फ़िल्म समीक्षाः समस्या में उत्तीर्ण, कहानी में अनुत्तीर्ण है फिल्म परीक्षा

प्रकाश झा की फिल्म परीक्षा में समस्या बेशक नई है, लेकिन वैचारिक तौर पर फिल्म मूल रूप से 'आरक्षण' का एक्सटेंडेड वर्जन है

परीक्षा अच्छे विषय पर बनी कमजोर फिल्म है
परीक्षा अच्छे विषय पर बनी कमजोर फिल्म है

50वें इंटरनेशनल इंडिया फ़िल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित हो चुकी प्रकाश झा निर्मित-निर्देशित और लिखित “परीक्षा: द फाइनल टेस्ट’ ओटीटी प्लेटफाॅर्म जी-5 पर आ चुकी है। 6 अगस्त को रिलीज़ हुई यह फ़िल्म नवंबर, 2019 में फ़िल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित की गई थी।

परीक्षा को अपनी स्टोरी लाइन की वजह से बेहद पसंद किया गया था। जून में इसे लंदन फ़िल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया जाना था। लेकिन तकनीकी खामियों की वजह से वहां इसका प्रदर्शन टालना पड़ा था।

भारत में थिएटर में इसको रिलीज़ किया जाना था, लेकिन कोरोना महामारी के चलते इसको ज़ी-5 के डिजिटल प्लेटफाॅर्म पर रिलीज़ किए जाने की घोषणा की गई थी। वैसे यह फिल्म मोटे तौर पर 1948 में आई इतालवी फ़िल्म ‘बायसिकिल थीव्ज़’ की याद दिलाती है।

फ़िल्म की कहानी झारखंड की राजधानी रांची के देशकाल की है। नाम से ही ज़ाहिर है फ़िल्म पूरे समय शिक्षा के इर्द-गिर्द घूमती है।

भारत में शिक्षा व्यवस्था के एक काल्पनिक घटिया सच को अच्छे अंदाज़ में कहने की कोशिश की गई है। हालांकि, ये समस्या और परिस्थितियां उन जगहों पर आम है, जिस जगह को ध्यान में रखकर ये फ़िल्म लिखी गई है।

प्रकाश झा इस तरह की समस्या और वर्गीय असमानता को प्रमुखता से उठाते रहे हैं। इस बार फ़िल्म के निर्देशन से लेकर, निर्माण और लेखन तक सभी ज़िम्मेदारियां उन्होंने खुद निभाई हैं।

106 मिनट की फ़िल्म एक रिक्शा चालक बीजू (आदिल हुसैन), उसकी पत्नी राधिका (प्रियंका बोस) और बेटे बुलबुल कुमार (शुभम झा) के इर्द-गिर्द रहती है। समय-समय पर दूसरे पात्र ज़रूरत के हिसाब से कहानी में दाखिल होते हैं।

एक रिक्शा चालक और उसकी पत्नी का अपने बेटे की शिक्षा के लिए किया गया संघर्ष कहानी का मूल है।

एक आम आदमी की अपने बेटे को बड़े स्कूल में तालीम दिलाने की कोशिश पर पूरी कहानी टिकी है। फ़िल्म के डायलाॅग छोटे हैं, सहज हैं, इसलिए आप उससे जुड़ते हैं।

कहानी शुरू में जिस तरह से चलती है वो आपको पसंद आती हैं। लेकिन करीब 40 मिनट की फ़िल्म के बाद आपको कहानी ग़लत ट्रैक पर जाती दिखती है। फिर भी आप उससे भावनात्मक तौर पर स्वयं को अलग नहीं कर पाते।

अपने बेटे के लिए बीजू ने जो रास्ता चुना उसे आप ग़लत मानते हुए भी फिल्म के विषय की वजह से उसे नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

आपको फ़िल्म में दो पक्ष देखने को मिल सकते हैं। ये आपकी विचारधारा पर निर्भर करता है। फ़िल्म के बढ़ते-बढ़ते आप उससे अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर जुड़ते हैं। इसलिए जो धारा आपको पसंद है आप फ़िल्म को उसी नज़रिये से देखते हैं।

