गुंजन सक्सेना समीक्षाः और ऊंचा उड़ सकती थी ये आसमान की परी 

धर्मा प्रोडक्शन एक मजबूत सिपाही को इस फिल्म के जरिये बेहद कमजोरी से दर्शकों के सामने पेश करता है

निर्माताः शारन शर्मा

सितारे: जाह्नवी कपूर, पंकज त्रिपाठी, अंगद बेदी, विनीत कुमार सिंह, मानव विज़, आयशा रज़ा आदि।

ओटीटी प्लेटफॉर्मः नेटफ़्लिक्स

जुलाई में जब सेना में बेटियों के लिए सभी पदों के लिए अवसरों को खोल दिया गया है, तब ‘गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल’ जैसी फिल्म आपको सोचने पर मजबूर कर सकती है कि आपको अपनी बेटी को किस तरह पालना है।

फिर भी एक फिल्म हमेशा फिल्म की निगाह से देखी जाती है। गुंजन सक्सेना भी इसी नज़र से देखी जानी चाहिए। महसूस होता है कि अगर धर्मा प्रोडक्शन थोड़ी मेहनत करता तो ये आसमान दी परी और भी ऊँचा उड़ सकती थी।

12 अगस्त को नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ हुई धर्मा प्रोडक्शन के बैनर तले बनी ‘गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल’ एक धीमी बायोपिक लगती है।

फिल्म का अधिकांश हिस्सा वायु सेना में लिंगभेद को दर्शाने में निकल गया। इसके विपरीत गुंजन सक्सेना का असल संघर्ष फिल्म की कहानी में पूरी तरह से निखरकर नहीं आ पाया।

भारतीय वायु सेना की पहली महिला पायलट, जिसने कारगिल युद्ध में अपना योगदान दिया हो उसके किरदार को दर्शकों तक पहुंचाने में फिल्म बेहद कमजोर रही। बतौर निर्देशक ये शारन शर्मा की पहली फिल्म है। उनको एक कमजोर पहल के लिए बधाई तो नहीं बनती, लेकिन हां इस फिल्म के कुछ हिस्सों के लिए वो बधाई के पात्र जरूर हैं।

इस फिल्म के जरिए आप अपने घरों की बेटियों के लिए नए आसमान को देख सकते हैं।

116 मिनट की फिल्म में अंशुमान सक्सेना (अंगद बेदी) का किरदार बहुत कम समय का है, लेकिन बेहद प्रभावी है। बताने की जरूरत नहीं है कि फिल्म की पूरी कहानी घूमती है गुंजन सक्सेना (जाह्नवी कपूर) के इर्द-गिर्द।

फिल्म की शुरूआत के पांच मिनट बाद से ही इसके मुख्य पात्र बन जाते हैं गुंजन के पिता कर्नल अनूप सक्सेना (पंकज त्रिपाठी)। इसके बाद आप फिल्म पूरी देखते हैं तो सिर्फ उनके सहारे।

पंकज त्रिपाठी का फिल्म में होना आपको बांधे रखता है।

फिल्म की शुरुआत में आपको बहुत हल्की-फुल्की हंसी आ सकती हैं। लेकिन इसके बाद आपके चेहरे पर भाव आने बंद हो जाते हैं। इससे पहले की तमाम बायोपिक देखने के बाद जिस तरह से मन में प्रेम, करुणा, दुःख, अवसाद आए हैं, इस फ़िल्म में ऐसा कुछ भी नहीं दिखता है।

फिल्म की कहानी लिखी है निखिल महरोत्रा और शारन शर्मा ने। संवाद बहुत सशक्त नहीं हैं। लेकिन हर किरदार अपने अभिनय के दम पर उनमें जान डालता दिखता है। खासतौर पर पंकज त्रिपाठी और मानव विज़।

गुंजन सक्सेना के मुख्य किरदार के लिए संवाद बहुत मजबूत नहीं लिखे गए हैं।

फिल्म देखने के बाद ऐसा लगा है कि गुंजन सक्सेना पूरी फिल्म में जिस पुरुषवादी सोच से लड़ती रही, संवाद के स्तर पर पुरुषों ने उसके साथ वही अन्याय कर दिया है।

जाह्नवी इस फिल्म में अपनी पिछली फिल्म ‘धड़क’ के मुकाबलेे कुछ बेहतर दिखी हैं। लेकिन फिर भी एक लड़की, जिसने पुरुष प्रधानता को इतनी हद तक झेला हो, उसके किरदार और संघर्ष को ज़ाहिर करने में वह कहीं कमजोर दिखती हैं।

हां, इतना जरूर है कि पंकज त्रिपाठी जैसे अभिनेता के साथ काम करके उन्होंने सीखा बहुत कुछ होगा। उनके मुकाबले उनकी मां कीर्ति सक्सेना का किरदार निभाने वाली आयशा रज़ा ज्यादा मजबूत दिखाई दी हैं।

