Movie review: फिल्म का मुद्दा अपनी जगह ठीक है, पर बुलबुल अतिश्योक्ति भरी फिल्म है

फिल्म बुलबुल का सब्जेक्ट भले ही ठीक हो, पर फिल्मांकन और बेसलाइन के लिहाज से यह अतिश्योक्ति भरी है

फिल्म बुलबुल का पोस्टर
फिल्म बुलबुल का पोस्टर

फ़िल्मांकन और बेस लाइन में अतिशयोक्ति से सुसज्जित फ़िल्म लगी बुलबुल. फ़िल्म में बस स्त्रियों से जुड़े मसले असल हैं बाक़ी सब लगता है नुक्कड़ पर जादू दिखा रहे हैं. इन्हीं मुद्दों को केंद्र में रखकर किसी अच्छी बेस लाइन के साथ कहानी बुनी जा सकती थी. पेड़ों की जगह कोई और तरीक़ा खोजा होता, तो ज़्यादा जस्टिफाई किया जा सकता था क्योंकि जो शारीरिक समस्या बुलबुल की दिखाई है उसमें पेड़ों पर उछलकूद, वह भी बिना किसी दैवीय शक्ति के तो अतिशयोक्ति ही लगती है.

अब अगर सिर्फ़ और सिर्फ़ उन मुद्दों की बात की जाए, जिन्हें केंद्र में रखकर यह फ़िल्म बनाई गई है तो कहना होगा कि फिल्म बुलबुल की कहानी भले ही डेढ़ सौ साल पुरानी हो, लेकिन स्त्रियों के साथ होने वाली शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना के मामलों में यह आज भी उतनी ही फिट बैठती है.
हम कितना भी डंका बजा लें कि औरतों के लिए हालात सुधर गए हैं लेकिन एक महामारी आई और दुनियाभर में 50 फीसद की बढ़ोतरी के साथ घरेलू हिंसा, हत्या और महिलाओं के प्रति अपराधों के मामले सामने आ गए. सारी पोल-पट्टी खुल गई.

“पिशी माँ, बिछुए क्यों पहनते हैं?”
उत्तर मिलता है. “वश में करने के लिए.”

पता है, विदेशों में एक चीज़ बहुत अच्छी है. वहाँ शादीशुदा स्त्री-पुरुष दोनों ही निशानी के रूप में अँगूठी पहनते हैं. हमारे यहाँ एक बात का विरोध करो तो उसे फ़ौरन हमारे स्वास्थ्य के विज्ञान से जोड़कर चुप करा दिया जाता है.
विवाह के बाद सारी निशानियाँ सिर्फ स्त्री के लिए ही हैं. लड़का चाहे तो विवाह की अगली सुबह बरमूडा पहनकर कमरे से निकल सकता है, और जो लड़की निकल आए तो कुलच्छिनी हो जाती है.

हैरानगी की बात यह है कि कई लड़कियाँ भी, जो पढ़ी-लिखी होने के बावजूद परंपराओं के नाम पर जजमेंट पास करती हैं. उन्हें पता ही नहीं चलता कि वे कब अपनी ही प्रजाति की दुश्मन बन गईं. ठीक वैसे ही, जैसे फिल्म बुलबुल में बुलबुल की भाभी बन जाती है.

“थोड़ा पागल है, लेकिन गहने मिलेंगे”
“थोड़ा पागल है, लेकिन रेशम मिलेगा”
“चुप रहना. ठाकुरों के यहाँ ब्याही हो, बड़ी हवेली में बड़े राज़ छुपे होते हैं.”

इन संवादों में कितना गहरा सच छिपा हुआ है. जब मी टू अभियान चला था, तब कुछ लड़कियों ने हिम्मत दिखाई थी अपने परिवार के ही उन सदस्यों के खिलाफ़ बोलने की, जिन्होंने उन्हें सेक्सुअली टॉर्चर किया. आश्चर्य की बात है न कि वे पुरुष उनके परिवारों में आज भी सम्मानित दर्जा पाए हुए हैं.
बलात्कार पर जाने कितने ही माता-पिता न जाने कितने ही डर पालकर बेटी को आवाज़ नहीं उठाने देते. इस तरह हज़ारों मामले दर्ज होने से पहले ही दम तोड़ देते हैं.

बुलबुल फिल्म की मूल कथा में जो एक बात अच्छी लगी, वह यह कि पुरुष का अच्छा और बुरा दोनों ही रूप दिखाया है. आज भी हमारे आसपास कुछ अच्छे और कुछ बुरे, दोनों तरह के पुरुष मौजूद हैं. हाँ, अनुपात में देखें तो कुत्सित विचारधारा वाले अधिक हो सकते हैं. लेकिन हमें असल में छांटना होगा. सभी को एक लाइन में खड़ा नहीं कर सकते.
जो ग़लत कर रहे हैं “किसी के भी साथ” उन्हें अपने-पराए की सीमा से परे रखकर चिन्हित करना होगा. और जो अच्छे हैं, हमारे हक़ में, हमारे साथ खड़े हैं. हमारे लिए सुरक्षित वातावरण की लड़ाई में साथ चल रहे हैं, उन्हें भी चिन्हित करके प्रेरणा के रूप में प्रस्तुत करना होगा ताक़ि उन जैसे और बन पाएँ.

यह भी बात सही है कि औरत को हमेशा न्याय के लिए काली माँ का रूप ही धारण करना पड़ता है. वह संस्कारों, आदर्शों, मान्यताओं, दहलीज़ और लाज में सिमटी काँच की गुड़िया बनकर अपने हक़ की लड़ाई नहीं लड़ सकती. वह जहाँ से अपना विरोध दर्ज कराना शुरू करती है बस वहीं से वह रौद्र और उग्र मान ली जाती है.

कहा जा रहा है कि यह कहानी रवींद्र नाथ टैगोर और उनकी भाभी के संबंधों पर आधारित है. सच क्या है पता नहीं. अगर ऐसा है भी, तो कौन जाने गुरुदेव की कहानियों में हमने स्त्रियों के लिए जो दर्द महसूस किया है, वह यहीं से उपजा हो. उसी वैराग्य से जो उनके मन में अपनी भाभी के हालात का सच जानकर उपजता है.