लेकिन मेरे ख्याल में जिस अंतर को प्रकाश झा ने उठाया है वैचारिक तौर पर वह बेहद उम्दा भी है और जरूरी भी। लेकिन जिस तरह से उस समस्या को दूर करने के लिए बीजू को ग़लत रास्ते पर भेजा गया वो ग़लत है। क्योंकि हमने अपने आसपास ऐसा कोई मामला नहीं देखा जिसमें बेटे को सीबीएसई बोर्ड के स्कूल में पढ़ाने के लिए कोई ग़लत रास्ता चुनता हो।

मैं ये नहीं कह रहा कि ऐसा नहीं होता होगा, लेकिन अपवाद नियम नहीं होते। हां, स्कूल के बच्चों को ढोने वाले रिक्शा चालक के अपने बच्चे के लिए सपनों को बखूबी प्रदर्शित किया गया है।

प्रकाश झा खुद उसी क्षेत्र से आए हैं, इसलिए हर पात्र कसा हुआ है, भाषा से लेकर पहनावे तक पर पूरा ध्यान दिया गया है। बस कई जगह उनका भौगोलिक परिवेश के मुताबिक भाषायी उच्चारण कुछ भिन्न दिखा है। इस पर और काम किया जा सकता था।

संतोष मंडल की एडिटिंग में कुछ बिखराव दिखता है, जबकि सचिन कृष्ण की सिनेमेटोग्राफी में कमियां बहुत कम हैं।

आदिल हुसैन और प्रियंका बोस ने किरदार बहुत दमदारी से निभाया हैं। संजय सूरी आइपीएस की भूमिका में जंचते हैं। उनके प्रयास की सराहना आप पूरी फ़िल्म में करते हैं। उनका किरदार नई उम्र के सिविल उत्तीर्ण अभ्यर्थियों को संदेश देने के लिए काफ़ी है। अमूमन ऐसे मौके असल ज़िंदगी में देखने को नहीं मिलते।

फ़िल्म देखते हुए आप चाहते हैं कि काश सभी सरकारी अफ़सर ऐसे हों तो क्या बात है?

कुल मिलाकर एक बार देखने के लिए फ़िल्म अच्छी है। पूरी फ़िल्म देखने के बाद आपको प्रकाशा झा की 2011 में आई ‘आरक्षण’ की याद आती है। लेकिन उसके जैसा रोमांच नहीं दिखता। उसकी वजह है कि दोनों के प्लाॅट अलग हैं।

लेकिन बीच राह में दोनों एक ही प्रकार की वर्गीय असमानता का दामन पकड़कर दर्शकों के बीच खुद को स्थापित करना चाहती हैं। एडिटिंग और सिनेमोटोग्राफी टीम वही है। लेकिन आरक्षण में जो काम किया गया है, वो इस फ़िल्म में नहीं हैं।

वर्गभेद के संघर्ष को जिस तरह प्रकाश झा ने उसमें उठाया था, उसी को रिपीट किया गया है। लेकिन अलग अंदाज़ में। समस्या बहुत गंभीर है, लेकिन फ़िल्म में उसका प्रदर्शन एक तय विचारधारा को ज़ाहिर करता है। हां, इसके लिए आप प्रकाश झा को बधाई दे सकते हैं कि उन्होंने ये दर्शाया है कि प्रतिभा कहीं भी हो सकती हैं।

लेकिन कहानी में स्टेट बोर्ड के मुकाबले जिस तरह सीबीएसई को प्रमोट किया गया है, वो ज्यादा पसंद नहीं आता। आप वर्गभेद देखकर सिवाए गालियों के कुछ नहीं देते। प्लाॅट को और ज्यादा विस्तार और रोमांच दिया जा सकता था, जिसमें झा जैसे सशक्त निर्देशक और कहानीकार कमज़ोर दिखते हैं।

फ़िल्म परीक्षा अपनी समस्या के आधार पर दर्शकों के बीच पास हो सकती है, लेकिन अपनी कहानी के बल पर फ़ेल साबित होगी।

निर्माता-निर्देशक, पटकथा: प्रकाश झा

सितारे: आदिल हुसैन, प्रियंका बोस, संजय सूरी, शुभम झा

ओटीटी प्लेटफॉर्मः ज़ी5

(लेखक अमर उजाला में उप संपादक है, सिनेमा और थियेटर से लगाव है)