठाकुर के घर का प्रयोग किया गया था।

चौधरी यदुनाथ ठाकुर के पौत्र (पोते) रोहित रंजन ठाकुर बताते हैं, “फिल्म के लगभग 70 फीसद हिस्से की शूटिंग दादा (चौधरी यदुनाथ ठाकुर) के घर ( सिंहवाड़ा ड्योढ़ी ) दरभंगा में ही हुई थी। दादाजी के साथ-साथ सिंहवाड़ा के कई ग्रामीणों के सक्रिय सहयोग से मैथिली की एक भक्ति फिल्म बन सकी। फिल्म की यूनिट लगभग 3 महीने तक हमारे घर पर रही थी। दादाजी ने फिल्म में निरसू झा का किरदार भी निभाया था। फिल्म की शूटिंग और अभिनय के लिए दादाजी समेत गांव के अन्य कलाकारों ने कोई शुल्क नहीं लिया था।”

मैथिली फिल्मी इतिहास पर कई लेख लिख चुके भास्कर झा बताते हैं, “बाबा बैद्यनाथधाम के प्रति मिथिलांचल के लोगों में विशेष आस्था है। जिसपर मैथिली भाषा की दूसरी प्रदर्शित फिल्म का प्रदर्शन 1979 में हुआ। संयोग ही कहा जाए कि “जय बाबा बैद्यनाथ” प्रह्लाद शर्मा और वी. ब्लासर की अन्तिम थी।

इससे पहले प्रह्लाद शर्मा के निर्देशन में 7 फिल्में बनी थी जिसमें 1976 में ‛वही लड़की’,  ‘प्यार’ (1969), ‘धूप-छांव’ (1977), ‘रातेर कुहेली’ (1968), ‘विद्यापति’ (1964), ‘रंगेर कुएली’ (1968), ‘प्रेम की गंगा’ (1971)  और 8वीं फिल्म ‘जय बाबा बैद्यनाथ’ (1979) थी।

फिल्म की शूटिंग मुख्य रूप से सिंहवाड़ा ड्योढ़ी में हुई जबकि कुछ हिस्सें की शूटिंग देवघर और कलकत्ता में हुई थी।