फिल्म बहुत धीमी गति से चलती है। फिल्म की शुरूआत तो कारगिल के जंग के मैदान से होती है, लेकिन इसमें गुंजन सक्सेना की एंट्री दिखाने के लिए धर्मा प्रोडक्शन ने अपने घिसे-पिटे अंदाज़ को नहीं छोड़ा।

गुंजन की एंट्री को देखकर आप थोड़ी देर के लिए सोचेंगे कि ये एक सैनिक की एंट्री है या किसी रोमांटिक फिल्म में शाहरुख खान की। इसके बाद फिल्म अपने फ़्लैश बैक में चलती है।

गुंजन सक्सेना के बचपन का किरदार निभाने वाली रीवा अरोरा का हिस्सा बहुत छोटे समय के लिए है, लेकिन वह अपनी उम्र से कहीं प्रभावी अभिनय करती दिखाई दी हैं।

गीत अच्छे हैं, लेकिन पोस्टर पर सेना की वर्दी और शीर्षक के साथ कारगिल शब्द, देख अगर आप किसी जोशीले गाने की उम्मीद करते हैं तो वो ज़रूर टूटेगी। आप मन में ये सोच रखकर अगर फिल्म देखने जा रहे हैं कि ये आज़ादी के पर्व  से ठीक पहले आपको देशभक्ति का अहसास कराएगी, तो इस पक्ष पर आप मायूस हो सकते हैं।

यूं भी आप पंकज त्रिपाठी के एक संवाद से संतुष्ट हो जाएंगे कि भारत माता कि जय कहने से देशभक्ति नहीं दिखती, आप अपना काम ईमानदारी से करिये। इस फिल्म में आपको सेना की वर्दी के अलावा न तो तिरंगा दिखेगा, न बहुत देर का युद्ध, न ही जोशीले नारे और गाने। दिखेगा तो एक लड़की का खुद को साबित करने का संघर्ष, एक पिता का अपनी बेटी पर विश्वास और समाज की उसके प्रति सोच जो तब से लेकर अब तक बरक़रार है।

फिल्म आपको मनोरंजन तो नहीं दे सकती, हां लेकिन एक सोच जरूर दे सकती है अपनी बेटियों और उनके सपनों को देखने के लिए। बेटियों को ये फिल्म दिखानी इसलिए जरूरी है ताकि उनमें खुद पर विश्वास पैदा हो और अपने सपनों को सच करने के लिए वो हर हद से गुजरने को तैयार हों।

फिल्म में कुछ स्थानों को बहुत अच्छे से फिल्माया गया है। लेकिन वो सभी जगह पंकज त्रिपाठी की संवाद कला के जरिये ही मजबूत होती दिखाई देती हैं।

जैसे अपनी पत्नी से बात करते हुए उनका ये कहना कि हम तो इस तरफ हैं।

गुंजन के हारकर ट्रेनिंग से वापस आने पर उसके शादी की इच्छा जाहिर करने पर एक पिता के सपनों और अपनी बेटी को हौसला बंधाते की तरकीब आप बहुत पसंद करेंगे।

एक सैनिक पिता के दोनों बच्चे जब युद्ध भूमि पर हों तब उसके भतीर क्या उथल-पुथल हो सकती है और चेहरा कैसा शांत होता है वो आप समझ सकते हैं। बेटी के वायु सेना के लिए चयन की सूचना मिलने पर जिस साधारण तरह से वह धन्यवाद देते हैं वो काबिले तारीफ़ है। और भी बहुत मौके हैं जहां आप पंकज त्रिपाठी के अभिनय को सराहे बिना नहीं रह सकते।

फिल्म के फ्रेम अच्छे हैं, सिनेमेटोग्राफी के स्तर पर फिल्म बहुत कमजोर नहीं है। लेकिन समग्रता देखें तो धर्मा प्रोडक्शन की यह फिल्म सिनेमा की दृष्टि से कमजोर दिखाई देती है।

इस फिल्म को आप भारत की एक बेटी के संघर्ष की एक झलक भर के लिए देख सकते हैं, जिसे पूरी तरह से दिखाने में फिल्म असफल रही है। जाह्नवी के सुधरते अभिनय के लिए इसे आप देख सकते हैं। सबसे ज्यादा ये फिल्म देखी जानी चाहिए तो पंकज त्रिपाठी के अभिनय के लिए, उन्होंने यहां भी साबित किया है कि एक कमजोर कहानी और हल्के निर्देशन को भी मजबूत अभिनय और संवाद शैली किस तरह धारदार और जीवंत बना सकती है।

हां, सबसे ज्यादा ये फिल्म देखी जानी चाहिए अपने अंदर से पुरुषवादी सोच को ख़त्म करने और अपने स्त्री होने की कमजोरी को भूलकर हौसलों की उड़ान भरने के सपने देखने के लिए।

(लेखक अमर उजाला में उप संपादक हैं। सिनेमा और थियेटर में गहरी रूचि है। सिनेमा लेखन से लगाव है)