फ्लैश बैकः शहीद वाले मनोज कुमार सबसे ऑथेंटिक भगत सिंह लगते हैं

परदे पर बॉबी देओल से लेकर अजय देवगन तक बहुतों ने शहीद भगत सिंह का किरदार निभाया पर मनोज कुमार जैसा कोई नहीं

शहीद ने मनोज कुमार को अलग पहचान दी
शहीद ने मनोज कुमार को अलग पहचान दी
हॉलीवुड ने शख्सियतों एवं जीवनियों पर अनेक फिल्में बनाई हैं। महात्मा गांधी से लेकर नेपोलियन और फिर महारानी एलिजाबेथ के जीवन को परदे पर लाने का दुर्लभ साहस किया। इतिहास से प्रेरित होकर अनुकरणीय कहानियों को याद करने की ख्याति उनके पास है।
हिन्दी सिनेमा ने भी ऐतिहासिक कहानियों पर बहुत सी फिल्म बनाई, चंगेज खां तथा मुगल बादशाह अकबर से लेकर ‘जहांगीर’ एवं ‘शाहजहां की गाथा को प्रस्तुत किया।
लेकिन फिल्मों की गुणवत्ता को अधिक सकारात्मक सराहना नहीं मिली। हां, ‘कोटनिस की अमर कहानी’ मील का पत्थर जरूर थी।  कह सकते हैं कि पीरियड कहानियों को जमीन पर लाने का हमारा अंदाज हॉलीवुड से अलग होकर पॉपुलर की तरफ अधिक झुक जाता है। लेकिन हालिया ‘पान सिंह तोमर’ एवं ‘भाग मिल्खा भाग’ इसमें अपवाद कही जानी चाहिए।
ऐतिहासिक कहानियों को प्रस्तुत करने में उससे अलग होने पर कहानी की विश्वसनीयता व लय टूट सकता है।
स्वाधीनता संग्राम की ऐतिहासिकता से हिन्दी सिनेमा को अनेक कहानियां और पात्र मिले, क्रांतिकारियों की गाथाएं इस संदर्भ में यादगार थी। देश के लिए शहीद हुए क्रांतिकारियों के प्रेरणास्रोत भगत सिंह-सुखदेव-राजगुरू-आज़ाद-बिस्मिल-अशफाक़ के जीवन प्रसंगों को बुनकर ‘शहीद’ की धारा की फिल्में बनीं।
इन क्रांतिकारियों में शहीद भगत सिंह पर सबसे ज्यादा फिल्में बनीं।
भगत सिंह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के ध्रुव तारे थे, एक सक्षम प्रेरणास्रोत जो आज भी लाखों युवाओं के प्रेरक हैं। हिन्दी सिनेमा में ‘भगत सिंह’ पर दर्जन भर से अधिक फिल्में बनीं।
पहला प्रयास दिलीप कुमार अभिनीत ‘शहीद’ थी। कथा में राष्ट्र की युवा शक्ति को भगत सिंह के जीवन दर्शन अपनाने की प्रेरणा मिली।
फिर शम्मी कपूर की एक फिल्म भी देश के अमर शहीदों से प्रेरित रही।
मनोज कुमार की ‘शहीद’ मूल रूप से क्रांतिकारियों के जीवन प्रसंगों के ऊपर आधारित कहानी थी, फिर अरसे बाद आधुनिक नई सदी में ‘भगत सिंह’ पर तीन-चार फिल्में एक के बाद एक रिलीज हुई।
उनमें राजकुमार संतोषी की फिल्म ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ (अजय देवगन) को काफी सराहा गया । इन सबसे  गुजरते हुए कहना होगा कि मनोज कुमार की शहीद आज भी प्रभावित करती है। शायद यही वजह है कि स्वतंत्रता अथवा गणतंत्र दिवस पर यही फिल्म याद आती है।
फिल्म की कथा ‘लोहड़ी’ त्योहार से शुरू होती है. भगत सिंह के ऊपर बनी कहानी की यह एक रोचक शुरुआत थी।
गांव के बेहद अमीर व्यक्ति के घर लोहड़ी का आयोजन हुआ है, यहां किशन सिंह (सप्रु) पत्नी (कामिनी कौशल) व बच्चे भगत (मास्टर राजा) के साथ आएं हैं। त्योहार की खुशियों के बीच अंग्रेजों के जुल्म से पीडित एक किसान मदद की गुहार लगाता हुआ आता है।
किशन सिंह का भाई अजीत सिंह (कृष्ण धवन) सहायता के लिए आगे बढ़कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ ‘विद्रोह’ का बिगुल बजा देता है। किशन सिंह, भाई को एहतियातन मुल्क़ छोड़ देने का मशविरा देता है। जिसे मानकर परिवार व दोस्तों को छोड़ भगत के चाचा मुल्क़ से चले जाते हैं।
बालक भगत पूरे वाकये को समझ नहीं सका, वह प्रश्नों से घिरा था कि क्यों चाचा को देश छोडने के लिए मजबूर किया गया? देश पर, हम पर अंग्रेजों का शासन क्यों है?
