फिल्म समीक्षाः चिप्पा दिल छूने वाली कहानी और रात के कोलकाता की कविता है

चिप्पा रात के कोलकाता पर लिखी गए एक कविता सरीखी फिल्म है

रात की कविता है चिप्पा
चिप्पा कोलकाता के बारे में क्लीशे तोड़ती है

आप कोलकाता गए हैं कभी? कभी रात में उसकी सड़कों पर आवारा फिरा किए हैं? कभी प्यासे रहे हैं और ऐसा हुआ हो कि दुकानें बंद हों और आपको बंबे से पानी न मिला हो? क्या आप रात भर जागे हैं? क्या भूखे रहकर भी आप मुस्कुराए हैं? बस, बस आखिरी सवालः आपने राज कपूर की जागते रहो देखी है?

मेरे आखिरी सवाल का जवाब अगर हां हो या ना, पर आपको फिल्म चिप्पा देखनी ही चाहिए.

चिप्पा की चर्चा ज्यादा नहीं हुई. होनी भी नहीं थी, आखिरकार इस फिल्म में न तो मादक नायिकाएं हैं, न तो कमीज उतारकर डोले दिखाने वाला ओवर एक्टिंग करने वाला नायक है. न तो इसमें सेक्स है न द्विअर्थी संवाद. सोशल मीडिया पर समीक्षक बने अति सक्रिय दर्शक के पसंद के लिए कुछ ज्यादा है नहीं.

पर अच्छी फिल्म को पसंद करने वाले दर्शकों के लिए बहुत कुछ है और चिप्पा को अभी तक कम दर्शक मिले हैं तो इसलिए क्योंकि इसका प्रचार मुख्यधारा की फिल्मों की तरह नहीं हुआ है. पर होना चाहिए.

यह असहज करने वाली फिल्म है, जिसमें ताजगी है. छोटे से बच्चे सनी पवार की शानदार और जबरदस्त एक्टिंग है. इस फिल्म की समीक्षाएं नहीं लिखी गईं, स्टार भी नहीं दिया गया होगा.

पर अगर आपको फोटोग्राफी से शौक है, आपको अच्छी फिल्म और उसकी मेकिंग, जबरदस्त निर्देशन वाली फिल्म देखनी है तो चिप्पा देखनी चाहिए.

इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत यह भी है कि यह कोलकाता को लेकर क्लीशे तोड़ती है. खासकर दृश्यात्मकता को लेकर. इसमें कोलकाता का मतलब हावड़ा ब्रिज, विक्टोरिया मेमोरियल, हुगली या दुर्गा पूजा इनमें से एक भी शॉट नहीं है. न ही कोलकाता के रेडलाइट इलाके सोनागाछी का कोई जिक्र है.

फिल्म चिप्पा का कोलकाता उस वक्त का शहर है जो तब उभरता है जब भीड़ और ठेलमठेल छंट जाती है. जब सारी आबादी सो जाती है, और रात के जीवों, सड़कों पर रहने वालों और नाइट शिफ्ट के मजदूरों के पास सुनसान सड़कों पर काम निबटाना होता है.

इस फिल्म में रात का कोलकाता है. जागते रहो का अक्स है, प्यास है. हमारा छोटा सा नायक सड़क पर भागता है और साथ-साथ कहानी भी. पहले दृश्य में तीन चार कट के बाद स्थापित हो जाता है कि यह दिन का कोलकाता है. फिर चिप्पा घर से निकल पड़ता है. शाम होती है और चिप्पा के सफर के साथ रात का कोलकाता परदे पर उतर आता है.

सफदर रहमान की कहानी में दस साल के चिप्पा के पास एक ख़त है. ख़त उर्दू में है और उर्दू पढ़ने वाला कोई नहीं. आप चिप्पा की कहानी, उसकी मुस्कुराती आंखों में खो जाते हैं और रहमान एक भाषा के तौर पर उर्दू की स्थिति पर एक स्टेटमेंट दे जाते हैं.

पूरी फिल्म में एक खास बात है कि अंधेरे का इस्तेमाल कम हुआ है. 95 फीसद फिल्म में दृश्य रात के हैं, पर गाढ़ी पीली रोशनी मौजूद है. यह रोशनी महानगरों के पेट में पल रही उदासी के पलों को परदे पर गाढ़ा नहीं होने देती.

सड़क पर भागते चिप्पा को कौन मिलता है. वह सभी, जिसकी हम उम्मीद या अंदेशा कर सकते हैं. सहृदय पुलिसवाला, मुस्कुराने वाला बिहारी टैक्सी ड्राइवर, झूठी कहानियां सुनाने वाला प्यारा मुस्लिम सोनपपड़ी वाला, निर्माण मजदूर, शराबी, प्रवासी और किन्नर.

हो सकता है आप फिल्म में रात के शहर में किसी खलनायक के न होने के लिए इसकी आलोचना करें और इसको यथार्थ से परे घोषित कर दें. कि, इस फिल्म में जिंदगी की जद्दोजहद को रोमांटिसाइज करके खूबसूरत तरीके से दिखाया गया है. तो आप इस फिल्म को बच्चे की परी कथा क्यों नहीं मान सकते हैं? हां, ठीक है कि इस परी कथा में कोई महल नहीं, कोई आश्चर्य लोक नहीं.

इस फिल्म पर जागते रहो का प्रभाव तब और स्पष्ट हो जाता है जब चिप्पा एक बंबे (हैंडपंप) से पानी पीने की असहाय और असफल कोशिश करता है और पानी नहीं मिलने पर, बैंड पार्टी के कुछ सदस्यों से पानी मांगता है. शुरू में पानी नहीं दिया जाता है, पर इसी दृश्य में निर्देशक का दिल पिघल जाता है.

फिल्म यह भी स्थापित करती है कि कोई भी व्यक्ति असल में निरपेक्ष रूप से बुरा नहीं होता. चिप्पा को दिन-रात डांटने वाली सड़क पर ढाबे की मालकिन भी असल में बुरी नहीं है.

सिनेमैटोग्राफर रामानुज दत्ता ने शहर के अलग मिजाज को उसकी गहरी पीली रोशनी के साथ गजब अंदाज में पकड़ा और पेश किया है.

दिव्यकमल मित्रा के साथ काम कर रहे बेल्जियम के संगीतकार साइरिल डी हेस का संगीतमय स्कोर द बिग अदर पृष्ठभूमि में रहकर अद्भुत समां रचता है. मानो जो रात की कविता और कविता में रात दोनों को सिरे से पकड़ता दिखता है.

सफदर रहमान ने खुद ही इस फिल्म की पटकथा लिखी है. मेरी सिफारिश पर यह फिल्म देखने की कोशिश करें, चमन बहार और घूमकेतु से माथा चकरा गया है तो चिप्पा आपको ताजा दम कर देगी. फिल्म नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध है.

फिल्मः चिप्पा
कास्ट: सनी पवार, जोयराज भट्टाचार्य, सुमीत ठाकुर, गौतम सरकार, मसूद अख्तर, कल्पन मित्रा
पटकथा और निर्देशनः सफदर रहमान
संगीतः दिव्यकमल मित्रा
कैमराः रामानुज दत्ता
प्लेटफॉर्मः नेटफ्लिक्स