फिल्म समीक्षाः धीमी, नीरस और बोर फिल्म है चमन बहार

एकतरफा प्रेम की बोर करने वाली फिल्म है चमन बहार

चमन बहार की समीक्षा
चमनबहार बोर करती है

आपको याद है कुछ साल पहले दस के नोट पर किसी दिलजले प्रेमी ने लिख मारा थाः सोनम गुप्ता बेवफा है. फिल्म चमन बहार का विचार शर्तिया लेखक और निर्देशक को वहीं से मिला होगा. इस फिल्म को रिलाज हुए महीना भर होने को आए. कोविड 19 महामारी के दौर में थियेटर बंद रहे तो निर्माताओं ने इस फिल्म को ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर 19 जून, 2020 को रिलीज किया.

पहले बता दूं कि ओटीटी पर होने की वजह से आप इसे अभी भी देख सकते हैं, पर नहीं देखेंगे तो आपका कोई नुक्सान नहीं होगा. मैंने इस फिल्म को टुकडे-टुकड़े में देखा. मैं इस इंतजार में रहा कि इस फिल्म में आगे कुछ होगा. कि शायद अगले सीन में कुछ घटे.

पर निहायत ही धीमी, एकरस और नीरस फिल्म है.

निर्देशक का पकड़ फिल्म पर नहीं है. और अगर फिल्म में कुछ घटना होती है तो वह आखिरी बीस मिनट में. यह लेख लिखने के लिए मुझे फिल्म देखनी पड़ी, आपके लिए ऐसी कोई बंदिश आयद नहीं है.

इस फिल्म चमन बहार को लेकर तो कई शिकायतें हैं. सवाल यह है कि क्या यह फिल्म लड़कियों के साथ छेड़खानी का समर्थन तो नहीं करती? हमारा केंद्रीय पात्र, यानी जीतेंद्र कुमार अपनी अलग पहचान बनाने के लिए पान की दुकान खोलता है, पर उसके अंदर का धीरोदात्त नायक यहीं तक है. उसके बाद वह भी उस कस्बे के तमाम स्टॉकरों में से एक हो जाता है.

लड़की छोटे कपड़ों में है, लड़की कुत्ता घुमाने ले जाती है, लड़की स्कूटी चलाती है, तो शहर भर के लड़के उमड़ पड़ते हैं.
कहानी के नाम पर आप दो घंटे तक कुछ छिछोरे लड़कों की स्टॉकिंग देखते हैं. आप देखते हैं कि कैसे एक दुकानदार से लेकर नेता तक, हर कोई एक लड़की के पीछे पड़ा है.

दूसरी बड़ा सवाल है कि फिल्म भले ही ईव टीजिंग को लेकर बनाई गई है पर इसमें लड़की की तरफ से एक भी संवाद नहीं है. हम बाद में, बल्कि फिल्म के आखिरी सीन में देखते हैं कि लड़की पढ़ने में बहुत प्रतिभाशाली है, उसके पिता बहुत अच्छे व्यक्ति हैं. और हमारा हीरो किसी भी तरह से उस लड़की के लायक नहीं था.

वैसे कहानी का सबसे बड़ा झोल यह है कि शहर के सारे लड़के, शिक्षक, दुकानदार सब एक लड़की के शहर में आते ही उस पर लट्टू हो जाते हैं. अगर यह कॉमिडी फिल्म होती तो शायद इसको माफ भी कर दिया जाता, लेकिन फिल्म का केंद्रीय भाव गंभीरता भरा है.

बीच में, रिंकू नानोरिया को बेवफा बताने वाला सीक्वेंस भी है. पर उस घटना को कहानी में जबरदस्ती जोड़ा गया लगता है. नदी किनारे गांजा पीने वाले एक साधु की बेवजह मौत का भी कहानी से क्या लेना-देना था, यह समझ नहीं आया.

नायक का अपने पिता के साथ संबंध भी अजीब-सा ही है. अगर पिता हंसमुख है, जैसा कि कुछ दृश्यों में दिखाया गया है तो वह पान दुकान खोलने वाले दृश्य में दुकान पर मौजूद क्यों नहीं था. और अगर वह दुकान खोलने के मामले में हीरो का विरोध कर रहा है तो घर में तनाव क्यों नहीं है.

तो समझिए कहानी एकदम पिटी हुई है.

यह ईव-टीजिंग जैसे गंभीर विषय पर बनाई गई बहुत हल्की टिप्पणी जैसी फिल्म है. हां. यह जरूर है कि फिल्म की लोकेशन बहुत बढ़िया है. हर फिल्म मं सेट और मुंबई को देखकर ऊबे दर्शक को लाल मिट्टी, छोटा शहर जरूर राहत देगा.

जहां तक लीड एक्टर जीतेंद्र कुमार की बात है, इस फिल्म में वे पिछली वेब सीरीज पंचायत से बेहतर नजर आए हैं. पर आखिरी दस मिनट को छोड़कर पूरी फिल्म में उनके भाव एकसमान है.

पंचायत सीरीज में और इस फिल्म में मुझे उनकी स्क्रीन प्रेजेंस में कुछ खास अलग दिखा नहीं. उनका चेहरे पर आने वाले भाव सीमित हैं. पर यह जरूर है कि टुकड़ो-टुकड़ों में उनमें राजकुमार राव का असर देखा जा सकता है. अच्छी बात यह है कि जीतेंद्र कुमार राजकुमार राव की तरह जल्दी-जल्दी संवाद नहीं बोलते.

एक बड़ी शिकायत फिल्म के संगीत को लेकर भी है. फिल्म का एक सिग्नेचर म्युजिक है जो रिंकू नानोरिया के परदे पर नमूदार होते ही बजता है. पर यह इतना अधिक बजता है और इतनी बार बजता है कि कान बगावत पर उतर आते हैं.

छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म में एकाध गाना अगर छत्तीसगढ़ी में होता, तो बात बन सकती थी. पर हीरो-हीरोइन के ड्रीम सीक्वेंस में भी हिंदी गाने से काम चलाया गया.

संगीत के मामले में आखिरी सीक्वेंस में छत्तीसगढ़ी गाना है पर वह पृष्ठभूमि में बजता है और ठीक से दर्ज नहीं हो पाता.

निर्देशक ने एक शानदार मौका गंवा दिया. आखिर, पीपली लाइव को याद करिए, रघुबीर यादव की आवाज में महंगाई डायन खाए जात है आज भी बजता है, और क्या खूब बजता है.

वैसे रिपोर्ट्स हैं कि महीने भर में इस फिल्म ने ठीक-ठाक दर्शक जुटा लिए. लॉकडाउन और सोशल मीडिया पर प्रचार ने यह कमाल किया हो. हैरत भी नहीं, अपने देश में तो हमशकल्स भी चल जाती है.
फिल्मः चमन बहार
निर्देशकः अपूर्व धर बड़गैयां
संगीतः मंगेश धकड़े
कास्टः जीतेंद्र कुमार, रीतिका बड़ियानी, भुवन अरोड़ा, आलम खान