इस घटना को कुछ वर्ष बीत जाते हैं. लोहड़ी का त्योहार फिर आता है। गांव के एक क्रूर रसूखदार के यहां ‘लोहड़ी’ पर्व का आयोजन है, एक पीड़ित किसान जुल्मो-सितम के खिलाफ गुहार लगाते वहां आया। इस बार रसूखदार के अन्याय व शोषण के विरुद्ध ‘भगत सिंह’ विद्रोह का (मनोज कुमार) बिगुल बजाते हैं।
भगत इस भीड़ में  ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा लगाते हुए प्रवेश कर जाते हैं। किसानों व कामगारों की मदद के लिए आगे आए, वतन पर मिटने वाले एक क्रांतिकारी का उदय हो चुका था।
स्वाधीनता आंदोलन के प्रति हरेक हिन्दुस्तानी को जागरूक करने में ‘हिन्दुस्तान सामाजिक संगठन’ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। भगत सिंह संगठन के एक सक्रिय सदस्य थे। यहां पर सुखदेव (प्रेम चोपडा), राजगुरु (आनंद कुमार), आज़ाद (मनमोहन), दुर्गा भाभी (निरूपा राय) जैसे क्रांतिकारी अपने अभियानों के ऊपर योजनाएं बनाते थे।
कथा में बहुत स्पष्ट रूप से नहीं दिखाया गया कि भगत सिंह बाक़ी के क्रांतिकारियों से कब और कैसे मिले? भगत सिंह पर अत्यधिक फोकस होने की वजह से कहानी में उनकी साथियों की कहानी को महत्व नहीं मिला।
यदि इन्हें थोड़ा अधिक हिस्सा मिला होता तो शायद फिल्म ज्यादा महान हो पाती।
भगत सिंह पर आधारित ज्यादातर फिल्में इसी कसक से ग्रसित थी।
कथा का रुख मुड़ता है, लाला लाजपत राय के शांति जुलूस से। लाला लाजपत राय साईमन कमीशन के विरोध में शांतिपूर्ण जुलूस लेकर निकले हैं, भारी समर्थन के साथ जनहुजूम लाहौर की सड़कों पर बढ रहा होता है।
भीड़ को अंग्रेजी शासन आगे नहीं बढने नहीं देना चाहता। रोके जाने पर लाला जी विरोध करते हैं।
भीड़ तोडने के लिए पुलिस लाठीचार्ज को आगे बढ़ती है जिसमें लाला जी शहीद हो जाते हैं।
लाला लाजपत राय की शहादत का बदला लेने के लिए भगत सिंह व क्रांतिकारी साथी एकजुट होकर योजना बनाते हैं। क्रांतिकारी लाहौर के मुख्य पुलिस हाकिम ‘स्कॉट’ की हत्या की योजना बनाते हैं, लेकिन मामूली सफलता के साथ केवल डिप्टी ‘साउंडर्स’ मारा जाता है।
साउंडर्स कांड के बाद फिरंगी भगत सिंह व साथियों की तलाश में क्रांतिकारियों का पीछा कर रही थी। भगत अपनी पहचान छुपाने के लिए वेश बदल कर घूम रहे थे।
अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंककर वह अपने अभियानों में फिर भी सक्रिय रहे। इस दरम्यान राजधानी दिल्ली में डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट’ पास करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत जिद पर अड़ी हुई थी। केंद्रीय विधानसभा में विषय का जोर-शोर से विमर्श हो रहा, कानून भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के दमन की नीति का हिस्सा था।
बिल को पास न होने देने के लिए भगत सिंह एवं बटुकेश्वर दत्त असेंबली (संसद) में बम फेंक देते हैं—असेंबली सीन वास्तविक ‘संसद भवन’ में शूट हुआ, ताकि सत्यता महसूस हो।
घटना बारे में एक ज्ञापन फिल्म क्रेडिट्स में मिलता है। बम कांड में कोई भी फिरंगी नहीं मारा जाता, क्रांतिकारियों की ऐसी मंशा भी न थी।
बम फेंकने का मकसद केवल सदन की कार्यवाही को भंग करना था, लेकिन मूल उद्देश्य को लेकर स्थिति साफ नहीं क्योंकि क्रांतिकारी अपने पीछे ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का बुलंद नारा लिखा परचे छोड गए… किसी भी क्रांतिकारी अभियान की तरह।
शासन ने इसे अपने खिलाफ गंभीर आंदोलन की तरह लिया।
भगत सिंह व साथियों पर मुकदमा चला, बचाव पक्ष के वकील आसफ अली (जगदेव) क्रांतिकारियों का पक्ष विजयी रूप से रख ना सके।
जब-जब गणतंत्र दिवस आता है, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी वीरों की जन्मतिथि या पुण्यतिथि आती है…हम परदे पर भगत सिंह को सजीव होते देखते हैं. दिए की लौ पर हथेली रखकर देश की रक्षा की कसमें खाते जिस अभिनेता को देखते हैं, वह शहीद वाले मनोज कुमार ही होते हैं.
ऐ वतन, ऐ वतन…हमको तेरी कसम
तेरी राहों मैं जां तक लुटा जाएंगे…
देशभक्ति फिल्मों की जब भी चर्चा होगी मनोज कुमार और उनकी फिल्म शहीद संदर्भ बिंदु बने रहेंगे.